लोकतंत्र एक बार फिर शर्मसार!
दिल्ली के जंतर-मंतर पर पिछले 21 दिनों से शांतिपूर्ण अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे सोनम वांगचुक जी को सादा कपड़ों में पहुँचे पुलिसकर्मियों द्वारा जबरन अस्पताल ले जाना तथा उनके साथियों के साथ मारपीट कर उन्हें हिरासत में लेना अत्यंत निंदनीय और लोकतांत्रिक मूल्यों पर सीधा प्रहार है।
इससे पहले वन रैंक वन पेंशन की मांग को लेकर महीनों तक धरने पर बैठे पूर्व सैनिकों के साथ भी यही हुआ। देश का गौरव बढ़ाने वाली महिला पहलवानों के शांतिपूर्ण आंदोलन को भी इसी तरह बलपूर्वक हटाया गया। अब सोनम वांगचुक जी के सत्याग्रह के साथ भी वही व्यवहार किया जा रहा है।क्या शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार केवल सत्ता की सुविधा तक ही सीमित रह गया?
हम प्रकृति से प्रार्थना करते हैं कि सोनम वांगचुक जी को उत्तम स्वास्थ्य, शक्ति और दीर्घायु प्रदान करे।
#SonamWangchuk
@abhijeet_dipke 𝗖𝗝𝗣 Protest – Day 27 | Jantar Mantar 📍
📷 दिल्ली मेट्रो में छात्रों का संदेश: - "माँ-बाप लोन लेकर पढ़ाते हैं, लेकिन कथित '94 पेपर लीक' जैसे दावों ने लाखों परिवारों की चिंता बढ़ा दी है।" 📷 😢
The media that ignored Jantar Mantar protest all this time has finally arrived.
Their first job? Smear the protest with baseless propaganda. Just look at this ABP News reporter.
चन्द्रशेखर आजाद के अलावा सभी नेताओं ने अपनी सरकारों में जमकर भ्रष्टाचार किये हैं और उन सबकी कमजोर नब्ज भाजपा ने पकड़कर रखी है। यही कारण है कि चन्द्रशेखर के अलावा कोई नेता खुलकर सामने नहीं आ रहा है 🚫
अगर आप मेरी बात से सहमत हैं तो इस बात को शेयर करके देशभर में फैला दो...!!
केन–बेतवा लिंक परियोजना से प्रभावित आदिवासी पिछले कई वर्षों से उचित मुआवज़े, सम्मानजनक पुनर्वास और अपने संवैधानिक एवं कानूनी अधिकारों की मांग को लेकर संघर्ष कर रहे हैं। इस वर्ष अप्रैल में भी प्रभावित परिवारों ने आंदोलन किया था। तब प्रशासन द्वारा समझा-बुझाकर आंदोलन समाप्त करा दिया गया था, लेकिन मांगें पूरी न होने के कारण अबकी बार वे आखिरी तक लड़ने के जज़्बे के साथ आंदोलन के 14वें दिन भी चिता सत्याग्रह, जल सत्याग्रह, मिट्टी सत्याग्रह तथा प्रतीकात्मक फांसी सत्याग्रह के माध्यम से अपनी आवाज़ बुलंद कर रहे हैं। आंदोलनकारियों का आरोप है कि अपनी लोकतांत्रिक आवाज़ उठाने पर उन्हें शासन-प्रशासन द्वारा तरह-तरह से परेशान किया जा रहा है।
आंदोलनकारी आदिवासियों का आरोप है कि वन अधिकार अधिनियम, 2006 तथा भूमि अधिग्रहण, पुनर्वासन एवं पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर एवं पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 के प्रावधानों का समुचित पालन नहीं किया गया। उनका कहना है कि कई प्रभावित परिवारों के घरों को बिना पर्याप्त पूर्व सूचना ध्वस्त कर दिया गया। इसके साथ ही मुआवज़े के निर्धारण और वितरण में अनियमितताओं एवं भ्रष्टाचार के आरोप भी सामने आए हैं।
उनका यह भी कहना है कि उन्हें दिया जा रहा मुआवज़ा वास्तविक नुकसान की तुलना में बेहद अपर्याप्त है। इस राशि से न कहीं और सम्मानजनक ढंग से बसना संभव है, न रहने के लिए घर की समुचित व्यवस्था हो सकती है, न आजीविका का स्थायी साधन जुटाया जा सकता है और न ही बच्चों की शिक्षा एवं परिवार के भविष्य को सुरक्षित किया जा सकता है। उनका यह भी कहना है कि जिन स्थानों पर उनका पुनर्वास किया गया है, वहाँ बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव है। ऐसे में प्रभावित परिवारों के सामने अपने अस्तित्व और भविष्य का गंभीर संकट खड़ा हो गया है।
