चेहरा मेरा था निगाहें उसकी
ख़ामोशी में भी वो बातें उसकी
मेरे चेहरे पे ग़ज़ल लिखती गई
शेर कहती हुई आँखें उसकी
शोख लम्हों का पता देने लगी
तेज़ होती हुई साँसें उसकी
ऐसे मौसम भी गुज़ारे हमने
सुबहें जब अपनी थीं शामें उसकी
ध्यान में उसके ये आलम था कभी
भविष्य डरने लगा है, भूत से अब क्या डरना,
जो बीत गया वो हसीन था, आने वाले में ही बस अब मरना।
तस्वीरों में हँसते लोग, हकीकत में तन्हा हैं,
उम्मीदों के इस बोझ में, अब हर सपना अधुरा है।
कौन आया है
कोई नहीं आया है पागल
तेज़ हवा के झोंके से दरवाज़ा खुला है
अच्छा यूँ है
जाने ये किस ध्यान में था मैं
आता तो अच्छा कौन आता
किस को आना था कौन आता
~जौन एलिया 🌻
अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं
रुख़ हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं
चलते रहते हैं कि चलना है मुसाफ़िर का नसीब
सोचते रहते हैं किस राहगुज़र के हम हैं
हम वहाँ हैं जहाँ कुछ भी नहीं रस्ता न दयार
अपने ही खोए हुए शाम ओ सहर के हम हैं
- निदा फ़ाज़ली
मैं ये नहीं कहता कि मिरा सर न मिलेगा
लेकिन मिरी आँखों में तुझे डर न मिलेगा।
जाती है चली जाए ये मय-ख़ाने की रौनक़
कम-ज़र्फ़ों के हाथों में तो साग़र न मिलेगा।
~ वसीम बरेलवी
जुबां से बोल कर तो सिर्फ रिश्ते तोड़े जाते हैं,
अदावत (दुश्मनी) वो है जो खामोशी से रगों में उतर जाए।
अफ़सोस कि चिरागों ने ही घर को जला डाला,
कि आज अवध की साख भरी महफ़िल में बिखर जाए।
कितने जलवे फिज़ाओं में बिखरे मगर
मैने अबतक किसी को पुकारा नहीं,
तुमको देख तो नज़रें ये कहने लगीं,
हमको चेहरे से हटना गवारा नहीं।
तुम अगर मेरी नजरों के आगे रहो,
मैं ज़मीं पर सितारे बिछाता रहूं।
- साहिर लुधियानवी
उस के पहलू से लग के चलते हैं
हम कहीं टालने से टलते हैं
बंद है मय-कदों के दरवाज़े
हम तो बस यूँही चल निकलते हैं
वो है जान अब हर एक महफ़िल की
हम भी अब घर से कम निकलते हैं
क्या तकल्लुफ़ करें ये कहने में
जो भी ख़ुश है हम उस से जलते हैं
✦ जौन एलिया
दर्द-ए-दिल का बयान लोगी,
क्या समझ मेरी दास्तान लोगी।
तुमको अपनी जान कहा है,
क्या सच में मेरी जान लोगी।
तुम बिन कहीं जी नहीं लगता,
ये कैसे बताऊँ कि मान लोगी।
आओ सनम अब लौट आओ,
और कितना इम्तिहान लोगी।।
~
ग़म की दौलत मुफ्त लुटा दूँ,
बिल्कुल नई!
अश्कों में ये दर्द बहा दूँ,
बिल्कुल नई!
उसने तो औकात दिखा दी है,
मैं अपना मयार गिरा दूँ,
बिल्कुल नई, बिल्कुल नई!!
एक नजूमी सबको ख्वाब दिखाता है,
मैं भी अपना हाँथ दिखा दूँ,
बिल्कुल नई!!
~महसर अफरीदी
वो सुनती है
पर लफ़्ज़ों से नहीं
दरमियाँ की ख़ामोशी से
मैं कहता हूँ
पर अफ़साने नहीं
रूह की अनकही सरगोशी से
परते उठती हैं अंदरूनी ताल्लुक से
ना दिल बोझिल होता है कहीं
शायद यूँ ही मिलता है सुकूँ
किसी गहरी हमनफ़सी से
...#
"तुम्हे जो मिला है वो किसी ने खोया होगा,
जिसके साथ तुम हर पल मुस्कुराते हो,
कोई उसके लिए रोया होगा।
हर कोई हारा है यहाँ मोहब्बत में,
जिसके साथ तुम यादें बना रहे हो,
कोई उसकी यादें लेके सोया होगा..."
सितारे जो दमकते हैं
किसी की चश्म-ए-हैराँ में
मुलाक़ातें जो होती हैं
जमाल-ए-अब्र-ओ-बाराँ में
ये ना-आबाद वक़्तों में
दिल-ए-नाशाद में होगी
मोहब्बत अब नहीं होगी
ये कुछ दिन बा'द में होगी
गुज़र जाएँगे जब ये दिन
ये उन की याद में होगी
~मुनीर नियाज़ी