पार्ट 2 :
28 अक्टूबर 1937 को कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक कलकत्ता में हुई जिसमें गांधी, नेहरू, सुभाष बोस, सरदार पटेल, राजेंद्र प्रसाद, मौलाना आज़ाद, जे.बी. कृपलानी, नरेंद्र देव शामिल थे जिसमें गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर के सुझाव को स्वीकार किया गया।
अगर शुरुआती दो स्टैंजा राष्ट्रगीत के लिए अपर्याप्त होते तो संविधान सभा ने पाकिस्तान अलग होने के बाद पूरा वंदे मातरम राष्ट्रगीत के लिए स्वीकार किया होता 24 जनवरी 1950 की डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद की घोषणा से 1937 के निर्णय को न माना होता।
व्यवहार में 1937 के पहले से ही ज्यादातर अवसरों पर दो ही स्टैंजा गाए जाते थे और 1937 का निर्णय ने उसे औपचारिक बनाया था ताकि मुस्लिम लीग के दुष्प्रचार को खत्म किया जा सके। इसका प्रमाण है कि 26 अक्टूबर 1937 के पत्र में टैगोर ने नेहरू को लिखा कि राष्ट्रीय गीत व्यवहार में “spontaneously come to consist only of the first two stanzas” अर्थात प्रयोग में वह दो अंतरों तक सीमित रूप ग्रहण कर चुका था।
29 अक्टूबर 1937 को नेहरू ने AICC में CWC के निर्णय को समझाते हुए कहा कि वंदे मातरम के बाद के 4 स्टैंजा भारत के अन्य हिस्सों में “seldom used” थे और समिति ने “existing practice” को मान्यता दी। यानि पूरा वंदे मातरम कुछ ही हिस्सों में कभी कभार गाया जाता था, ज्यादातर शुरुआती दो स्टैंजा ही प्रचलन में थे।
वंदे मातरम पर जो बखेड़ा भाजपा खड़ा कर रही है वो सिर्फ राजनीति है। मोदी सरकार 2014 से सत्ता में है, 12 साल बाद वन्दे मातरम के अंतिम चार स्टैंजा की याद क्यों आई है?
नेहरू को वंदे मातरम को काट कर स्वीकार करने के लिए जिम्मेदार बताना तो एकदम बेईमानी है। जो भी निर्णय था सबका सामूहिक निर्णय था और तार्किक निर्णय था।
स्वतंत्रता आंदोलन में मुझे सबसे ज्यादा महात्मा गांधी और भगत सिंह पसंद हैं नेहरू नहीं लेकिन मुझे नेहरू को डिफेंड करने में इतना लिखना पड़ रहा क्योंकि नेहरू भी वैसे नहीं थे जैसा संघी और भाजपाई उन्हें बताते हैं।
भाजपा को एक बात समझनी होगी कि स्वतंत्रता आंदोलन की कांग्रेस और आज की कांग्रेस में फर्क है। आज की कांग्रेस को घेरने के लिए स्वतंत्रता सेनानियों के फैसलों पर सवाल उठाने की हैसियत नहीं रखते भाजपा नेता। सिर्फ नेहरू को झूठा बदनाम करने के लिए बार बार आप आजादी की लड़ाई के फैसलों को गलत घोषित नहीं कर सकते। स्वतंत्रता आंदोलन के समय के लोग छोटी सोच से ऊपर थे, उनके लक्ष्य महान थे, वो सबसे हित को ध्यान में रख कर फैसले करते थे जो बात आज की भाजपा के बारे में कतई नहीं कही जा सकती। गांधी, नेहरू, सुभाष, पटेल, डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद और गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर बहुत ऊंचे लोग थे।
बौनों को हिमालय जैसे व्यक्तित्वों का कद नापने की इजाजत नहीं दी जा सकती।
वंदे मातरम। जय हिंद!
अर्धसत्य की दुकान मंडल जी! नेहरू सिर्फ 1937 में अध्यक्ष नहीं थे,1929 के लाहौर अधिवेशन के भी अध्यक्ष थे जब पूर्ण स्वराज की मांग की गई,तो क्या पूरा श्रेय नेहरू को दे देंगे लाहौर अधिवेशन का?
