@narendramodi The Prime Minister of India must stop bring a side-kick to the US. He must have the courage to first condemn the attack on Iran's sovereignty & show that India always stands with it's friends
@DigitalDon31016@mukeshbudharwi क्या करूं, मैं ऐसे देश का वासी हूं जहां वर्तमान प्रधानमंत्री, पहले प्रधानमंत्री के बारे में हर दिन निम्न स्तर की बात करता है और मीडिया "वाह वाह " करता है
https://t.co/IGROqIWdXF
@mukeshbudharwi आप जैसे जयचंद खुद के प्रधानमंत्री और देश का मजाक बनाकर बहुत गर्व की अनुभूति करते हैं ! मुगलों और अंग्रेजों को देखते ही बाप बना लेते हैं।
क्या आप अपने घर में अपने बाप-दादाओ का भी ऐसे ही मजाक उड़ाते हैं क्या...??
आज दूरदर्शन ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अंतिम यात्रा का Live Coverage तब दिखाना शुरू किया,
जब मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अंतिम यात्रा में शामिल होने पहुंचे,
सभी News एजेंसी और News Channels को Live फुटेज दूरदर्शन के माध्यम से ही मिल रही थी,
और दूरदर्शन वाले इस बात का ख्याल रख रहे थे,
कि फ्रेम में प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के अलावा कोई दूसरा नेता गलती से भी ना दिख जाए,
खुदा भी आसमां से जब जमीं पर देखता होगा,
कैसे कैसे लोग बनाए मैंने, सोचता होगा,
मनमोहन सिंह और जेल से जुड़ा किस्सा 👇
मनमोहन सिंह को दुनियाभर के दिग्गज श्रद्धांजलि दे रहे हैं इसी बीच मनमोहन सिंह से जुड़ा एक बहुत बड़ा किस्सा सामने आया है
दुनिया के एक बड़े नेता ने लिखा है जब उन्हें एक राजनीतिक साजिश के तहत जेल में डाल दिया गया था, तब मनमोहन सिंह ने उनके बच्चों, खासकर उनके बेटे की पढ़ाई का खर्च उठाने की पेशकश की थी.
आपको जानकर हैरानी होगी की ये किस्सा मलेशियाई प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम का है इब्राहिम ने कहा पढ़ाई का खर्च उठाने की पेशकश से तत्कालीन मलेशियाई सरकार के नाराज़ होने का जोखिम था फिर भी मनमोहन सिंह ने ऐसा किया 🔥
एक चीज़ तो साफ़ है मनमोहन सिंह बोलते कम और प्रचार बिल्कुल नहीं करते थे अपने कामो का , शायद इसी लिए उन्हें भारतीय मीडिया कमजोर दिखाता रहा अगर मनमोहन जी भी प्रधान मंत्री की जगह प्रचार मंत्री टाइप होते तो मीडिया गीत गाता रहता !
असली आजादी मिलने के बाद पैदा हुए लोगों के लिए एक किस्सा है।
पढ़िए हो सकता है आपको कुछ नया मिले।
2008 में जिस समय मुम्बई के ओबेरॉय ट्राईडेंट और ताज होटलों में पाकिस्तानी आतंकवादियों का हमला चल रहा था, ताज होटल के मालिक रतन टाटा गेटवे ऑफ इंडिया के पास खड़े होकर चुपचाप सारी कार्रवाई को देखते रहते थे। वो अपने होटल, अपने कर्मचारियों के प्रति तो चिंतित थे ही, साथ ही उन्होंने होटल के आसपास के फुटपाथ पर खोमचे लगाने वालों का भी ख्याल रखा।
चलते हमले के बीच उसी समय गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने तय किया को वो गुजरात से मुंबई जाकर ठीक ओबेरॉय होटल के सामने प्रेस कांफ्रेंस करेंगे और यूपीए सरकार पर हमला बोलेंगे (हां, उस समय तक मोदी जी प्रेस को संबोधित करते थे)। उन्होंने ऐसा किया भी। उनको एक क्षण के लिए भी नहीं महसूस हुआ कि वो राजनीति कर रहे हैं। न ही टीवी चैनलों को ये लगा। उन्होंने उस प्रेस कांफ्रेंस को दिखाया भी।
चलते हमले के बीच भाजपा ने तमाम अखबारों में पूरे पन्ने का विज्ञापन दिया। केंद्र सरकार पर हमला बोला। भाजपा को वोट देने की अपील की। भाजपा को किसी ने एंटी नेशनल नहीं कहा।
इसलिए आज जब आप ये जुमला सुनें कि 'विपक्ष इस पर राजनीति कर रहा है तो इस किस्से को याद कर लीजिएगा।'
बाकी दोनों की शख्सियतों के बीच जो अंतर तब था वो बढ़ा ही, कम नहीं हुआ।
आज फिरोज जहांगीर घेंडी जी की पुण्यतिथि हैं लेकिन उनके नामक हराम परिवार में से किसी ने उनको याद नही किया । सोचो जो परिवार उसी दादा की ज़ात की रोटी खा रहा हों और उसकी पुण्यतिथि पर उसको भूल जाए उस से ज़्यादा नमक हराम परिवार कौन होगा। जो अपने दादा के सगे ना हुए वो क्या देश के क्याँ सगे होंगे ।
@RebornManish@lalit84131 हृदय से आभार
