झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले के मझगांव प्रखंड की अंगरपाड़ा पंचायत के महालीपोखर गांव के ईचापी टोला में आज भी आदिवासी परिवार बूंद-बूंद पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ग्रामीण बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे कई किलोमीटर दूर जाकर चुआं और गड्ढों का दूषित पानी लाने को मजबूर हैं। आज़ादी के दशकों बाद भी पीने के स्वच्छ पानी जैसी बुनियादी सुविधा से वंचित होना बेहद शर्मनाक है।
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सेवा में,
अध्यक्ष महोदय,
राजस्थान कर्मचारी चयन बोर्ड,
जयपुर, राजस्थान।
विषय: अध्यापक भर्ती परीक्षा 2025 (लेवल-1) में 11 प्रश्नों को डिलीट करने की घोर लापरवाही एवं प्रशासनिक विफलता के संबंध में औपचारिक शिकायत।
महोदय,
हम आपका ध्यान अध्यापक भर्ती परीक्षा (लेवल-1) के प्रश्न-पत्र में हुई शर्मनाक त्रुटियों की ओर आकर्षित करना चाहते है। एक ही परीक्षा में 11 प्रश्नों का डिलीट होना किसी तकनीकी चूक का परिणाम नहीं, बल्कि बोर्ड की अक्षमता, घोर लापरवाही और परीक्षा निर्माण समिति की संवेदनहीनता का सीधा प्रमाण है।
इस संदर्भ में मैं निम्नलिखित बिंदुओं पर बोर्ड की स्पष्टीकरण और कार्यवाही की मांग करते हैं:
प्रश्न-पत्र की गुणवत्ता पर प्रश्नचिह्न: 11 प्रश्नों का त्रुटिपूर्ण होना यह सिद्ध करता है कि प्रश्न-पत्र को अंतिम रूप देने से पहले किसी भी प्रकार के विश्वसनीय 'क्वालिटी चेक' या 'प्रूफ-रीडिंग' का पालन नहीं किया गया।
परीक्षार्थियों के भविष्य के साथ खिलवाड़: अध्यक्ष महोदय का सोशल मीडिया पर केवल "दुःख" व्यक्त करना या "सुधार के प्रयास" की बात करना उन हजारों अभ्यर्थियों के लिए एक क्रूर मजाक है, जिनका करियर इस प्रशासनिक विफलता की भेंट चढ़ गया है।
जवाबदेही का अभाव: बोर्ड द्वारा सेटर्स को केवल 'ब्लैकलिस्ट' करने का दावा करना अपर्याप्त है। जब तक संबंधित अधिकारियों और विषय विशेषज्ञों पर भारी आर्थिक दंड और अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी, तब तक व्यवस्था में सुधार संभव नहीं है।
पारदर्शिता की मांग: हम मांग करते हैं कि प्रश्न निर्माण समिति में शामिल उन विशेषज्ञों के नाम और उनकी साख सार्वजनिक की जाए, जिनकी अयोग्यता के कारण लाखों युवाओं का समय, धन और ऊर्जा बर्बाद हुई है।
बोर्ड का यह उत्तरदायित्व है कि वह न केवल इस विफलता को स्वीकार करे, बल्कि प्रभावित अभ्यर्थियों के लिए उचित मुआवजे या आगामी परीक्षा में शुल्क मुक्ति जैसे ठोस कदम उठाए।
यदि बोर्ड अपनी इस कार्यप्रणाली में सुधार हेतु तत्काल कदम नहीं उठाता, तो प्रभावित अभ्यर्थी अपने अधिकारों के संरक्षण हेतु उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने के लिए बाध्य होंगे।
अपेक्षित कार्यवाही:
प्रश्न निर्माण समिति के सदस्यों पर ठोस प्रशासनिक व आर्थिक दंड का विवरण सार्वजनिक करें।
प्रभावित अभ्यर्थियों की हुई क्षति की भरपाई हेतु स्पष्ट नीति घोषित करें।
धन्यवाद।
भवदीय,
समस्त पीड़ित अभ्यर्थी]
लेवल 1
@alokrajRSSB@rajcmo
शुभमन गिल ने कोई पहली बार रोहित शर्मा को रन आउट नहीं कराया है इससे पहले भी वो कर चुका है।
पहले Rohit Sharma के कॉल को इग्नोर करेगा उसके बाद सफाई देगा कि सुना नहीं
जबकि रोहित शर्मा अपना रन पूरा कर चुके थे।
ऐसे ही नहीं Gill ने उपलब्धियों का अंबार लगाया है और मुझे लगता है कि आगे भी लगाएगा क्योंकि सामने कौन खेल रहा उसे फर्क नहीं पड़ता
और न ही वो किसी और के लिए अपनी विकेट को Sacrifice करता है।
कभी स्कूल की छत गिरती है, कभी पंखा गिरता है, कभी दीवार गिरती है।
कर्नाटक के कलबुर्गी के एक Government Girls Pre-University College (सरकारी कॉलेज) में कक्षा चल रही थी, तभी छत/सीलिंग का हिस्सा गिर गया और 5 छात्राएँ घायल हो गईं|
देश में शिक्षा पर भाषण बहुत हैं, लेकिन सरकारी स्कूलों और कॉलेजों की जमीनी हालत एक दम खस्ता ।।
एक तरफ़ बातें smart classroom की दूसरी तरफ़ हालात ये कि बच्चों को भरोसा नहीं कि जिस छत के नीचे बैठे है , क्लास ख़त्म होने तक सलामत भी रहेगी कि नहीं ?
पीढ़ियों से जिन जंगलों और जमीनों पर आदिवासी समुदाय रहते आए हैं, उन्हें अचानक "अतिक्रमण" और "अवैध कब्जा" बताकर उजाड़ देना बेहद चिंताजनक है। जंगल आदिवासियों के लिए केवल भूमि नहीं, बल्कि उनकी पहचान, संस्कृति, आजीविका और अस्तित्व का आधार हैं। बिना न्यायपूर्ण प्रक्रिया, ग्राम सभा की सहमति और उनके पारंपरिक वन अधिकारों की मान्यता के बेदखली लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है।
बुलेट ट्रेन, 5 ट्रिलियन इकोनॉमी, विश्वगुरु बनने की बाते है, और 1 लाख स्कूलों में बिजली नहीं, वही 98,500 स्कूलों में बेटियों के लिए शौचालय नहीं।
जिस देश के बच्चों को बुनियादी सुविधाएँ न दे पा रहे हो हम तो सच में आत्ममंथन की जरूरत है #education_system
आपत्तिजनक क्या था - भाषा, विचार या सत्ता से असहमति?
अगर किसी content में वास्तव में आपत्तिजनक बात है, तो कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
लेकिन जरूरी यह है कि लोकतंत्र में व्यंग्य, आलोचना और असहमति की सीमाएँ स्पष्ट करो।
सवाल सिर्फ एक अकाउंट का नहीं है,
सवाल यह है कि क्या हम ऐसे लोकतंत्र की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ लोगों को अपने विचार रखने से पहले यह सोचना पड़े कि कहीं उनकी आवाज़ ही बंद न कर दी जाए?