व्यर्थ मत समझ,
अकेलेपन के इस क्षण को,
सहेज लो इसको,
ये हीं गढ़ेगा जीवन को।
जो बैठा है तनहा आज,
कल गाएगा, नृत्य भी करेगा,
एकांत ही तो संभालता है,
भावनाओं से अप��ग को।।
~ तौलिया पाठक
एक पुस्तक जितना
वफ़ादार दोस्त कोई नहीं है।
*
कुछ भी सच नहीं-यही सच है।
*
बुद्धिमान लोगों में सबसे
दुर्लभ चीज़ है-खुशी।
#अर्नेस्ट_हेमिंग्वे
विश्वप्रसिद्ध अमेरिकी उपन्यासकार;
बेहतरीन लेखन हेतु वर्ष 1953 में
पुलित्ज़र पुरस्कार और 1954 में
साहित्य का नोबेल पुरस्कार प���राप्त
#जयंती💐
वसंत से एक पीला फूल तोड़कर मैंने
अगले मौसमों के लिए रख लिया
जहाँ किताब में था वहाँ एक पीला धब्बा छोड़कर
वह सूर्य हुआ
इसी तरह उड़हुल का सुर्ख़ फूल
वर्षा से तोड़कर रख लिया शिशिर के लिए
पहले इससे मौसम का सीना दहका
फिर वह भी सूर्य हुआ
एक और मौसम का अनुभव भी
मिलता-जुलता ही है
बस फ़र्क़ ये कि यहाँ एक सफ़ेद फूल था
रंगों से अधिक
सूरज का नाता फूलों से है
इसी से
रात में फूल उदास दिखते हैं।
महेश वर्मा
ईश्वर,
ध्यान देना…
जब खड़ा होना पड़े मुझे
तो अपने अस्तित्व से ज़्यादा जगह न घेरूँ।
मैं ऋग्वेद के चरवाहों कि करुणा के साथ कहता हूँ—
मुझे इस अनंत ब्रह्मांड में
मेरे पेट से बड़ा खेत मत देना,
हल के भार से अधिक शक्ति,
बैल के आनंद से अधिक श्रम मत देना।
मैं तोलस्तोय के किसान से सीख लेकर कहता हूँ :
मुझे मत देना उतनी ज़मीन
जो मेरे रोज़ाना के इस्तेमाल से ज़्यादा हो,
हद से हद एक चारपाई जितनी जगह
जिसके पास में एक मेज़-कुर्सी आ जाए���
मुझे मेरे ज्ञान से ज़्यादा शब्द,
सत्य से ज़्यादा तर्क मत देना।
सबसे बड़ी बात
मुझे सत्य के सत्य से भी अवगत करवाना।
मुझे मत देना वह
जिसके लिए कोई और कर रहा हो प्रार्थना।
~ रचित
भीड़ में
कोई अचानक ओझल
हो जाए ,
तो दिल को समझाना पड़ता है
कि किसी का
खोना
तुमको खोना नहीं है...
लेकिन सच
यह है ,
किसी के खोने में
तुम थोड़ी-सी
और खो जाती हो… 🦋
_अ|जे|य🕊️
सदा न संग सहेलियाँ, सदा न राजा देश।
सदा न जुग में जीवणा, सदा न काला केश।
सदा न फूलै केतकी, सदा न सावन होय।
सदा न विपदा रह सके, सदा न सुख भी होय।
सदा न मौज बसन्त री, सदा न ग्रीष्म भाण।
सदा न जोवन थिर रहे, सदा न संपत माण��
सदा न ��ाहू की रही, गल प्रीतम की बांह।
ढ़लते ढ़लते ढ़ल गई, तरवर की सी छाँह।
—
आज
उसके लिए
कुछ भी तो …सरल नहीं था!!!!
सिवाय
मानसिक संतुलन,
सकारात्मकता और दृढ़ विश्वास के ….
कि सब …अच्छा ही होगा !!!!
बस …फिर …उसे सब सहज लगा
शांत, सरल बहती नदी की तरह !!!!
कुछ दिनचर्यायें …असामान्य सी होती है!!!
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गुज़रे हुए लोग कहाँ मिलते हैं?
नदियां कब लौटती हैं
पर्वतों के पास,
हवाएं वापस नहीं आती
अपने दरवाज़े पर,
'गुज़रे हुए' मिलते हैं
सिर्फ़ कल्पनाओं में!!
- अज्ञात