इस आयु में लज्जा साथ छोड़ ही देती है। कॉन्ग्रेस ने संस्थान विवशता में बनाए क्योंकि शून्य के बाद एक ही आता है। अकेले मोदी ने जितना बना दिया है, वैसा तुम्हारी सात पुश्तों के प्रधानमंत्री में न तो साहस था, न विजन। लौंडियाबाजी और घोटालों के कारण साला देश को चाट कर बर्बाद कर गए और ज्ञान दे रहे हैं विकास का।
1952 में 600-700 जातियाँ दलित थी, बाबा साहेब के संविधान ने 600 और जोड़ दिया, यानी 5000 वर्ष के मनुवादी, ब्राह्मणवादी व्यवस्था ने 600 अछूत जातियाँ दी, 70 साल के बाबा साहेब संविधान ने 600 और जोड़ा। तार्किक रूप से सुधीजन ये बताएँ कि आरक्षण से जातियों का उत्थान हो रहा है या पतन?
SC के 135-145 IAS ऑफ़िसर्स हैं, 50-62000 क्लास 1 ऑफ़िसर्स, डेढ़ से पौने दो लाख क्लास 2 ऑफ़िसर्स हैं इस देश में। अंबेडकर को उनके शिक्षक ने और तत्कालीन महाराज सयाजीराव गायकवाड ने उन्हें विदेश भेजा, फिर छत्रपति शाहूजी महाराज ने उनकी लंदन की पढ़ाई पूर्ण करवाई।
अब प्रश्न यह है कि ऊपर के IAS, क्लास 1 और 2 के लगभग 2 लाख अफ़सरों में से कितनों ने अपनी ही जाति समूह के बच्चों को स्पॉन्सर किया है?
मीना समाज 1000% अधिक ओवर रिप्रिजेंटेड है, जाटव का भी प्रतिनिधित्व SC वर्ग में अधिक है, यादव, कुर्मी, जाट, गुर्जर को OBC में देख लीजिए! तो प्रश्न यह है कि असली आदिवासी, भील कहाँ हैं ST में?
मुसहर, माँझी, वाल्मीकि, सुदर्शन, बहेलिया, बंतार, डोम, हलालखोर, तुरी, पासी, भंगी और मदारगी के बच्चे स्कूल भी पहुँच पा रहे हैं? OBC की लगभग 1,000 जातियों की सरकारी नौकरियों में हिस्सेदारी शून्य या नगण्य है, जैसे कश्यप, केवट, मल्लाह, निषाद, बिंद, राजभर, पाल, बघेल, बढ़ई, कुम्हार, लोहार, तेली, चौरसिया, नाई (सैलानी) और नोनिया!
फिर कहा जाता है कि आर्थिक आधार पर रिजर्वेशन नहीं होना चाहिए, क्योंकि जो दो-चार जातियाँ सारा आरक्षण खा रही हैं, उनकी आर्थिक स्थिति भी ठीक है, पर उन्होंने स्वयं को इन जाति समूहों में राजनैतिक रूप से ब्लैकमेलिंग करके घुसा रखा है, इसलिए वो कभी भी अपनी ही जाति समूहों में आरक्षण नीचे तक नहीं जाने देंगे।
इसीलिए, Reservation पर ReThink, Rationalise, Reform और अंततः Remove करने के लिए हमें चर्चा करनी चाहिए।
चुनाव में प्रतिनिधित्व सबसे सटीक तरीका होता है। जिसकी जनसंख्या अधिक, उसके नेता को उतने वोट। लेकिन विडम्बना देखिए कि यहाँ वास्तव में एकमात्र मापदंड मेरिट ही है।
आपने किसी लोकसभा/विधानसभा चुनाव में कभी सुना है कि सवर्ण प्रत्याशी को 90,000 वोट आने पर भी, सातवें नंबर पर 53,000 पाने वाले दलित को सांसद/विधायक बना दिया गया हो?
जब तुम यहाँ कटऑफ कम नहीं करते, तो परीक्षाओं में क्यों?