वो स्वतंत्रता आंदोलन की कांग्रेस थी मोदी जी की भाजपा नहीं, उस समय निर्णय सबकी सहमति से होता था।
पूरा सच ये रहा👇( दो पोस्ट का थ्रेड)
पार्ट 1 :
निर्णय कांग्रेस वर्किंग समिति का था जिसमे नेता जी सुभाष चंद्र बोस, सरदार पटेल, राजेंद्र प्रसाद, मौलाना आज़ाद, जे.बी. कृपलानी, नरेंद्र देव सभी प्रमुख लोग शामिल थे। यहां तक कि 1934 में कांग्रेस से इस्तीफा दे चुके गांधी जी भी उस बैठक के समय मौजूद थे। किसी भी सदस्य ने निर्णय का विरोध नहीं किया था क्योंकि निर्णय गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर की लिखित सलाह पर हुआ था।
गुरुदेव ने सलाह दी ही क्यों थी? इसलिए दी क्योंकि मांगी गई। मांगी क्यों गई? इसलिए क्योंकि वंदे मातरम पर मुस्लिम लीग और जिन्ना की साम्प्रदायिक राजनीति को बेअसर किया जा सके। सलाह मांगने का सुझाव किसने दिया? नेता जी सुभाष चंद्र बोस ने। राय मांगने गया कौन? जवाहर लाल नेहरू क्योंकि वो अध्यक्ष थे उस समय।
जिन्ना उस समय वंदे मातरम पर कम्युनल राजनीति क्यों कर रहा था जबकि वंदे मातरम तो उस समय से गाया जा रहा था जब जिन्ना कांग्रेस में हुआ करता था? उत्तर है गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935 के तहत हुए प्रांतीय चुनावों में मुस्लिम बहुल ज्यादातर सीटों पर भी कांग्रेस जीत गई थी इसलिए जिन्ना के सामने राजनीतिक अस्तित्व का संकट आ गया था। यही कारण है 1937 से ही जिन्ना ने वो घोर साम्प्रदायिक रूप अपनाया जो उसकी आज की पहचान है। 1937 से पहले वंदे मातरम पर कोई गंभीर विवाद नहीं था और सिर्फ 1923 के काकीनाडा अधिवेशन में मौलाना मोहम्मद अली जौहर द्वारा आपत्ति वाली घटना के अलावा कभी विरोध भी नहीं हुआ था और उस बार भी आपत्ति के बावजूद गाया गया था। मौलाना कट्टर थे लेकिन कांग्रेस सबका मंच था।
कांग्रेस के अधिवेशनों मे वंदे मातरम गाया जाता था लेकिन हर बार ही पूरा गाया जाता हो इसका प्रमाण नहीं है, सिर्फ 1905 के बनारस अधिवेशन में पूर्ण वंदे मातरम् के सार्वजनिक गायन का प्रमाण है। वंदे मातरम मात्रभूमि के प्रति भावना की अभिव्यक्ति था, कोई आनंदमठ पूरा पढ़ने की जरूरत नहीं थी बल्कि आनंदमठ उपन्यास तो अंग्रेजो के खिलाफ संघर्ष का प्रतिनिधित्व भी नहीं करता था। आनंदमठ संन्यासी विद्रोह पर आधारित उपन्यास है जिसका कथानक 1760 से 1800 के बीच बंगाल में हुए वास्तविक संन्यासी विद्रोह के इतिहास से भिन्न है। वास्तविक संन्यासी विद्रोह ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ था जबकि आनंद मठ का संन्यासी विद्रोह मुस्लिम शासन के खिलाफ है।
1937 में दो स्टैंजा के गायन का औपचारिक फैसला मुस्लिम लीग से समझौते के लिए नहीं उसकी कम्युनल राजनीति की धार भोथरी करने के लिए था और वो चर्चा भी नेहरू ने नहीं शुरू की थी।
मुस्लिम लीग की हरकतों को देखते हुए लीग के लखनऊ अधिवेशन से पहले ही 28 सितंबर 1937 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने सरदार वल्लभ भाई पटेल को पत्र लिखकर वंदे मातरम् को लेकर पैदा हो रहे विवाद और आपत्तियों का उल्लेख किया था और उम्मीद की थी कि कांग्रेस वर्किंग कमेटी इस विषय पर स्पष्ट रुख अपनाए। यानि मुस्लिम लीग जनता में नफ़रत फैला रही थी।
इसके 17 दिन बाद 15 अक्टूबर 1937 को मुस्लिम लीग का लखनऊ अधिवेशन हुआ था जिसमें जिन्ना ने कांग्रेस की नीतियों और वंदे मातरम् के सार्वजनिक प्रयोग पर आपत्ति की थी।
उसके अगले दिन 16 अक्टूबर 1937 को सुभाष चंद्र बोस जी ने गुरुदेव टैगोर को पत्र लिख कर पूछा था कि कांग्रेस को वंदे मातरम् पर क्या रुख अपनाना चाहिए?
