आदिवासी इलाकों में कुछ हद तक सामुदायिक जीवन बचा हुआ है. यात्रा से लौटो तो रात का खाना पड़ोसी खिला देती हैं. शाम चाय साथ में पी सकते हैं. सुबह मॉर्निंग वॉक पर निकलो तो लोग साग-सब्जी थमा देते हैं. और कभी-कभी गांव का इकलौता मोची कहता है "जाओ गुड़िया. छोटा सा काम था. पैसा रहने दो."