@VijayPr60419623@arakshan_hatao1 Pehle likhna toh seekh le bhai, ek sentence likhne mein itni spelling mistakes toh reservation wala hi kar sakta hai 😂
अभिजीत दीपके: इंस्टा युग की क्रांति के तीव्र-स्तंभन और समानुपातिक शीघ्रपतन का वैयक्तिकरण
दीपके ने आह्वान किया कि 20 जून तक प्रधान को हटा दें वरना... कुछ नहीं हुआ। ऐसे चूतियों के कहने पर कुछ होना भी नहीं चाहिए। फिर स्टेज से बोला कि किसान और मज़दूर जंतर मंतर पर पहुँचे। एक मक्खी नहीं पहुँची, गांडुओं का मेला लग गया सो अलग। (गांडू का प्रयोग समलैंगिकों के लिए नहीं कर रहा, इसे 'चूतिया' के समानार्थक के रूप में लिया जाए।)
फिर स्टेज से घोषणा हुई कि 'मेरा लिंग, मेरी मर्ज़ी'! किसने किसके पैंट में हाथ डाल कर वहाँ पेट्रोल सूँघा और कहा कि 'तुम्हारा लिंग, मेरी मर्ज़ी'? बिल्कुल तुम्हारी मर्ज़ी है कि तुम उस से मूतो, सेक्स करो, हस्तमैथुन करो, गुदा-मैथुन करो, कोई नहीं रोकता। और NEET या विद्यार्थियों की आत्महत्या से इस बात का क्या संबंध है?
इनके प्रोटेस्ट से आज़ादी के नारे वाले SFI के भी लोग आए हुए थे, AISA वाले भी थे और AAP वाले भी पानी और केला बाँट रहे थे। इनमें से किसी को भी NEET से मतलब नहीं था, ये केवल अपनी विजिबिलिटी के लिए आए थे।
एक झँटुआ QR कोड ले कर घूम रहा था कि दहिया और दास से DM में बात करने का ₹50 और वीडियो कॉल का ₹500/15 मिनट! साला अलग OnlyFans चल रहा है इधर। ये लोग विद्यार्थियों के लिए तो नहीं आए हैं। वैसे, दिल्ली के श्रमिकों का मिनिमम वेज भी इस से अधिक है।
फिर दीपके फ़र्ज़ी का चिल्लाने लगा कि उसे अरेस्ट किया जा सकता है, पानी बंद कर दिया, लड़कियों के साथ कुछ घटना घट सकती है, टॉयलेट में पानी नहीं है! जब अनुमति ही 5 बजे तक की थी तो अपना पानी, जनरेटर ले कर आते।
कुछ नहीं चला तो हाथ जोड़ कर पुलिस से बोल रहा है कि लोगों को आने दो! अरे नरगधे, लोग हैं कहाँ बे जो आएँगे? केवल अपनी ब्रांडिंग चल रही है कि यार जेल में डाल दो जल्दी से तो मैं भी अगला कन्हैया कुमार बन जाऊँ! कन्हैया बकलोल था, लेकिन उसको बकलोली में भी १ घंटा बोलना आता था, तुम साले पाँच मिनट में बह जाते हो और कहने लगते हो कि खाना बंद कर दिया, हग नहीं पा रहे, लाइट ऑफ हो गई है!
इसकी पूरी इच्छा है कि केवल 20 दिन में ये नेता बन जाए। केजरीवाल को 10 वर्ष घिसाई में लगे, तीन आंदोलन में। कन्हैया जेल गया, JNU में घिसता रहा और BJP ने उसे हीरो बना दिया। फिर बाद के दो आंदोलन देख लीजिए, आपको समझ में आ जाएगा कि CAA वाले जेल में हैं UAPA के साथ और किसान वाले प्रयास पूरा कर रहे हैं लेकिन उन्हें कोई पूछ नहीं रहा।
दीपके इतना इन्सिग्निफिकेंट है कि सरकार इसे आउट ऑफ़ द वे जा कर अनुमति दे रही है कि दिखाओ कितने लोग ला सकते हो। जंतर मंतर पर 500 से अब 1000 पर पहुँचा है, और वो भी रात होते-होते 50 बच कर रहे गए।
ये क्रांति का T20 खेलना चाह रहा है, पर समस्या यह है कि इसे ना बैटिंग आती है, ना बॉलिंग और इसके साथ के खिलाड़ी अपने कन्विनियेंस के हिसाब से आते हैं। यदि आपके प्रवक्ता और कोर ग्रुप केवल दिल्ली में आएँ, लखनऊ-जयपुर-पुणे-अमृतसर-बंगलौर में वो नहीं दिखें, तो समझ जाओ कि दीपके कितने डीप-शिट में है।
अब ये डिजिटल शहादत खोज रहा है कि किसी तरह से कुछ इसके साथ ऐसा हो जाए कि ये स्वयं को महान बता सके। पुलिस इसको ट्रिविअल से ऊपर का होने नहीं दे रही है। ये बेचारा एयरपोर्ट से ही अरेस्ट हो कर हीरो बनना चाह रहा था, और अमित शाह हैं कि बोल रहे हैं इसे भटकने दो, देखते हैं कितना आदमी जुटा लेता है।
अभिजीत दीपके वर्तमान क्रांति के तीव्र-स्तंभन और समानुपातिक शीघ्रपतन का वैयक्तिकरण है। अनुभवहीनता और नल्लेपन के बीच अपनी राह खोजता दीपके राजनीति को एक मार्ग मान कर चल रहा है, पर जब तुम्हारे वैचारिक पिता मिररलेस DSLR के बोके से अब एंड्रॉयड फ़ोन के फ्रंट कैमरा तक गिर चुके हैं, तो तुम तो कहाँ पहुँचोगे, वह लिखा हुआ है।
