उत्तर प्रदेश के नए कांग्रेस प्रभारी बने राजेन्द्र पाल गौतम सबकी नींद उड़ाने में लग गए है।
@AdvRajendraPal कह रहे है अगर कही बलिदान देने की जरूरत पड़ी तो पहले हम है। हम कार्यकर्ताओं को पहले आगे नहीं करेंगे।
हम ऐसे नेता नहीं हैं जो कार्यकर्ताओं को मरने के आगे कर दे।
समता, न्याय और बंधुत्व के उच्च आदर्शों से आलोकित,समरस एवं समावेशी समाज की आधारशिला रखने वाले भारतीय संविधान के शिल्पकार'भारत रत्न'बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर जी की जयंती पर विनम्र श्रद्धांजलि।
उनका प्रेरक जीवन हम सभी के लिए सदैव पथप्रदर्शक रहेगा। @AshokMeghwal_ lampolai
माननीय मुख्यमंत्री श्री @BhajanlalBjp जी अध्यापक भर्ती लेवल-2 के मामले में जब अभ्यर्थियों ने चयनितों से भी अधिक अंक प्राप्त किए, तो उन्हें नियुक्ति से वंचित रखना न केवल उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ है, बल्कि न्याय के सिद्धांतों के भी विरुद्ध है।।
माननीय शिक्षा मंत्री श्री @madandilawar जी माननीय राजस्थान हाईकोर्ट ने इस मामले में सख्त रुख अपनाते हुए सरकार और संबंधित विभाग को कहा है कि पुराने आदेशों की अवहेलना और 'प्रोविजनली कंसीडर' करने के निर्देशों को अनदेखा करना प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
आप संज्ञान लेकर जिन अभ्यर्थियों के अंक कट-ऑफ से अधिक हैं, उन्हें बिना किसी और देरी के नियुक्ति दी जाए।
माननीय हाईकोर्ट के निर्देशों का अक्षरश: पालन हो, ताकि युवाओं का न्यायपालिका पर भरोसा बना रहे।
भविष्य की भर्तियों में ऐसी खामियां न हों, विभाग की गलती की सजा बेरोजगारों को क्यों मिले,जिससे किसी भी योग्य युवा को बेरोजगारी का दंश न झेलना पड़े।
#असलम_चोपदार
@BhajanlalBjp@arvindchotia@CeoRajasthan@DrKirodilalBJP
गूँगे-बहरों की सरकार हो, तो आवाज़ बम और बंदूक़ो जैसी निकलनी चाहिए।
रणनीति न समझे तो तलवार की धार पर सियासत बदलनी चाहिए, और अगर समक्ष मृत्यु भी खड़ी हो, तो उसे स्वीकार करना चाहिए; मगर सांसें थमने के बाद भी इंकलाब की आग जलनी चाहिए।
-संकल्प सभा
📍NSUI राष्ट्रीय कार्यालय
@INCIndia@RahulGandhi@kharge@kcvenugopalmp@kanhaiyakumar@anshultrivedi47@nsui
राजस्थान कॉलेज से पहले दलित अध्यक्ष, राजस्थान विश्वविद्यालय से पहले दलित अध्यक्ष, राजस्थान NSUI का पहला दलित प्रदेशाध्यक्ष और अब राजस्थान से पहला युवा नेता जो NSUI का National President बने है।
जाति से बराबरी की राजनीति🤞
आप सभी को बहुत-बहुत बधाइयाँ।💐
@VinodJakharIN
विनोद जाखड़: संघर्ष से शिखर तक की प्रेरक जीवनी