यदि विकास के नाम पर लोगों को उनकी पुश्तैनी जमीन, घर, आजीविका और सामाजिक जीवन से विस्थापित किया जाता है, तो यह सरकार की जिम्मेदारी है कि प्रत्येक प्रभावित परिवार को न्यायपूर्ण एवं पर्याप्त मुआवज़ा, सम्मानजनक पुनर्वास, मूलभूत सुविधाओं से युक्त पुनर्वास स्थल, वैकल्पिक आजीविका तथा कानून के अनुरूप सभी अधिकार सुनिश्चित किए जाएँ।
मैं शीघ्र ही अपने इन परिवारों से मिलने उनके बीच जाऊँगा। मेरा वादा है कि उनकी आवाज़ बनकर इस पूरे मामले को लोकसभा में पूरी मजबूती के साथ उठाऊँगा।
@MP_MyGov को आंदोलनरत आदिवासी परिवारों के साथ संवेदनशीलता और गंभीरता से संवाद कर उनकी जायज़ मांगों का शीघ्र समाधान करना चाहिए। विकास तभी सार्थक है, जब वह न्यायपूर्ण, पारदर्शी, सहभागी और मानवीय हो; न कि आदिवासियों के अधिकारों, सम्मान और भविष्य की कीमत पर।
दिल्ली से बड़ी खबर 🚨
- देर राथ CJP फाउंडर Abhijeet Dipke ने नगीना सांसद @BhimArmyChief चन्द्रशेखर आजाद जी के आवास पर पहुंचकर उनसे मुलाकात की
- कल जंतर-मंतर पर पहुंचेंगे चन्द्रशेखर आजाद।।
मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले के राजनगर थाना क्षेत्र के ग्राम कोड़ा में किसान मोतीलाल कुशवाहा जी पर गोली चलाने की घटना अत्यंत गंभीर और चिंताजनक है।
पीड़ित किसान के अनुसार, कथावाचक धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के भाई शालिग्राम गर्ग और उसके साथियों द्वारा गरीब किसानों की जमीनें हथियाने की शिकायत को लेकर ज्ञापन देने पर उन पर गोली चलाई गई। यह घटना कानून-व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करती है
मुख्यमंत्री @DrMohanYadav51, शालिग्राम गर्ग का नाम पहले भी विवादों में सामने आ चुका है। कुछ समय पूर्व एक दलित परिवार की शादी में उत्पात मचाने और महिलाओं के साथ अभद्रता की घटना प्रमुख हैं। उस मामले की जांच अभी भी जारी है। यदि उस मामले में समय रहते प्रभावी कार्रवाई की गई होती, तो ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति पर अंकुश लगाया जा सकता था।
हम @MP_MyGov से मांग करते हैं कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष, पारदर्शी और त्वरित जांच कराई जाए। जांच में जो भी व्यक्ति दोषी पाया जाए, उसके विरुद्ध उसकी सामाजिक, धार्मिक या राजनीतिक पहचान से ऊपर उठकर कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
किसी भी किसान को भय, हिंसा या दबाव के बल पर अपनी जमीन छोड़ने के लिए विवश करना अस्वीकार्य है।
हम घायल किसान मोतीलाल कुशवाहा जी के शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की कामना करते हैं और आशा करते हैं कि उन्हें न्याय अवश्य मिलेगा।
जब देश का युवा किताब छोड़कर सड़क पर बैठ जाए, तो समझ लीजिए संकट छात्रों का नहीं, व्यवस्था का है।
पेपर लीक, भर्ती में गड़बड़ी, महंगी होती शिक्षा और बढ़ती बेरोज़गारी - यही आज लाखों युवाओं की हकीकत है।
अगर अपनी बात सुनाने के लिए छात्रों को जंतर-मंतर पर भूख हड़ताल करनी पड़े, तो सवाल छात्रों पर नहीं, सरकार की जवाबदेही पर उठता है।
भाजपा सरकार बताए - क्या शिक्षा और रोजगार उसकी प्राथमिकता हैं, या सिर्फ़ चुनावी भाषणों का हिस्सा?
