#गुड्डा_गुड्डी_का_खेल_बंद_करो#ढंग_की_पूजा_करो
शिव जी हैं जन्म-मृत्यु में; जिसका प्रमाण श्रीमद्देवीभागवत, स्कंध 3, अध्याय 4-5 में है। जबकि गीता अध्याय 15 श्लोक 17 के अनुसार उत्तम पुरुष, अर्थात अविनाशी पूर्ण परमात्मा तो अन्य है जो सर्व का धारण पोषण करने वाला है।
#गुड्डा_गुड्डी_का_खेल_बंद_करो#ढंग_की_पूजा_करो
शिव जी हैं जन्म-मृत्यु में; जिसका प्रमाण श्रीमद्देवीभागवत, स्कंध 3, अध्याय 4-5 में है। जबकि गीता अध्याय 15 श्लोक 17 के अनुसार उत्तम पुरुष, अर्थात अविनाशी पूर्ण परमात्मा तो अन्य है जो सर्व का धारण पोषण करने वाला है।
#गुड्डा_गुड्डी_का_खेल_बंद_करो#ढंग_की_पूजा_करो
कूर्म पुराण, अध्याय 5 श्लोक 19-21 में लिखा है कि ब्रह्मा, वासुदेव (विष्णु) तथा शंकर की काल के द्वारा ही सर्जना होती है, पुनः वही काल इनका संहार भी करता है। यानी शिव जी नाशवान हुए Sant Rampal Ji Maharaj YouTube Channel
#गुड्डा_गुड्डी_का_खेल_बंद_ककांवड़ यात्रा से पाप ही होते हैं, पुण्य नहीं !
क्योंकि सावन में सबसे ज्यादा जीव उत्पन्न होते हैं जिससे कांवड़ लाने में सबसे ज़्यादा जीव मरते हैं
अमरग्रंथ साहिब में संत गरीबदास जी ने बताया हैंजाSant Rampal Ji Maharaj YouTube Channel
#ढंग_की_पूजा_करो
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कांवड़ से पाप ही प्राप्त होते हैं, पुण्य नहीं। क्योंकि सावन में सबसे ज्यादा जीव उत्पन्न होते हैं जिससे कांवड़ के लाने में सबसे ज़्यादा जीव मरते हैं।
कबीर जी ने कहा है:
कबीर, तीर्थ कर कर जग मुवा, ऊड़ै पानी न्हाय ।
रामहि राम ना जपा, काल घसीटें जाय ।।
#गुड्डा_गुड्डी_का_खेल_बंद_करो#ढंग_की_पूजा_करो
कूर्म पुराण, अध्याय 5 श्लोक 19-21 में लिखा है कि ब्रह्मा, वासुदेव (विष्णु) तथा शंकर की काल के द्वारा ही सर्जना होती है, पुनः वही काल इनका संहार भी करता है। यानी शिव जी नाशवान हुए Sant Rampal Ji Maharaj YouTube Channel
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संक्षिप्त श्रीमद्देवीभागवत के स्कन्ध 3 के अध्याय 4-5, पृष्ठ 138 पर विष्णु जी स्वयं कहते हैं कि मैं (विष्णु), ब्रह्मा और शंकर जन्म-मृत्यु में हैं अर्थात हम नाशवान हैं। तो अविनाशी परमात्मा कौन है तथा उसकी पूजा की विधि क्या है??
#ढंग_की_पूजा_करो 🙏
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अमरग्रंथ साहिब में संत गरीबदास जी ने बताया है:
जा तीर्थ पर कर है दानं । ता पर जीव मरत है अरबानं ॥ गोते-गोते पड़ी है भारं । गंगा जमना गए केदारं ।।#ढंग_की_पूजा_करो
#गुड्डा_गुड्डी_का_खेल_बंद_करो कांवड़ यात्रा, जिसका न गीता में वर्णन है और न वेद में; इसलिए यह एक शास्त्र विरुद्ध साधना है और गीता अध्याय 16 श्लोक 23 के अनुसार शास्त्र विरुद्ध साधना से कोई लाभ नहीं होता। बल्कि इससे पाप ही होता है।
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क्योंकि शिव हैं जन्म-मृत्यु में; जिसका प्रमाण श्रीमद्देवीभागवत, स्कंध 3, अध्याय 4-5 में है। जबकि गीता जी अध्याय 15 श्लोक 17 के अनुसार उत्तम पुरुष, पूर्ण परमात्मा यानी असली शिव तो अविनाशी है जो सर्व का धारण पोषण करने वाला है।
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शिव जी हैं जन्म-मृत्यु में; जिसका प्रमाण श्रीमद्देवीभागवत, स्कंध 3, अध्याय 4-5 में है। जबकि गीता अध्याय 15 श्लोक 17 के अनुसार उत्तम पुरुष, अर्थात अविनाशी पूर्ण परमात्मा तो अन्य है जो सर्व का धारण पोषण करने वाला है।
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क्योंकि कांवड यात्रा, जिसका न गीता में वर्णन न वेद में
गीता अध्याय 17 श्लोक 23 में पूर्ण परमात्मा की भक्ति के संकेतिक मन्त्र ॐ-तत्-सत् का जिक्र है जिसे गीता अध्याय 15 श्लोक 1 में वर्णित तत्वदर्शी संत से प्राप्त करके जप करना होता है।