उसके अगले दिन 17 अक्टूबर 1937 को नेता जी ने नेहरू को पत्र लिखा और सुझाव दिया कि नेहरू इस विषय पर टैगोर जी से स्वयं चर्चा करें।
20 अक्टूबर 1937 को नेहरू ने इलाहाबाद से सुभाष बाबू को उत्तर में लिखा कि वंदे मातरम पर हंगामा “to a large extent a manufactured one by the communalists” था। उन्होंने लिखा कि कांग्रेस को सांप्रदायिक राजनीति के सामने झुकना नहीं चाहिए, लेकिन जहाँ वास्तविक शिकायत हो उसे संबोधित करना चाहिए। नेहरू ने नेता जी को को बताया कि वे 25 अक्टूबर की सुबह कलकत्ता पहुँचेंगे, ताकि रविन्द्र नाथ टैगोर जी और दूसरे नेताओं से बात कर सकें।
26 अक्टूबर 1937 को रवीन्द्रनाथ टैगोर जी ने नेहरू को लिखा कि वंदे मातरम् के प्रारंभिक हिस्से में मातृभूमि की सुंदरता और कल्याणकारी स्वरूप की अभिव्यक्ति से कोई समस्या नहीं थी लेकिन पूरे गीत को आनंदमठ के संदर्भ के साथ पढ़ने पर मुस्लिम संवेदनाएँ आहत हो सकती हैं।
(दूसरा हिस्सा रिप्लाई में पढ़ें)
आज़ादी की लड़ाई सिर्फ दिल्ली, मुंबई, लखनऊ या किसी बड़े शहर की तक ही नहीं थी। वह गाँव की चौपाल तक पहुँची थी, खेतों की मेड़ तक पहुँची थी, औरतों की चक्की तक पहुँची थी और बच्चों की लोरियों तक पहुँची थी।
जिस समाज के पास साधन कम थे, उसके पास सपने बहुत बड़े थे। पेट आधा भरा हो सकता था, लेकिन आज़ादी का सपना पूरा था।
इसका कारण गांधी जी थे।
उनकी टीम में नेहरू जी, पटेल जैसे लोग थे, जो गांव गांव कस्बे कस्बे घूम कर लोगों को जागृत कर रहे थे।
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महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों में गाई जाने वाली इन ओवियों को देखिए।
आज़ादी की लड़ाई के समय पूरे देश में गांव गांव में लोग आज़ादी के लिए लड़ रहे लोगों का ह्रदय से सम्मान करते थे।
ये कईयों के लिए नायक तो कईयों के लिए देवता बन गए थे।
अपने बच्चों को लोरियां सुनाते थे इन क्रांन्तिकारियों के नाम की। अपने बच्चों को इनके जैसा बनाना चाहते थे।
उस समय का भारतीय समाज जो कि दरिद्रता और अभाव में जी रहा था, इन नायकों में अपना आदर्श ढूंढता था।
इन नायकों के बलिदान और त्याग को देखते थे। इनमें इन्हें आशा दिखती थी, गुलामी से मुक्ति मिलने पर स्वराज में सब कुछ अच्छा होगा।
ये लोरी महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों में गाई जाती थी।
लोरी के साथ साथ महिलाएं चक्की चलाते समय साथ बैठकर भी ये गीत गाती थीं।
गांधी माझा सखा ग, ओवी त्याला गाईन
तुरुंगात जाईन मी, स्वराज्य मिळवीन
कस्तुर माझी माता ग, वंदिन तिजला आता ग
सुभाष माझा भ्राता त्याच्या चरणी ठेवीन माथा ग
टिळक गोखले नौरोजी, अब्दुल गफारखान नेहरूजी
अरुणा असफ आली, लक्षुमी बाई कमला बहिण ती माझी
भगत सिंग आणि दत्त वीर, राजगुरु शिरीषकुमार
देशासाठी प्राण अर्पूनी अर्पण केले रणी शीर
नाना पाटील किसनवीर आणिक पांडू मास्तर
गुंडांना त्या पत्र्या ठोकून केले बहूत जर्जर
नाना पाटील नाही एकला प्रांत सातार्याच्या दिमतीला
घरोघरीचे शूर शिपाई आहेत त्यांच्या मदतीला
ऐशा ओव्या गाईला साबळे बंधूनी रचईल्या
अंतकरणी ठसल्या त्या मी <<पिल्लू>> साठी गाईल्या
(इसका अनुवाद )
गांधी मेरे सखा हैं, उनके लिए सन्तों के पवित्र गीत गाऊँगी।
जेल में जाऊंगी , स्वराज मैं लाऊंगी...