चूतियों के चक्कर में ना पड़ें।
बहुत बढ़िया निर्णय @JM_Scindia जी! किसी भी प्राइवेट संस्था के पास राष्ट्रीय सुरक्षा की चाभी नहीं होनी चाहिए। इलॉन मस्क के पचास कार्य अच्छे हैं, पर सत्य यह है कि कई देशों के रेजीम चेंज ऑपरेशन में स्टारलिंक का बहुत बड़ा हाथ रहा है। ये केवल अमेरिका के हितों को देखते है।
प्रधानमंत्री @narendramodi भारत की शिक्षा व्यवस्था ठीक करने आए हैं या उसकी बैंड बजाने? @BJP4India से शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में अधिक आशाएँ थीं, इन दोनों ही विषयों पर ये लोग किसी तरह से पासिंग मार्क्स ला पाए हैं।
जावड़ेकर, निशंक, प्रधान… कोई ढंग का नहीं मिला?
एक वह समय था जब महीने में 4000 केस ऐसे होते थे जिसमें रेप, छेड़छाड़ आम बात थी। राजनैतिक प्रश्रय ऐसा कि मुख्यमंत्री उसे ‘लड़कों की गलतियाँ’ कहा करते थे। बिहार ही की तरह, यूपी में सपाई गुंडाराज की हर कहानी आज की पीढ़ी को स्मरण कराना आवश्यक है। सपा वाले आज महिला सुरक्षा की डींग हाँक रहे है!
Oh! Is that so? Why can’t we decide minority benefits from Panchayat level? Whichever community is a minority in panchayat, it will get the minority benefit. Why go on a national basis? If it is social, let’s have at a smaller scale and benefit them.
Women’s reservation bill, as such, has little value beyond optics. It is not going to empower any women except those from families already politically strong in their constituencies.
In 1997, Rabri Devi became Bihar’s first woman CM. Did it empower the women of Bihar in any way? No. Because elevations of women from political families are usually proxies for male authority continuing behind the scenes.
If this bill/law is ever implemented, most parliamentary seats reserved for women will go to female members of existing or former male MPs’ families, because parties give tickets to those who can win. On paper, a woman becomes the MP; in practice, the same authority continues behind the scenes. We’ve already seen this in panchayat and municipal elections, where women have had 33% reservation for years, yet husbands rule as Pradhan-pati or Corporator-pati. Besides that, two members of the same family will now receive lifelong pensions from taxpayers’ money.
There will be exceptions, capable, independent women from non-political backgrounds, but they can and have already succeeded through open competition, even against men. The system doesn’t bar women from contesting. Capable women are already winning.
So unless a clause bars women from families with male MPs/MLAs in the last twenty years, this bill will mainly benefit those with existing political access rather than expand the leadership pool.
सोनिया गाँधी गंगाराम चिकित्सालय में स्वास्थ्य लाभ हेतु गई हैं। फेफड़े का रोग है, दीर्घ काल से है। कई बार विदेश भी जा चुकी है। राहुल, प्रियंका दोनों मिलने गए हैं।
कुछ लोग कह रहे हैं कि क्या राहुल गाँधी ने चिकित्सक की जाति पूछी?
मैं कहता हूँ, निस्संदेह पूछी ही होगी। तभी तो वह ऐसे तथ्य और आँकड़े लाते हैं कि ‘आप अपोलो चले जाइए, वहाँ आपको एक दलित डॉक्टर नहीं मिलेगा।’ तो बिना पूछे ये तथ्य कैसे इंदिरा भवन के सभागार में रखा जाता है?
राहुल गाँधी कई बार केवल यही आँकड़े ही लाने के लिए भ्रमण पर निकल जाते हैं। आपको क्या लगता है कि कृषक, कुली, ड्राइवर, मैकेनिक, विद्यार्थी, मछुआरा, श्रमिक आदि बनते राहुल क्या करने जाते हैं।
वो यही आँकड़े एकत्र करते रहते हैं। सरकार तो ऐसा करती नहीं, कास्ट सेंसस नहीं, जनगणना नहीं… तो राहुल गाँधी स्वयं यह कार्य करते हैं जो सरकार को करना चाहिए।