@DiprHaryana नई मॉडल ऑनलाइन ट्रांसफर पॉलिसी सभी विभागों के लिए है और टीचर्स ट्रांसफर पॉलिसी-2026 जिसे कैबिनेट की स्वीकृति मिली है सिर्फ स्कूल टीचर्स के लिए है।
This #ThrowbackThursday, we go back to Mahatma Gandhi's historic Salt March, launched 96 years ago today.
The protest showed the power of nonviolent resistance, inspiring movements for freedom, dignity, and human rights around the world.
#HumanRightsForAll
बात बोलेगी
हम नहीं
हिंदी को सलाम, जिसने शमशेर बहादुर सिंह की कविता की इन दो छोटी सी पंक्तियों की तरह अनेकों अनेक कवियों, लेखकों और रचनाकारों के शब्दों में जादू भरा।
#हिंदी_दिवस पर हार्दिक शुभकामनाएं 💐
मुख्यमंत्री @NayabSainiBJP जी, बेहतर होता UPS को पहले विधायकों और मंत्रियों के लिए लागू किया जाता..
कर्मचारियों पर ही प्रयोग क्यों ?
#NoNPS_NoUPS_OnlyOPS
#डेट बदलने से कुछ नहीं होगा, व्यवस्था बदले और ops दीजिए । उसके लिए बस एक बार मौका दीजिए पूरा देश बता देगा उसे क्या चाहिए, बार-बार संशोधन, प्रलोभन किसी काम का नहीं।
और देशभर के शिक्षकों, कर्मचारियों व अधिकारियों से #अपील करता हूं सरकार के इस मायाजाल में मत फंसेगा क्योंकि #एक बार यूपीएस में चले जाने का मतलब आपने हमेशा के लिए ops को खो दिया। और सरकार यही #चालाकी कर रही है। जो दरबारी और सरकारी संगठन है उनके संशोधन प्यार में नहीं आइएगा। जो समझा रहे हैं बहुत अच्छी है वह खुद नहीं ले रहे हैं।
#NoNPS_NoUPS_OnlyOPS
#vijaykumarbandhu
#अटेवा
#NMOPS
बगीचों में विचरते हिरणों को देख लगा कि वे बैठ कर कुछ विचार-विमर्श कर रहे हैं।
यह मज़ाक़ नहीं। एक शोधार्थी ने बताया कि ये हिरण यहाँ के फैकल्टी हैं। प्रतीक रूप में उनके उतने ही अधिकार हैं, जितना एक ऑक्सफ़ोर्ड के शिक्षक का होता है।
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गुरुकुल की कल्पना जो हमारे मन में होती है कि खुले आसमान तले छात्र पढ़ रहे होंगे, आस-पास हिरण विचरते, चिड़िया चहचहा रही होंगी। नदी कल-कल बह रही होगी,
वो अनुभूति ऑक्सफ़ोर्ड में मिलती है।
सड़कों पर मशाल जलती है। जिसकी रोशनी में छात्र पढ़ते हैं। यह भी अतिशयोक्ति नहीं। स्ट्रीट लाइट को वही रूप दिया गया, जैसे दशकों पहले बिजली के आविष्कार से पूर्व मशाल जलती थी।
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ऑक्सफ़ोर्ड किसी कालेज का नाम नहीं, वह पूरा क़स्बा या ही ऑक्सफ़ोर्ड है। वहाँ कालेजों के अलावा, वहां जो कुछ भी है, वह कालेज के निमित्त ही है।
जितनी इमारतें हैं, वह या तो कालेज है, या पुस्तकालय, स्टेशनरी दुकानें, पुस्तकालय, किताबों की दुकानें, विद्यार्थी भोजनालय, या शिक्षक अथवा विद्यार्थी आवास।
तो ऑक्सफोर्ड कई महाविद्यालयों का समुच्चय है। कोई कह सकता है कि ऐसा तो दिल्ली विश्वविद्यालय भी है। लेकिन दिल्ली तो विश्वविद्यालय से इतर एक राजधानी भी है, एक व्यस्त शहर भी है।
ऑक्सफ़ोर्ड शहर का पर्याय ही विश्वविद्यालय है।
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यहां छात्र दाखिला किसी महाविद्यालय में लेते हैं। लेकिन उस कालेज में नहीं पढ़ते। वहाँ उनकी कक्षाएँ नहीं लगती। कालेज की भव्य प्राचीन इमारत मात्र पंजीकरण के लिए है।
कक्षाएँ तो कालेज प्रांगण से बाहर स्थित ऑक्सफ़ोर्ड शहर में बिखरे विभागीय भवनों में लगती है। चाहे जहां दाखिला लिया, अमुक विषय की कक्षा अन्य कालेजों के विद्यार्थियों के साथ कहीं और लगेगी।
फिर अलग-अलग कालेज बनाए ही क्यों? ये प्रशासनिक विभाजन है। यह विद्यार्थी को एक पहचान देता है। पहचान पत्र कालेज का होता है। उस कालेज के पुस्तकालय का प्रयोग उस कालेज के विद्यार्थी ही कर सकते हैं।
विक्टोरियाई शैली में बने डाइनिंग हाल में बैठ कर खाना खाने की इजाज़त भी उन्हें ही है। वहाँ के बगीचों में बेझिझक घूम सकते हैं। वहीं उनके गाइड या ट्यूटर भी मिलेंगे।
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आप पूछेंगे कि अब यह गाइड क्या बला है? गाइड तो पीएचडी विद्यार्थियों के होते हैं।
ऑक्सफ़ोर्ड में हर छात्र को मार्गदर्शक मिलते हैं। एक अभिभावक की तरह। वह उनसे नियमित बात-चीत करते हैं। पढ़ाई कैसी चल रही है? किसी विषय मे कोई समस्या तो नहीं? कोई मानसिक तनाव तो नहीं? स्वास्थ्य कैसा है? खाने-पीने की कोई दिक्कत? आर्थिक समस्या?
