यह CJP टीम के सदस्य है…जो स्कूल निरीक्षण करने आशुतोष रांका के साथ गए थे…जो स्कूल भैंस के तबेले में चल रही थी…इस मारपीट में हाथ में बड़ा फ्रेक्चर हुआ है…SMS अस्पताल में इसका इलाज जारी है…जो भी इस घटना में मारपीट का समर्थन कर रहें है वो राजस्थान की सस्कृति का अपमान कर रहें है।
इस तरह की संस्कृति कतई अस्वीकार्य है…जिम्मेदारों से निवेदन है आंख ना बंद करें इस घटना के दोषियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई हो।
#Rajasthan
मैने राजनीति का वाह दौर देखा है जब मैं गुड़ामालानी से चुनाव लड़ा था सब राजपूत रावली हमारा खुलकर समर्थन करते थे..!!
पंचायत समिति में 32 में से 22 जाट सरपंच थे उसके बाद भी एक बिशनोई को प्रधान बनाया गया...!!
लेकिन वर्तमान की राजनीतिक में जातिवाद हावी है..!!
मेरा आप सब से यही सवाल है की जातिवाद को सबसे पहले कौन लाया है..!!
यह हकीकत है की वर्तमान में लोग विकास नहीं जाति देखकर वोट करते हैं
RPSC को 40% वाला नियम नहीं हटाना चाहिए। अभ्यर्थियों द्वारा 40% ना ला पाना एक संस्थागत असफलता है जो कि प्राथमिक स्कूलों से शुरू होकर कॉलेजों और कोचिंग्स तक जाती है। विषय विशेषज्ञों द्वारा पेपर के स्तर पर बहस ज़रूर होनी चाहिए पर 40% को एग्रीगेट में बदलना एक ख़राब कदम है जो आगे से ख़राब व्यवस्था को और खराब करेगा। सीट्स सिर्फ़ भरने के लिए भरना सही मानसिकता नहीं है।
1st grade GK के पेपर मे प्रत्येक भाग को पढ़ के जाने पर 40% (30 question out of 75) आ सकते है। बेशर्ते हर टॉपिक को पढ़ा हो
GK के पेपर में 40% के राइडर को हटा कर एग्रीगेट 40% करने का कोई मतलब नहीं रह जाएगा
इसलिए इस ना हटाया जाए, एक अभ्यर्थी की अपील
@RPSC1@RajCMO@madandilawar
नेपाल–बांग्लादेश की तरह अंतरराष्ट्रीय साज़िश बताकर मूल मुद्दे से ध्यान भटकाना समाधान नहीं है।
आंदोलन की शुरुआत चाहे किसी संगठन के नेतृत्व में हुई हो और बाद में राजनीतिक दल उससे जुड़े हों, यह अलग विषय है। असली प्रश्न यह है कि शिक्षा व्यवस्था और परीक्षाओं की विश्वसनीयता को लेकर युवाओं के मन में गहरा असंतोष पैदा हो चुका है। आज लगभग हर घर में यह चर्चा है कि जब इतनी गंभीर घटनाएँ हुईं, तो जवाबदेही किसकी तय होगी?