कस्तूर मेरी माँ हैं, उनको मैं वंदन करती हूं...
सुभाष,टिळक, गोखले, नौरोज़ी, अब्दुल गफ्फार खान नेहरू जी, मेरे भाई हैं, उनके चरणों पर मेरा मस्तक है।
अरुणा आसफ अली, लक्ष्मी बाई, कमला ये मेरी बहने हैं...
भगतसिंह और दत्त वीर हैं, राजगुरु शिरिशकुमार के साथ जिन्होंने रण में देश के लिए अपने प्राण न्यौछावर किये।
नाना पाटिल ,किसन वीर और पांडु मास्टर ,
इन लोगों न बदमाशों (अंग्रेजों) की खूब पिटाई कर के उन्हें जर्जर कर दिया।
सतारा में नाना पाटिल ने अकेले ही जिम्मेदारी नहीं ली है,
यहां घर घर में शूरवीर सिपाही हैं उनकी सहायता के लिए
ये संतवाणी साबळै बन्धुओं ने रची है,
यह अपने ह्रदय में रखकर मैं अपने (बच्चे का नाम) के लिए गा रही हूं.
यह सिर्फ गीत नहीं था। यह उस दौर के आम भारतीय की राजनीतिक चेतना थी।
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कस्तूरबा गांधी “माता” थीं।
सुभाष चंद्र बोस “भ्राता” थे।
तिलक, गोखले, दादाभाई नौरोजी, अब्दुल गफ्फार खान और नेहरू इन सबके नाम उसी लोकगीत में आते हैं।
अरुणा आसफ अली, रानी लक्ष्मीबाई और कमला बहनों की तरह।
भगत सिंह, राजगुरु, शिरीषकुमार और दूसरे बलिदानी देश के लिए प्राण देने वाले वीर।
सोचिए, जिस देश में आज राजनीतिक दल अपने नेताओं के नाम बच्चों को याद करवाने के लिए करोड़ों रुपये के प्रचार अभियान चलाते हैं, वहाँ उस समय गरीब ग्रामीण महिलाएँ बिना किसी आईटी सेल के बच्चों को स्वतंत्रता सेनानियों के नाम याद करवा रही थीं।
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बस एक चक्की थी, कुछ अनाज था, घर का काम था और आज़ादी का सपना था।
और गीत था।
यही फर्क है जनमानस में बसे नायक और प्रचार से बनाए गए नायक में।
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ओवी में आगे नाना पाटील, किसनवीर और पांडू मास्तर का भी उल्लेख आता है।
सतारा के स्वतंत्रता आंदोलन की जमीन पर नाना पाटील जैसे लोगों ने अंग्रेजी सत्ता को चुनौती दी थी। उनके नेतृत्व में समानांतर शासन की प्रयोगधर्मी राजनीति तक देखने को मिली।
और गीत कहता है नाना पाटील अकेले नहीं हैं।
घर-घर में शूरवीर सिपाही हैं।
कितनी बड़ी बात है!
आज किसी नेता के समर्थन में दस लोग खड़े हो जाएँ तो सोशल मीडिया पर उसे जनता का महासागर घोषित कर दिया जाता है।
उस समय एक गाँव में सचमुच घर-घर से लोग निकलते थे।
◾◾
आज सवाल यह नहीं है कि स्वतंत्रता संग्राम में किसने क्या किया।
सवाल यह है कि किसका नाम पाठ्यपुस्तक में रहेगा, किसका नाम मंच पर लिया जाएगा, किसकी तस्वीर लगेगी और किसकी विरासत पर राजनीति की जाएगी।
क्यों?
क्या फर्क पड़ता है?
नाम तो नाम है!