आज के युग में लोग नहीं समझ रहे कि समाज में चरित्र निर्माण के लिए वही Values जरुरी हैं जो गांधी ने बतलाए, जिन्हें उपनिषदों ने भी चिन्हित किया ।
लफंगई और छल प्रपंच से सत्ता तो पाया जा सकता है, पर समाज का चरित्र मटियामेट हो जाए
तुम्हारे लिए नही लिख रहा।।
यहाँ और पढ़ने वालों के लिए।
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1- गांधी को लौटने का बुलावा देने गए सदेह साउथ अफ्रीका गए थे गोखले, 1911 में। तो उनकी वापसी और यहां आंदोलन सम्हालने की रिक्वेस्ट तीन साल पुरानी थी। गांधी वहां के आंदोलन को समेटकर, सौंपकर यहां लौटे।
यहां अंग्रेजो के चमचों पर "अचानक" बिजली गिरी, उनकी समस्या।
2- तब होमरूल की मांग चलती थी। सरकार ने युद्ध के बाद होमरूल देने का वादा किया था। बशर्ते कांग्रेस युद्ध के समय सहयोग करे।
जो कांग्रेस, और गांधी ने किया। ध्यान रहे गांधी 1922-23 के बाद क्लियर लीडर बने।
बहरहाल, सरकार ने युद्ध के बाद मार्ले मिंटो सुधार का झुनझुना दिया। वादाखिलाफी पर गांधी ने असहयोग आंदोलन शुरू किया। खुश करने को कैसरे हिन्द मिला था, लौटा दिया।
सेम ऑफर सेकेंड वर्ल्ड वॉर के समय मिला। गांधी ने ठगाने से इनकार कर दिया। वे भारत छोड़ो आंदोलन चलाने लगे। पर संघी, महासभाई, सावरकर हिन्दुओ को ब्रिटिश सेना में शामिल कराने भर्ती रैली करवाते रहे। यह हिस्ट्री है।
3- भारत की 5 लाख की सेना थी, जिसमे 1 लाख गोरे थे। याने 4 लाख हिंदुस्तानी गांधी के खड़ा किये सैलाब से अंग्रेजो को सुरक्षा दे रहे थे। नेवल म्यूतिनी और INA केस के बाद सेना में असंतोष दिखने लगा। सुरक्षा चक्र भंग होने लगा।
ये हटता तो 30 करोड़ हिंदुस्तानी अंग्रेजो को घसीट लेते। तो डर, बढ़ते क्रैक के पीछे खड़े इस सैलाब का था, जो गांधी ने खड़ा किया।
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जैसा कहा, तुम्हारे लिए नही है। तुम सतही आदमी हो। डेप्थ में उनको दिखा रहा हूँ, जिनके पास दृष्टि हो।
गाली देने का मन है।
पर पोस्ट पर गांधी की तस्वीर है।
यहां नही।
कथा 1934 से शुरू होती है।
जब गांधी ने हरिजन यात्रा शुरू की।
पूना पैक्ट में, सेपरेट एलेक्टोरेट से 71 सीट की मांग छोड़ने के बदले, संयुक्त हिन्दू कोटे से 149 सीट, दलितों के लिए आरक्षित करने का समझौता,अम्बेडकर से हुआ।
पर यह सीटें, सवर्णों की जेब से निकलनी थी। पहले धर्मनिरपेक्षता (मुस्लिम प्रेम), अब अछूतो की तरफदारी..
गांधी हद से बाहर जा रहे थे।
उनपर पूना में बम फेंका गया।
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वे बच गए, पर काल के कपाल पर, गांधी का डैथ वारंट, 1934 में लिखा जा चुका था।
इंडियन फासिस्ट उन्हें मारने का मन बना चुके थे। तो उसी वर्ष, फासिज्म की गंगोत्री, इटली में एक पिस्टल तैयार हुई।
बरेटा M-1934 तब दुनिया की आधुनिकतम पिस्टल थी। सीरियल नम्बर 606824 की पिस्टल, मुसोलिनी के किसी अफसर को जारी हुई।
बरेटा, छोटी थी, पर अचूक और ताकतवर.. एक किस्म की एलीट गन, जो मुसोलिनी के खास अफसरों को ही दी जाती।
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खास अफसर, खास अभियानों पर भेजे जाते हैं। तो वह अफसर, दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान, इथियोपिया पर हमले में भेजा गया।
क्योकि, मुसोलिनी को अखण्ड रोमन साम्राज्य बनाना था।और इतिहास में मिस्र से इथियोपिया तक,सब रोमन इलाके थे।
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इथियोपिया ने अपनी आजादी की लड़ाई, बड़ी मजबूती से लड़ी।उनकी मदद की ब्रिटिश फौजो ने।
और ब्रिटिश फौज की मदद तो ग्वालियर के सिंधिया 1857 से करते आये हैं।
यहां इथियोपिया में भी ग्वालियर के लांसर्स मदद को मौजूद थे।
पिस्टल नम्बर 696824 रखने वाला इटालियन अफसर मारा गया, या समर्पण किया, कोई नही जानता।
पर उसकी पिस्टल, 4th ग्वालियर इन्फेंट्री के कमांडर, वी बी जोशी ने विजय स्मृति के रूप में रख ली।
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फिर भारत मे उसे बेच दिया जगदीश गोयल को। तब यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ ग्वालियर मे, हथियार रखने के लिए, USA की तरह किसी लाइसेंस की जरूरत नही थी।
तो अब पूछिये गोयल साहब कौन।
तो जनाब ये, हिन्दू राष्ट्र सेना के मेम्बर थे।
ये कैसी सेना?? किसने बनाई?