गाइड ऑक्सफ़ोर्ड से निकलने के बाद भी जीवन भर उनसे जुड़ जाते हैं। यह गुरु-शिष्य का रिश्ता है, जो कालेज की सीमाओं से परे है। पश्चिमी उपमा दें तो - गॉडफादर।
फिर कुछ ऐसा दिखा, जिसकी मैंने उम्मीद भी नहीं की थी।
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मैं जब ऑक्सफ़ोर्ड के संत मैरी गिरजाघर पहुँचा, तो दरवाज़े बंद थे। अंदर कोई विवाह कार्यक्रम था। मुझे कहा गया कि तीन घंटे बाद आएँ।
मुझे गिरजाघर में रुचि नहीं थी, लेकिन न जाने क्यों ऐसा लगा कि तीन घंटे बाद लौट ही आना चाहिए। अंदर कुछ था, जो मुझे आकर्षित कर रहा था।
जब घूम-फिर कर पहुँचा तो थोड़ी निराशा भी हुई। यह गिरजाघर तो विक्टोरियाई शैली का भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि यह महारानी विक्टोरिया के जन्म से भी सदियों पहले बन गया होगा।
गिरजाघरों को संपूर्णता से देखने के लिए अक्सर दूसरी मंजिल की मुंडेर पर चला जाता हूँ। सिनेमा हॉल की बाल्कनी सा अनुभव होता है।
यीशु मसीह के मस्तक के बराबर खड़े होकर ही वे तमाम बेंच, वह पूजा का अलतार, वे मोमबत्तियों के स्टैंड, वे भित्ति-चित्र जो दीवालों से लेकर छत तक…
अरे, ये क्या!!
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छत पर मुझे एक विचित्र आकृति दिखी। मैंने आँखें मींच कर देखा कि कहीं ये मेरा भ्रम तो नहीं। तमाम बाइबल के पात्रों के मध्य गोल चश्मा लगाए ऊँकडू बैठे व्यक्ति आखिर कौन हैं?
मूसा, गैब्रियल, अब्राहम, डेविड और तमाम फ़रिश्तों में चश्मा तो भला कोई न लगाता होगा। आधुनिक दुनिया का कोई महामानव ही हो सकता हैं, जिन्हें गिरजा वालों ने संत का दर्जा दे दिया हो।
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भाग कर नीचे गया, और बाहर साथ ही लगे दुकान में स्मृति-वस्तु (Souvenir) बेचने बैठी महिला से पूछा- “अंदर गिरजाघर में छत पर गोल चश्मा लगाए वही हैं क्या?”
उन्होंने मुझ भारतीय शक्ल-सूरत वाले व्यक्ति को ऊपर से नीचे देखा, और मुस्कुरा कर कहा
“हाँ! गांधी ही हैं!”
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मैं दंग था । कभी आइंस्टाइन ने कहा था कि दुनिया को विश्वास नहीं होगा कि गांधी जैसा हाड़-माँस का व्यक्ति पृथ्वी पर चला था।
पश्चिमी शिक्षा के केंद्र में इस गिरजाघर की छत पर चस्पा गांधी हाड़-माँस के इकलौते व्यक्ति थे, जो पृथ्वी पर चले थे।
(Praveen Jha प्रवीण झा ने लिखा)
खरपतवार को कोई नहीं बोता फिर भी बढ़ जाती है और फसलें मेहनत से बोनी पड़ती हैं।
झूठ और नफ़रत भी खरपतवार सी फैलते हैं लेकिन सच्चाई और सद्भाव को प्रयास करके फैलाना पड़ता है।
क्यों? क्योंकि, शायद जो कीमती होता है वो देखभाल मांगता है।
आप क्या सोचते हैं?
#चौधरी_चिंतन
वर्षों की मेहनत के बाद एक शिक्षक अपने विद्यार्थियों के मन, वचन और कर्म में देखता, सुनता और फिर कहता है - जिंदाबाद मेरी #JaiHindKiSena!
#opretionsindoor