लेकिन फर्क पड़ता है।
बहुत बड़ा फर्क पड़ता है।
(1/2)
निशिकांत दुबे के निम्न बौद्धिक और चारित्रिक स्तर से परिचित होने के बावजूद एक बार को विश्वास नहीं हुआ कि एक सांसद ये पोस्ट कर सकता है। दुबे जी की ये पोस्ट कई स्तरों पर निंदनीय और बेहद शर्मनाक है।
1. कामाग्नि जैसे शब्द का प्रयोग बुजुर्ग महिला के लिए जो इस दुनिया में नहीं अत्यंत घृणित कार्य है। ये लोग भारतीय संस्कृति के झंडाबरदार होने का ढोंग करते हैं।
2. पहली फोटो में फिडेल कास्त्रो हैं, ये फोटो 1983 में दिल्ली में हुए गुट निरपेक्ष सम्मेलन की है जिसके मंच से फिडेल कास्त्रो ने इंदिरा गांधी को अपनी बहन बोला था। सोच कर देखिए हम मेजबान थे, मेहमान ने हमारी प्रधानमंत्री को बहन बोला और उनके मरने के बाद एक पतित व्यक्ति भारतीय इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाओं पर कैसी अश्लील दृष्टि डाल रहा है!
3. दूसरी फोटो में यासर अरफात हैं जिन्होंने कई मौकों पर इंदिरा गांधी को अपनी बड़ी बहन बताया था। इंदिरा जी की हत्या के बाद अंतिम संस्कार के समय भी अराफात भारत आए थे और रो रहे थे। डिग्री दुबे ने इस रिश्ते पर भी अपनी गन्दी नजर डाली है।
4. इंदिरा गांधी कोई सामान्य महिला रही होतीं तो भी दुबे की पोस्ट घटिया ही मानी जाती लेकिन वो तो भारत की पूर्व प्रधानमंत्री थीं जिन्होंने पाकिस्तान के दो टुकड़े किए और जो देश के लिए गोली खा कर बलिदान हुईं। इतना कृतघ्न बना दिया है क्या संघियों ने इस देश को दुष्प्रचार से कि वो अपने पुरखों के लिए ऐसी नीच टिप्पणियां देख कर भी दुबे और इनकी पार्टी का साथ देगा? ये सवाल लोगों से है जो इनके और इनके जैसों का समर्थन करते हैं।
देश के लिए गोली खा कर मरने वाली पंडित जवाहर लाल नेहरू की लड़की इस देश से बेहतर सम्मान की हकदार है। निशिकांत दुबे को तो चुल्लू भर पानी भी मना कर देगा डुबाने से पर सोचना अब जनता को है कि राजनीतिक ठगी के लिए धर्म के नाम पर अधर्म और संस्कृति के नाम पर भारतीय संस्कृति का विनाश कब तक स्वीकार करती रहेगी वो ?
पकड़ा गया मोहन भागवत का झूठ
1933 का कांग्रेस अधिवेशन जलगांव में नहीं, कलकत्ता में हुआ था।
तिरंगा पहली बार 1933 में नहीं, 1929 में फहराया गया। पंडित नेहरू ने रावी के तट पर पहली बार तिरंगा फहराया था।
RSS ने अपने कार्यालय पर 52 साल तिरंगा नहीं फहराया क्योंकि जब तिरंगा राष्ट्रीय झंडे के रूप में अपनाया गया तब RSS ने इसे अशुभ बताया था।
दिल्ली की झुग्गी झोपड़ी में रहने वाले इरफ़ान की आवाज़ में दर्द है सुनिए इस कला को जो दिल से निकलती है।
इतना सच्चा इतना असरदार बोलने वाला शायद हमने आज तक नहीं सुना होगा।
आप भी सुनिए और सच बताइए किसी नेता की आवाज़ में इतनी सच्चाई सुनी है आपने?
जिसको सुनते सुनते अंदर आत्मा तक रोने लगे!