सेना बनाने वाले महाशय थे दत्तात्रेय सदाशिव परचुरे। इस सेना को हिन्दू महासभा का मिलिटेंट दस्ता माना जाता था।
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तो परचुरे साहब एक दिन गोयल साहब के पास आये। बोले- ग्राहक आया है, पिस्तौल बेच दो,अच्छे दाम मिलेंगे।
500 रुपये में सौदा हुआ। गोयल साहब ने, पिस्तौल, गोडसे साहब को बेच दी।
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1934 में लिखे गए डेथ वारंट को कारित करने की 6 कोशिशें हुई। कभी छुरा, कभी बम, कभी रेल की पटरी उखाड़ी गई।
गोडसे साहब इसमे से 4 प्रयास में शामिल थे।पर गांधी के डैथ वारंट पर लिखा था- मौत इटली से स्मग्ल विचारधारा के हाथों, इटली से स्मग्ल हथियार से ही होगी।
जब विचार, हथियार, मक़तूल और कातिल एक जगह मिले..
वह 30 जनवरी 1948 था।
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गांधी 1914 में भारत आये। तब वे 45 बरस के थे। सत्याग्रह, जेल, आंदोलन, नेगोशिएशन सभी चीजों में एक्सपर्ट हो चुके थे।
याने 64 कलाओं से युक्त, एक मैच्योर्ड शख्स थे। अपनी प्रेरणा और नेतृत्व से 30 साल में पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा, द्रविड़, उत्कल, बंग को मानसिक रूप से एक देश बना दिया।
सरदार पटेल को भूमि पर भारत का बिस्मार्क कहते है। वह काम,मानसिक स्तर पर, इस देश में गांधी ने किया।
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अब 79 की उम्र में वह बूढ़े, हताश, अनमने शख्स थे। पत्नी की मृत्यु के बाद एक डैथ विश दिखाई देती है।
कहीं ठहरते नही थे। बेचैन आंखों के सामने देश बंटवारे से गुजर गया। कभी नूह, मेवात, कभी नोआखाली, कभी बाम्बे, कभी कलकत्ता...
अनशन शान्ति के लिए होते थे..
या इस देह से मुक्ति के लिए??
मोहन की लीला, मोहन जाने..
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नाथूराम ने उस जर्जर, मृत्युकामी बूढ़े को मुक्त किया। देश पर उपकार किया।
गांधी की लाश, गले तक चादर उढ़ाकर रखी गयी थी। पुत्र आया, उसने चादर सीने के नीचे तक खींच दी।
कहा-ये गोलियों के घाव, बरेटा की 3 गोलियां, अहिंसा के पुजारी के सीने के मेडल हैं। इसे दुनिया को देखने दो।
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गोडसे का उपकार यूँ, कि वो मेडल, वो गोलियों के घाव,उनसे रिसा रक्त, इस देश के गिर्द रक्षा कवच बन गया।
जिंदा बापू की आवाज अनसुनी हो रही थी।
गोलियों के धमाकों ने उस आवाज को सदियो के पार गुंजा दिया।गांधी के संदेश,गांधी के लहू में सनकर, मानवता के माथे पर सुनहरा हर्फ बन गए।
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और जिसने गोली चलाई..
वह विचारधारा, वो खूनी सोच, खूनी फलसफा, उस फासिस्ट राष्ट्रवाद ने गांधी के लहू को कालिख बनाकर,अपने मुंह पर पोत लिया।
अंधकार में 50 सालों के लिए खो गया।
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इन 50 साल, देश ने दिल जोड़े। नफरतें छोड़ी, भारत का निर्माण किया। आजादी, समानता, जनाधिकार बांटे।गांधी के सपने की ओर,कदम बढ़ाए।
आज गांधी पर फिर गोलियां चल रही हैं।
गोडसे फिर गांधी को तलाश रहा है।
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तब न थे आप,आज हैं।
अगर बन सकें, तो इस बार,
गांधी का कवच..
आप बनिए।
🙏❤️