विनोद जाखड़ जी की जीवन यात्रा एक साधारण दलित परिवार से आने वाले युवाओं के लिए असाधारण प्रेरणा का स्रोत है। जयपुर के विराट नगर के पास स्थित मेड गाँव से निकलकर राष्ट्रीय स्तर तक पहुँचना कोई साधारण उपलब्धि नहीं है। एक बेहद साधारण, सरल और ग्रामीण दलित परिवार में जन्मे इस युवा ने शायद खुद भी अपने शुरुआती दिनों में नहीं सोचा होगा कि वे इतनी ऊँचाइयों तक पहुँचेंगे। लेकिन सच ही कहा गया है “पूत के पाँव पालने में दिख जाते हैं।” अपने जीवन के शुरुआती दौर से ही उन्होंने अपनी प्रतिभा, मेहनत और जुझारूपन का ऐसा परिचय दिया कि स्पष्ट हो गया था कि यह युवा एक दिन बड़ी मंजिल जरूर हासिल करेगा।
छात्र राजनीति से नेतृत्व तक का सफर
विनोद जाखड़ जी ने वर्ष 2014 में राजस्थान कॉलेज की छात्र राजनीति में कदम रखा। उस उम्र में जब अधिकांश युवा अपने भविष्य की दिशा ही तय कर रहे होते हैं, उन्होंने चुनाव लड़कर जीत हासिल की जो अपने आप में साहस और आत्मविश्वास का बड़ा उदाहरण था। इसके बाद वर्ष 2018 में उन्होंने राजस्थान विश्वविद्यालय में विजय प्राप्त कर इतिहास रच दिया और अध्यक्ष पद तक पहुँचे।
यह उपलब्धि केवल व्यक्तिगत जीत नहीं थी, बल्कि यह संदेश भी था कि यदि हौसले मजबूत हों तो गरीबी, सामाजिक बाधाएँ और विपरीत परिस्थितियाँ किसी भी व्यक्ति का रास्ता नहीं रोक सकतीं।
एक दलित और आर्थिक रूप से साधारण पृष्ठभूमि से राजनीति में आगे बढ़ना आज भी आसान नहीं माना जाता। राजनीति के दरवाज़े अक्सर प्रभावशाली और संपन्न वर्ग के लिए ज्यादा खुले दिखते हैं। लेकिन विनोद जाखड़ जी ने इन धारणाओं को तोड़कर दिखा दिया।
वे न आर्थिक रूप से मजबूत थे, न किसी बड़े राजनीतिक घराने से आते थे। फिर भी उन्होंने अपने दम पर वह मुकाम हासिल किया जो हजारों युवाओं का सपना होता है। बाद में वे राजस्थान NSUI के प्रदेश अध्यक्ष बने और यह उपलब्धि हासिल करने वाले वे पहले दलित युवा नेताओं में शामिल रहे जिन्होंने असंभव को संभव कर दिखाया।
राजनीतिक जीवन में उन्हें कई तरह की गुटबाज़ी, विरोध और साजिशों का सामना करना पड़ा। राजस्थान की राजनीति में उनके खिलाफ कई प्रयास हुए, कई गुट बनाए गए, लेकिन उन्होंने कभी नकारात्मक रास्ता नहीं चुना।
उनकी सबसे बड़ी विशेषता रही है सकारात्मक राजनीति। उन्होंने कभी व्यक्तिगत कटुता को प्राथमिकता नहीं दी, विरोधियों के प्रति भी सम्मानजनक भाषा का प्रयोग किया। अपने दुश्मनों को भी दोस्त की तरह देखने की सोच रखी।
उनका मानना रहा है कि समय के साथ लोग बदलते हैं और हमें किसी के बारे में बुरा नहीं बोलना चाहिए। यह राजनीतिक परिपक्वता उन्हें भीड़ से अलग पहचान देती है।
विनोद जाखड़ जी केवल पद के नेता नहीं रहे, बल्कि सड़कों पर संघर्ष करने वाले कार्यकर्ता नेता रहे हैं। उन्होंने राजस्थान में कई नए प्रयोग किए, जैसे: नशा छोड़ो अभियान, छात्र संघ बहाली को लेकर आंदोलन, सरकार के खिलाफ मुखर संघर्ष, साइकिल और पैदल यात्राएँ, कांग्रेस के विभिन्न मुद्दों पर लगातार प्रदर्शन