शायद नहीं, इतनी तो नहीं।
मगर इरफ़ान की आवाज़ में दर्द है पीड़ा है, साथ ही संविधान की प्रस्तावना पर क्या गज़ब मोनोलॉग है।
Thank you @RajatpandeyJF , @TheLallantop for this masterpiece ❤️
किसी यूनिवर्सिटी में शिक्षामंत्री गए।
प्राइवेट यूनिवर्सिटी थी। वहां तमाम इंफ्रास्ट्रक्चर, कोर्सेज, टीचर्स से इंटरेक्शन हुआ। इस क्रम में लाइब्रेरी भी दिखाई गयी। बेहतरीन कलेक्शन, शानदार किताबे, सिस्टम, माहौल, डिजिटल इंतजाम। बच्चे, लाइब्रेरी में भरे पड़े हुए थे।
मंत्रीजी व्यवस्था देख बहुत प्रसन्न हुए। लेकिन एक चीज की कमी खटकी। उन्होंने साथ चल रहे अकादमिक प्रभारी को सलाह दी - इतनी बढ़िया लाइब्रेरी है। आप इसमे एक रेस्टोरेंट क्यो नही खोल देते।
बहुत चलेगा।
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उस अकादमिक बन्दे ने, एक दिन हंसते हंसते यह बात बताई। कहा- हमारी उम्मीद थी कि वे यूनिवर्सिटी, या लाइब्रेरी से खुश होकर कुछ ग्रांट देंगे। कोई वादा करेंगे, कोई नया इंफ्रास्ट्रक्चर, कोर्स या सिस्टम मिल जाएगा।
लेकिन मंत्रीजी की सोच, रेस्टोरेन्ट तक सीमित थी। पर जरा सोचिये। प्रशासन के किस पहलू में यह व्यापारिक मानसिकता नही घुसी हुई??
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कभी दौर था कि मिलावटखोरी अपराध होता था। मेरे शहर का एक पंप, ओकेजनली सील कर दिया जाता, क्योकि उसका मालिक अक्सर पेट्रोल में सॉल्वेंट मिलाकर बेचता।
लोग उस पम्प से बचते थे। अब तो सरकार खुद मिलावटी माल बेच रही है। हर पम्प पर बेच रही है। बच लो!! तब दिए गए माल की मात्रा की जांच होती। एक लीटर की जगह, आपने 950ML दिया तो कार्यवाही।
अब एक महीने के रिचार्ज का मतलब 28 दिन की वैलिडिटी, सीना ठोक कर मिल रही है। बिगाड़ लो।
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यह कहना गलत होगा कि मिलावट खोरी को सरकारी संरक्षण है। असल मे मिलावटखोरों की, मिलावट खोरो के द्वारा, मिलावट खोरो के लिए बनवाई सरकार है।
व्यापारिक मानसिकता की सरकार है। बेजा लाभ के अवसर तलाशने वालो की सरकार है। इसमे इसे कुछ गलत नही लगता।
मगर भुगत पब्लिक रही है। अपनी मूर्खता,
और शोर पर अंधे भरोसे की वजह से..
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एक और उदाहरण देता हूँ।
कभी सरकार, कोयला खदान, बेहद सस्ते में देती थी। मान लीजिए, प्रति टन, 250 रुपये प्रीमियम। पॉवर प्लांट, सस्ता कोयला खरीदते। और आपको बिजली 3 रुपये यूनिट मिलती।
इसे कोयला घोटाला कहा गया।
अब सारी खदानें, वापस ली गई।
फिर से ऑक्शन हुए। कोयला 3000 रु टन के प्रीमियम पर बेचा गया। पॉवर प्लांट ने महंगा कोयला खरीदा। अब वही आपको बिजली 12 रुपये यूनिट मिल रही है।
यह स्वच्छ, और ईमानदार बिजली है।
3 रुपये वाली भ्रस्ट बिजली थी।
मेरा सवाल 12 रुपये रेट पर नही, वह तो मुल्ले टाइट करने के लिए आप 20 रुपये यूनिट भी लेंगे। मेरा सवाल यह है कि प्रीमियम में 250 की जगह सरकार 3000 कमाने लगी। उसे 2750 रुपये हर टन पर अतिरिक्त मिले।
यह पैसे कहाँ गए??
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आह, विकास में। शायद उस रोड में, जिसकी असल कीमत 60 करोड़ प्रति किमी है, पर टेंडर 300 रु करोड़ प्रति किमी का है।
अरे भाई, अच्छी सुविधा,
फोर लेन के लिए पैसे देंगे पड़ेंगे न।
लेकिन अगर ये पैसा, कोयले की अतिरिक्त कमाई से आया,
तो हम टोल क्यो दे रहे है?? तो ध्यान से देखिए। सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य-
हर चीज बिकवाली पर है।
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अंतिम उदारहण और झेल लीजिये।
देश मे कोई 106000 मेडिकल सीट हैं। नीट के एग्जाम में क्वालीफाईंग मार्क्स मुश्किल से 20% है। याने आप 20% सवाल हल करके "क्वालीफाई" कर जाते है। तो एक लाख सीट के लिए, 13 लाख लोग क्वालीफाई होते हैं।
इसका क्या अर्थ है??