युवाओं को प्रचार नहीं, जवाब चाहिए।
द्रोणाचार्यों की खैर नहीं! 🚨😡
केरल के कन्नूर डेंटल कॉलेज के प्रोफेसर डॉ. कोडंडा राम ने नितिन राज को भरी क्लास में जातिगत रूप से जलील किया। वह आए दिन दलित छात्रों को जलील करता रहता था।
नितिन राज इस अपमान को बर्दाश्त नहीं कर सका, और कॉलेज की छत से कूदकर अपनी जान दे दी। यह इसी साल अप्रैल की घटना थी। जिला कोर्ट ने उस प्रोफेसर को अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया। फिर वह हाई कोर्ट गया, लेकिन मामले की गंभीरता को देखते हुए 19 जून को हाई कोर्ट ने भी उसे राहत देने से मना कर दिया।
हालांकि जातिवादी प्रोफेसर कोडंडा को भला कैसे बर्दाश्त होगा कि किसी दलित की आत्महत्या के मामले में वह जेल जाए। दलित तो कीड़े मकोड़े होते हैं। उनकी जान की क्या ही कीमत है? अतः वह अब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, लेकिन उसके तमाम कुतर्कों को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने भी उसे कोई राहत देने से मना कर दिया है। अब उसे कानूनी कार्रवाई तो झेलनी ही होगी। सुप्रीम कोर्ट ने इस संस्थागत उत्पीड़न को अत्यंत संवेदनशील माना और कहा:
"उस प्रोफेसर को अपने कृत्यों के नतीजों का एहसास होना चाहिए। अगर क्लासरूम में किसी स्टूडेंट की इस तरह बेइज्जती अथवा अपमान किया जाता है, तो इसका उस स्टूडेंट पर क्या असर होगा? वह टीचर इस तरह का बर्ताव करके बच नहीं सकता। समाज में एक कड़ा संदेश जाना चाहिए।"
सरकार, न्यायपालिका एवं अन्य सभी संस्थाओं को जाति के मुद्दे को लेकर अत्यंत संवेदनशील होना चाहिए। दलितों के प्रति जातीय कुंठा के भाव से घिरे हुए प्रोफेसर इस धरती पर एक कलंक हैं, जो आज भी किसी अर्जुन को महान बनाने के लिए एवं जातीय दुर्भावना के चलते किसी एकलव्य का अंगूठा काटने को तैयार हैं। सच कहें तो आज की स्थिति उससे भी अधिक भयावह है। आज के मनुवादी प्रोफेसर दलितों का सिर्फ अंगूठा नहीं काटते, बल्कि उनका गला ही काट रहे हैं। उन्हें इतना प्रताड़ित किया जा रहा है कि वे आत्महत्या करने को मजबूर हैं। न जाने कितने दलित छात्र आज भी रोहित वेमुला की तरह प्रताड़ना के तले घुट-घुटकर जी रहे हैं।
कल चंद्रशेखर आज़ाद भाई से बात हुई
उन्होंने दावा किया कि उनके खिलाफ पूरी प्लानिंग चल रही है।
उनका कहना था कि बड़े-बड़े अधिकारियों को लगाकर उनकी बेइज़्ज़ती वाले वीडियो बनवाने की कोशिश की जा रही है, ताकि वो लोगों के बीच जाने से डर जाएँ।
उनका आरोप है कि इसके पीछे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं।
अन्ना हजारे दिल्ली में 13 दिन अनशन पर बैठे तो सरकार को उनके आगे झुकना पड़ा
परंतु आज देश के एक प्रतिष्ठित व्यक्ति सोनम वांगचुक पिछले 15 दिनों से जंतर-मंतर पर बैठे हुए हैं, सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ रहा। आखिर क्यों? सरकार किसके लिए है फिर
सरकार का यह रवैया उसकी जवाबदेही पर सवाल खड़े कर रहा है। लोकतांत्रिक देश में ऐसा नहीं होना चाहिए।।