स्वास्थ्य साथ दे या न दे वे मानसिक रूप से हमेशा तैयार रहे। जयपुर की सड़कों पर उन्हें अक्सर कार्यकर्ताओं के साथ संघर्ष करते देखा गया। वे घर बैठकर राजनीति करने वालों में नहीं, बल्कि मैदान में उतरकर नेतृत्व करने वालों में रहे हैं।
राजस्थान जैसा विशाल और भौगोलिक रूप से चुनौतीपूर्ण राज्य जहाँ जैसलमेर से धौलपुर और श्रीगंगानगर से लेकर डूंगरपुर-बांसवाड़ा तक दूरी ही दूरी है वहाँ उन्होंने लगातार प्रवास और संगठन विस्तार किया।
उनकी खास बात यह रही कि: कोई साधारण कार्यकर्ता भी बुलाए तो वे पहुँचने की कोशिश करते थे, कार्यकर्ताओं को “अपना साथी” मानते हैं, छोटे-बड़े का भेदभाव नहीं करते, सबके साथ बैठना, खाना और संवाद रखना उनकी शैली है
इसी वजह से संगठन में उनकी पकड़ केवल पद के कारण नहीं, बल्कि रिश्तों के कारण मजबूत हुई।
अपनी इसी मेहनत, संगठन क्षमता और सकारात्मक सोच के बल पर आज विनोद जाखड़ जी कांग्रेस के अग्रिम छात्र संगठन एनएसयूआई के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद तक पहुँचे हैं। यह केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि उन लाखों युवाओं की उम्मीद की जीत है जो गाँव, गरीब या सामाजिक रूप से वंचित पृष्ठभूमि से आते हैं।
राहुल गांधी जी द्वारा उन्हें यह जिम्मेदारी देना निस्संदेह एक साहसिक और दूरदर्शी निर्णय माना जा सकता है। एक ऐसे युवा को मौका मिला है जिसने जमीन पर काम करके खुद को साबित किया है।
आज भी देश के लाखों युवाओं के मन में यह सवाल उठता है: हम गरीब हैं, हम गाँव से आते हैं, हमारी आर्थिक स्थिति कमजोर है, राजनीति बड़े लोगों का खेल है, इन सभी सवालों का सबसे मजबूत जवाब है- विनोद जाखड़ जी का जीवन।
@VinodJakharIN
मारवाड़ का मान-सम्मान और यहाँ का स्वादिष्ट खाना वाकई लाजवाब है। यहाँ आज भी राजस्थानी संस्कृति अपनी पूरी शान के साथ जीवित है, परंपराएँ, पहनावा, बोली और मेहमाननवाज़ी हर जगह इसकी झलक देती हैं।
गडरा रोड़ (बाड़मेर) के SDM श्री सुरेश मेघवाल जी की एक REEL सोशल मीडिया पर तेज़ी से वायरल हो रही है। इस रील को लेकर समाज में तरह-तरह की प्रतिक्रियाएँ देखने को मिल रही हैं। कुछ लोग उन्हें व्यंग्य में “REEL वाले SDM” कह रहे हैं लेकिन इस पूरे विमर्श को केवल “REEL” तक सीमित कर देना, ज़मीनी हकीकत और उसके पीछे छिपी मानसिकता को नज़रअंदाज़ करना होगा।
यदि हम थोड़ी गहराई में जाएँ, तो यही परिदृश्य हमें बाड़मेर की कलेक्टर टीना डाबी के मामले में भी दिखाई देता है। टीना डाबी लगातार सोशल मीडिया से लेकर ज़मीनी स्तर तक ट्रोल होती रही हैं। सवाल यह है कि क्यों? क्या केवल उनके काम की वजह से? या फिर उनके निर्णयों से असहमति के कारण?