अर्थ यह है,की कोई 50 हजार सीट सरकारी है। यहां 25 हजार जनरल, बाकी आरक्षण मान लीजिए। लेकिन बाकी की 60 हजार सीट, प्राइवेट कॉलेजों में हैं।
13 लाख लोग इन 60 हजार सीटों की बोली लगाएं, तो एवरेज प्राइज ऊंचा रहेगा। पर आप क्वालिफाइंग मार्क्स 60% कर दें, तो शायद 3 लाख लोग ही बोली लगा पाएंगे। एवरेज सीट प्राइज नीचे आएगा।
दैट्स ए लॉस..
याद रखिये, देश भर के सारे कॉलेज के लिए NTA के माध्यम से "वन नेशन-वन एग्जाम" कराना, आपके लिए सुविधा नही। बराबरी नही। न्याय नही।
व्यापार का हिस्सा है।
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और तब नोट कीजिये कि नजदीकी प्राइवेट मेडिकल कॉलेज किसका है? उसका मालिक, व्यापारियो की इसी रिंग का मेम्बर निकलेगा। नेताजी स्वयं, अथवा उनका विश्वस्त..
व्यापार बुरा नही।
पर सरकार में रहकर व्यापार बुरा है।
धर्मेंद्र प्रधान, कोई अनोखा काम नही कर रहे थे। सारे मंत्री, केंद्र राज्य की सरकार यही कर रहे हैं। वहां पर अगला जिसे भी लाएंगे, यही करेगा। तब चाणक्य के नाम से आया हुआ व्हाट्सप आपको याद करना चाहिए।
जहां का राजा व्यापारी होता है
वहां की जनता भिखारी होती है।
द पास्ट, कैन नेवर फाइट द फ्यूचर!!
इस दृश्य के तुरंत बाद, शिक्षामंत्री ने इस्तीफा दे दिया। जिस व्यक्ति को, चार साल पहले ही अक्षमता और अकर्मण्यता के लिए हटा देना चाहिए था, उसे हटाने के लिए भारत के युवा को अनशन, प्रदर्शन और खुलेआम गाली गुफ्तार पर उतरना पड़ा।
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और अब भी यह इस्तीफा, सरकार के आत्मनिरीक्षण, मंत्रिपरिषद के कार्यो की मॉनिटरिंग, इवेल्यूएशन और इंडिकेटर्स के आधार पर नही, मजबूरी में हुआ है।
यह नोट करने की बात है।
एंटायर कैबिनेट जडमूर्ख, बकलोल, घमंडी, नालायको और बेईमानो से भरी है। आप कोई भी विभाग उठाकर देख लें। और इनकी मजबूत उपस्थिति का कारण सिर्फ एक है- वफादारी।
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नेता के प्रति, पार्टी के प्रति,
आरएसएस के प्रति।
इस सरकार के मंत्रियों को जनता नही, इसके मालिकानों से डर है। और मालिकान को परफॉर्मेंस, एफिशिएंसी, रिजल्ट नही चाहिए।
तो जिस गवर्मेंट के निर्माण मे ही मेरिटोक्रेसी बुनियाद नही, उससे परफॉर्मेंस की आशा बेकार है।
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और यह आंदोलन, इस निराशा से उपजी कुंठा का विस्फोट है। यह सूचक भी है, कि जिस तरह का समाज बनाने की कोशिश आरएसएस और उसके हजारों बेनाम संगठन कर रहे थे- वह प्रोजेक्ट स्पेक्टिकुलरली फेल रहा है।
उल्टे, इसने समाज को, इन युवाओ के पीछे लामबंद कर दिया है। जो देश में अंतहीन निरर्थक धार्मिक-जातीय विभाजन और अस्मिता की राजनीति को साफ साफ नकारता है।
और वह युवा, इस मंच पर राहुल गांधी के साथ खड़ा हो गया है।
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यह तस्वीर दर्शनीय है।
एग्जेक्टली वैसी है, जैसी होनी चाहिए।
सेंटर में वे है, जो क्षुब्ध है, पीड़ित हैं, आक्रोशित हैं। राहुल किनारे हैं, हाथ बांधे, उनकी आवाज को सुनते हुए।
बिल्कुल ऐसी ही लीडरशिप चाहिए।
हमे नेता ऐसा चाहिए- जो सुने।
अटेंशन दे, इस देश के बच्चों को प्यार से निहारे।
इस पूरे आंदोलन को, एक बार भी हाईजैक करने की कोशिश राहुल ने नही की। वे जंतर मंतर नही गए, वीडियो शूट न करवाये, बड़बोल बयान न दिए।
मगर अपने राजनीतिक वजूद को चुपचाप, छात्रों के पीछे खड़ा कर दिया।
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देश का अगला दशक, उसके छात्र बनाते है।