यदि किसी परीक्षा में गंभीर अनियमितताओं के आरोप लगते हैं और बड़ी संख्या में अभ्यर्थी प्रभावित महसूस करते हैं, तो सरकार का पहला दायित्व पारदर्शिता, संवेदनशीलता और जवाबदेही दिखाना होता है। कई बार नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करने का संकेत भी जनता का भरोसा मजबूत करता है। जब ऐसा नहीं दिखता, तो लोगों में यह संदेश जाता है कि उनकी पीड़ा को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा। यही भावना सरकार के अन्य अच्छे कार्यों पर भी प्रश्नचिह्न लगा देती है।
कहते हैं, चीनी स्वाद में मीठी होती है, लेकिन अधिक मात्रा में वही बीमारी का कारण भी बन जाती है। सरकार के आसपास भी यदि ऐसे लोग हों जो केवल खुशामद में वास्तविकता छिपाएँ और सही सलाह देने के बजाय हर निर्णय का समर्थन करते रहें, तो उनका नुकसान अंततः सरकार और देश दोनों को उठाना पड़ता है।
प्रदर्शन के शुरुआती चरण में यदि कहीं आवश्यकता से अधिक बल प्रयोग हुआ हो, तो उसका संदेश दूर तक जाता है। ऐसी घटनाएँ कई बार उस मुद्दे को और व्यापक बना देती हैं, जो शायद संवाद से सुलझ सकता था। लोकतंत्र में असहमति का उत्तर संवाद और संवेदनशीलता से देना अधिक प्रभावी होता है।
साथ ही, आंदोलन के वर्तमान स्वरूप में यदि कहीं हिंसा या कानून-व्यवस्था बिगड़ने की घटनाएँ हो रही हैं, तो उसका समर्थन नहीं किया जा सकता। शांतिपूर्ण विरोध लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन हिंसा किसी भी आंदोलन की नैतिक शक्ति को कमजोर करती है। यह भी संभव है कि किसी बड़े आंदोलन में कुछ असामाजिक तत्व घुसकर उसे भटकाने की कोशिश करें। इसलिए सरकार और आंदोलनकारी दोनों की जिम्मेदारी है कि स्थिति को शांतिपूर्ण बनाए रखें।
मेरी समझ में अधिकांश युवा अपनी बात, अपने भविष्य और शिक्षा व्यवस्था में विश्वास बहाल करने की मांग लेकर बैठे हैं। यदि सरकार ईमानदारी से संवाद करे, स्पष्ट रोडमैप दे और जवाबदेही सुनिश्चित करे, तो बड़ी संख्या में युवा सम्मानपूर्वक अपने घर लौटेंगे। चिंगारी को हवा देने के बजाय उसे विश्वास और संवाद से बुझाना ही राष्ट्रहित में होगा।
और अंत में, भारत के युवाओं की तुलना किसी दूसरे देश की परिस्थितियों से करना उचित नहीं है। हर देश का सामाजिक और राजनीतिक संदर्भ अलग होता है। भारतीय युवाओं की बात उनके अपने मुद्दों, उनकी अपनी आकांक्षाओं और हमारे लोकतांत्रिक मूल्यों के आधार पर सुनी जानी चाहिए।
जय हिन्द। जय भारत।
अगर अब भी कुछ बेशर्म लोगों को यह भ्रम है कि हर जनआक्रोश को “विदेशी ताक़तों का नैरेटिव” बताकर दबा देंगे, तो फिर उनका मालिक सिर्फ़ भगवान ही है।
अहंकार जब विवेक पर हावी हो जाता है, तब सच सुनाई देना बंद हो जाता है। कुछ लोग अपने दंभ में इतने डूब चुके हैं कि वे केवल अपनी साख ही नहीं, बल्कि मोदी सरकार के अच्छे फैसलों और उपलब्धियों को भी जनता की नज़रों में धूमिल करने का काम कर रहे हैं।
सत्ता को सबसे ज़्यादा नुकसान विपक्ष नहीं, बल्कि अहंकार में डूबे अपने ही लोग पहुँचाते हैं।
इस से अच्छा तो अंग्रेजों का राज था..मै नहीं जीना चाहता ऐसे राज में..या तो मुझे न्याय मिले या फिर मैं जान दूंगा..👇
( आज समाज के हर तबके को न्याय के लिए सड़क पर उड़ाना पड़ रहा है..कोई जंतर मंतर पर पेपर लीक और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर आमरण अनशन पर बैठा है तो कहीं विकास के नाम पर ऋषिकेश में पर्यावरण और पेड़ कटाई के खिलाफ सड़क पर उतरना पड़ रहा है..ये तस्वीर बुंदेलखंड के पढ़े लिखे सामाजिक कार्यकर्ता और लोगों की है। जिन्हें संविधान द्वारा मिले अपने मौलिक हक के लिए खुद की मृत्यु शैय्या बनाकर प्रदर्शन करना पड़ रहा है..आज देश का हर तबका घोर निराशा के वातावरण में जी रहा है..)
बुंदेलखंड का पूरा गांव चिता आंदोलन कर रहा है और पूरे देश की जनता सरकार का गुणगान कर रही है।
में बेबस मजबूर और असहाय लोगों का दुख दर्द देखकर अपना दर्द बहुत छोटा सा लगता है क्योंकि यह जो पीड़ा झेल रहे हैं उसके सामने एक इंसान की पीड़ा कुछ भी नहीं।😢😢
#Trending#Delhipolice#Rahul
जनता बची नहीं है, जो थोड़ी बहुत है वह बचे होने का सबूत दिए जा रही है। दिल्ली में प्रदर्शन पर प्रहार है, दिल्ली से दूर के प्रदर्शन का तिरस्कार है। अच्छी बात है यह युवा लगातार कई दिनों से रिपोर्ट कर रहाहै। कोई नया चैनल मालूम होता है। भारत लोकतंत्र के नाम पर उसकी भावनाओं का बचा हुआ छोटा छोटा द्वीपसमूह बन कर रह गया है। बाकी सारे बडे़ मैदानों, पहाड़ों और नदियों को हर लिया गया है।
गोदी मीडिया आपको ये ख़बर नहीं दिखाएगा लेकिन ये ख़बर बेहद जरूरी है.