मेरे नज़रिए से देखें तो एक कड़वी सच्चाई साफ़ दिखाई देती है, टीना डाबी एक दलित पृष्ठभूमि से आने वाली IAS अधिकारी हैं और यही कारण है कि उनके हर कदम, हर फैसले और हर गतिविधि को असामान्य रूप से कठघरे में खड़ा किया जाता है।
राजस्थान, विशेषकर कुछ इलाक़े, ऐतिहासिक रूप से जातिवाद की गहरी जड़ों के लिए जाने जाते रहे हैं। आज भी वहाँ अस्पृश्यता और जातिगत भेदभाव के उदाहरण खुले तौर पर देखने को मिल जाते हैं। ऐसे माहौल में जब एक दलित पृष्ठभूमि की महिला IAS अधिकारी उस ज़िले की कलेक्टर बनती है तो कुछ जातिवादी मानसिकता के लोग उसे सहज रूप से स्वीकार नहीं कर पाते। यही वजह है कि टीना डाबी कुछ भी करें, उस पर बहस खड़ी कर दी जाती है।
इसी संदर्भ में SDM सुरेश मेघवाल जी को भी देखा जाना चाहिए। अगर वे दलित पृष्ठभूमि से नहीं आते, तो शायद उनकी REEL पर इतनी तीखी प्रतिक्रिया नहीं होती। इससे पहले भी वे कई मुद्दों पर ट्रोल हुए, प्रताड़ना झेली और उनका तबादला भी हुआ। इसके पीछे कारण चाहे जो रहे हों, लेकिन यह नकारा नहीं जा सकता कि उनकी जातीय पृष्ठभूमि भी कहीं न कहीं एक कारक रही है।
मेरा स्पष्ट मानना है कि टीना डाबी और सुरेश मेघवाल दोनों ही अपने-अपने क्षेत्र में सक्षम, ईमानदार और मेहनती प्रशासनिक अधिकारी हैं।
टीना डाबी एक अत्यंत बुद्धिमान और प्रशासनिक रूप से पारंगत आईएएस अधिकारी हैं, जिन्होंने अपने कार्यकाल में कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए हैं।
वहीं सुरेश मेघवाल जी एक ज़मीन से जुड़े, जिंदादिल अधिकारी हैं, जो फील्ड में जाकर लोगों की समस्याएँ सुनते हैं, समाधान करते हैं और प्रशासनिक ज्ञान का व्यावहारिक उपयोग करते हैं।
अब सवाल यह है कि यदि पद पर रहते हुए कोई अधिकारी एक REEL बना ले, तो उससे क्या फर्क पड़ जाता है? हाल ही में वायरल REEL में सुरेश मेघवाल जी राजस्थानी वेशभूषा में एक प्रशासनिक अधिकारी के रूप में अपने कार्यालय जाते और कार्य करते नज़र आते हैं। इसे सकारात्मक रूप से भी देखा जा सकता था, एक ऐसा अधिकारी जो स्थानीय संस्कृति से जुड़कर प्रशासन का प्रतिनिधित्व कर रहा है लेकिन दुर्भाग्यवश, ऐसा नहीं हुआ।
जो लोग सोशल मीडिया पर इन्हें ट्रोल कर रहे हैं, यदि उनके प्रोफाइल, विचारधारा और आरक्षण व दलितों को लेकर उनके दृष्टिकोण को देखा जाए, तो तस्वीर और साफ़ हो जाती है। वहाँ एक खास किस्म की मनुवादी, जातिवादी सोच दिखाई देती है, जिसे ऐसे अधिकारी “पच” नहीं रहे।
मैं यह नहीं कहता कि रील बनाना सही या ग़लत है, यह एक अलग बहस हो सकती है लेकिन यह ज़रूर कहना चाहूँगा कि इस पूरे ट्रोल अभियान के पीछे केवल “रील” नहीं, बल्कि जातीय द्वेष और असहजता भी काम कर रही है।
इतिहास गवाह है जो अच्छा काम करता है, उसे ट्रोल किया जाता है और जब वह अच्छा काम करने वाला दलित पृष्ठभूमि से हो, तो विरोध और भी तीखा हो जाता है।
यही हकीकत है और यही सबसे बड़ा सच।