जो शिक्षक डॉक्टर, इंजीनियर, इनोवेटर, बिजनेसमैन, सोशल साइंटिस्ट और तमाम पेशों में जाकर हिंदुस्तान को अगले स्तर पर ले जाने वाले हैं।
नेता का काम तो महज उनकी सुनना, समझना, और उसकी सफलता के लिए- जरूरी सिस्टम रास्ते साफ करना है।आने वाले कुछ दशक, (अगर राहुल की यही तासीर बनी रहे,तो) आधुनिक भारत का स्वर्णयुग हो सकते है।
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और 1990 के मंदिर मस्जिद, मुसलमान, कश्मीर, हलाला, तलाक, पाकिस्तान, नफरत और ध्वंस की राजनीति, 2026 में कर रही भाजपा, आरएसएस और उनके तमाम गुंडे संगठन - आज के बाद- भारत का पास्ट हैं।
इस तस्वीर में दिख रहे लोग, ठीक इसी क्रम में जैसे कि वे खड़े है-भारत का फ्यूचर हैं। इनका वक्त आ गया है। इन्हें जीतना ही है।
हीन प्रतिगामी शक्तियों को मैदान छोड़ना ही होगा।बिकॉज द पास्ट,
कैन नेवर फाइट द फ्यूचर!!
❤️
1994 में मेरा ग्रेजुएशन का रिजल्ट अच्छा नहीं रहा… क्योंकि DU का पेपर लीक नहीं हुआ था और मुझे और अधिक तैयारी का मौक़ा नहीं मिला 😭
मैं 32 सालों से बेवजह ख़ुद को दोष दे रहा था। अब मेरा Guilt मिटाने के लिए शुक्रिया निर्मला जी 🙏
For the first time in the country’s history, the Leader of the Opposition was allegedly beaten by the police until he was bleeding. The fact that the Kejriwal gang appears to be celebrating this is enough to show that they belong to the same RSS mindset that reportedly celebrated Mahatma Gandhi’s assassination by distributing sweets.
देहरादून में आज की शाम राहुल गांधी के नाम रही। मूसलाधार बारिश और तेज हवाओं के बावजूद राहुल गांधी महफ़िल लूट ले गए। पंडाल के भीतर और बाहर हजारों युवा बारिश में भीगते रहे लेकिन टस से मस नहीं हुए।
शहर में आज गफ़लत थी कि युवा राहुल गांधी को सुनेगा या एक किमी दूर परेड ग्राउंड में “धुरंधर” मूवी फेम मशहूर सिंगर जैस्मीन सैंडलास के पास जाएगा।
लेकिन ग्लैमर की चकाचौंध छोड़कर यूथ बारिश और कीचड़ से भरे एक स्कूल के ग्राउंड में राहुल के साथ डटा रहा और उस विषय में भाग लिया जिसका उसके साथ निजी ताल्लुक है।
यही थी असली गूँज
@RahulGandhi@priyankagandhi@INCIndia@srinivasiyc@LambaAlka@Pawankhera
TO WHOMEVER IT MAY CONCERN
Cities/towns/rural India need educational institutions at large scale.
This is an educational institute located in rural area of Rampur, Uttar Pradesh, India.
It’s called Jauhar University, built in 2006 by a senior leader Azam Khan, an opponent of present ruling BJP govt.
Almost 3000 students studying here in 24 different departments. They are from nearing states like Uttarakhand as well. It is the largest higher education center in the area spread over 500 acres.
Though the The university is located in a rural area (gram panchayat), the Rampur Development Authority (RDA) issued a notice to Jauhar University saying that out of 40 buildings, the plan/layout for 38 buildings (blocks) on the campus had not been approved.
Therefore, bulldozers will be used to demolish 38 buildings in the next 15 days.
Point is, Instead of bulldozing this grand university, legal formalities can be achieved according to the local municipal laws.
But NO!
It seems that in the garb of legal technicalities, it’s actually a political vendetta & a personal enmity against a leader who comes from the minority community.
Do you have two words to offer on this?