केन-बेतवा लिंक परियोजना के विरोध में बुंदेलखंड के लोग पानी में खड़े होकर प्रदर्शन कर रहे हैं, लेकिन सरकार के कान पर जूँ नहीं रेंग रही है.
आदिवासियों के पास आंदोलन की सबसे बड़ी प्रयोगशाला है। इस वीडियो में आंदोलन के अनूठे प्रयोग को देखिए।छतरपुर और पन्ना जिलों में केन-बेतवा लिंक परियोजना के विरोध में इन दिनों आदिवासी 'चिता सत्याग्रह' और 'फांसी सत्याग्रह' जैसे प्रभावीशाली आंदोलन कर रहे हैं।
आदरणीय @Sukhjinder_INC रंधावा जी,
राजस्थान कांग्रेस का एक साधारण कार्यकर्ता होने के नाते आपसे अनुरोध करना चाहता हूँ। पिछले लगभग ढाई वर्षों से आप राजस्थान कांग्रेस के प्रभारी हैं, लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण है कि प्रदेश का बड़ा कार्यकर्ता वर्ग आज भी आपके प्रत्यक्ष संवाद और मार्गदर्शन की प्रतीक्षा कर रहा है। प्रभारी का दायित्व केवल बैठकों, नियुक्तियों और बयानबाज़ी तक सीमित नहीं होता, बल्कि संगठन की नब्ज़ पहचानना, कार्यकर्ताओं के बीच पहुँचना और उनकी आवाज़ को नेतृत्व तक पहुँचाना भी होता है।
राजस्थान का कार्यकर्ता आज यह प्रश्न पूछने को मजबूर है कि क्या संगठन केवल नेताओं तक सीमित रह गया है? क्या वर्षों से कांग्रेस के लिए संघर्ष करने वाले एनएसयूआई, युवा कांग्रेस, सेवादल, महिला कांग्रेस और ब्लॉक स्तर के समर्पित कार्यकर्ताओं से संवाद करना अब प्राथमिकता नहीं रहा?
कांग्रेस की सबसे बड़ी ताकत उसका समर्पित कार्यकर्ता है। वही कार्यकर्ता जिसने सत्ता में रहते हुए भी संगठन को मज़बूत किया और विपक्ष में रहते हुए भी झंडा नहीं छोड़ा। लेकिन जब वही कार्यकर्ता अपने प्रभारी से मिलने और अपनी बात कहने के अवसर से वंचित रह जाए, तो स्वाभाविक रूप से निराशा जन्म लेती है।
यदि प्रभारी कार्यकर्ताओं तक नहीं पहुँचेगा, तो कार्यकर्ताओं का विश्वास कैसे मज़बूत होगा? यदि जमीनी कार्यकर्ताओं की बात सुने बिना संगठन चलेगा, तो संगठन की वास्तविक स्थिति का आकलन कैसे होगा?
आपसे आग्रह नहीं, बल्कि संगठन के हित में अपेक्षा है कि अब औपचारिकताओं से आगे बढ़िए। राजस्थान के प्रत्येक जिले का दौरा कीजिए, बूथ से लेकर ब्लॉक और जिला स्तर तक कार्यकर्ताओं से खुला संवाद कीजिए। कांग्रेस को मज़बूत करने का रास्ता बंद कमरों से नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं के बीच से होकर जाता है।
आज भी लाखों कांग्रेस कार्यकर्ता बिना किसी पद, टिकट या व्यक्तिगत स्वार्थ के केवल राहुल गांधी जी की विचारधारा और कांग्रेस की सोच के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उन्हें केवल भाषण नहीं, बल्कि नेतृत्व का साथ और विश्वास चाहिए।
समय अभी भी है। यदि कार्यकर्ता मज़बूत होगा तो संगठन मज़बूत होगा, और यदि संगठन मज़बूत होगा तो कांग्रेस का भविष्य भी मज़बूत होगा।
सादर, एक समर्पित कांग्रेस कार्यकर्ता
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