ईश्वर ने हमारे परिवार को एक बेहद पवित्र कार्य के लिये चुना जिसके फलस्वरूप अपने गाँव में
माँ भगवती के मंदिर का निर्माण कार्य संपन्न कराने में हम लोग सक्षम हुए।
इस नेक कार्य में हर ग्रामीण का सहयोग भी हमें मिलता रहा।
आप सबों को दुर्गापूजा की हार्दिक शुभकामनाएँ।
हमारे देश में औसतन हर 5 मिनट में एक मृत्यु स्ट्रोक की वजह से होती है।
स्ट्रोक के मुख्य लक्षण (Major Symptoms):
अचानक शरीर के एक हिस्से में कमजोरी या सूनापन विशेषकर चेहरा, हाथ या पैर (अक्सर शरीर के एक ही तरफ)।
मरीज़ का मुँह टेढ़ा हो सकता है।
बोलने में कठिनाई (Speech problem)
शब्द ठीक से नहीं निकलते।
बात समझ में नहीं आती।
बोलते समय जुबान लड़खड़ाती है।
देखने में परेशानी (Vision problem)
एक या दोनों आँखों से धुंधला या कम दिखना।
चलने में कठिनाई (Loss of balance)
चक्कर आना, संतुलन बिगड़ना, चलने में असमर्थता।
तेज सिरदर्द (Severe headache)
अचानक और बहुत तेज़ दर्द, कभी-कभी उल्टी के साथ खासकर जब स्ट्रोक ब्लीडिंग (hemorrhagic stroke) से हो।
बेहोशी या मानसिक भ्रम (Confusion / Unconsciousness)
व्यक्ति अचानक होश खो सकता है या समझना-बोलना बंद कर देता है।
स्ट्रोक पहचानने का आसान तरीका (FAST Rule):
F – Face: मुँह टेढ़ा हो गया क्या?
A – Arm: एक हाथ उठाने में कमजोरी तो नहीं?
S – Speech: बोलने में कठिनाई है क्या?
T – Time: समय बर्बाद न करें – तुरंत अस्पताल जाएँ।
क्या करें (First Aid):
तुरंत एंबुलेंस बुलाएँ या नज़दीकी अस्पताल के इमरजेंसी विभाग में जाएँ।
सिर थोड़ा ऊँचा रखें।
कुछ खाने या पीने को न दें।
अगर मरीज़ बेहोश हो, साँस और नब्ज़ देखें।
याद रखें:
पहले 3 घंटे (Golden Hours) में इलाज मिल जाए तो मरीज़ की जान और दिमाग दोनों बचाए जा सकते हैं।
ना किसी भी दौर में मोहन दास कर्मचंद गांधी बनना आसान है और ना ही लाल बहादुर शास्त्री जैसा अब किसी दौर में कोई होगा।
देश गांधी जी और शास्त्री जी के सिद्धांतों को आत्मसात् करे यही इन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
जयंती दिवस पर देश के दोनों रत्नों को शत-शत नमन
🙏🏼🙏🏼
@c_saraswatRam सिर्फ CBC, RFT और LFT करवाने के लिए आमतौर पर खाली पेट रहना जरूरी नहीं है।
हालांकि कुछ परिस्थितियों में डॉक्टर LFT टेस्ट से पहले fasting के लिए कह सकते हैं।
शोहरतें जब इतनी सस्ती हों अदब देखेगा कौन
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बिखरे बिखरे सहमे सहमे रोज़ ओ शब देखेगा कौन
लोग तेरे जुर्म देखेंगे सबब देखेगा कौन
हाथ में सोने का कासा ले के आए हैं फ़क़ीर
इस नुमाइश में तिरा दस्त-ए-तलब देखेगा कौन
ला उठा तेशा चटानों से कोई चश्मा निकाल
सब यहाँ प्यासे हैं तेरे ख़ुश्क लब देखेगा कौन
दोस्तों की बे-ग़रज़ हमदर्दियाँ थक जाएँगी
जिस्म पर इतनी ख़राशें हैं कि सब देखेगा कौन
शायरी में 'मीर' ओ 'ग़ालिब' के ज़माने अब कहाँ
शोहरतें जब इतनी सस्ती हों अदब देखेगा कौन
🖊️ मेराज फ़ैज़ाबादी
कोशी रेंज सहरसा के पुलिस उपमहानिरीक्षक श्री डॉ कुमार आशीष जी @ipskumarashish का ये आलेख पढ़ा जाना चाहिए:-
पिछले दिनों मुझे एक संरक्षण गृह में रह रहे उन बच्चों से संवाद करने का अवसर मिला, जो किसी न किसी कारण से कानून की जद में आए थे और फिलहाल अपने सामान्य सामाजिक परिवेश से अलग रह रहे हैं। उन बच्चों को देखते हुए मेरे मन में एक सवाल उठा, जो केवल पुलिस व्यवस्था या किशोर न्याय तक सीमित नहीं है। जब ये बच्चे एक दिन इस संरक्षण गृह से बाहर निकलेंगे, तब हम उन्हें कैसा देखना चाहते हैं?
क्या हम चाहते हैं कि वे जीवन भर अपने अतीत और अपनी गलतियों का बोझ ढोते रहें? या हम चाहते हैं कि वे एक दिन आत्मविश्वासी, कुशल, स्वावलंबी और जिम्मेदार नागरिक बनकर समाज में लौटें?
मेरे लिए इसका उत्तर स्पष्ट है, किसी बच्चे की एक गलती को उसकी पहचान का हिस्सा नहीं बनने दिया जा सकता। उसे अपनी गलती समझने, उससे सीखने और जीवन को नई दिशा देने का अवसर मिलना चाहिए। कानून की जद में आए बच्चों के प्रति हमारा दृष्टिकोण केवल दंडात्मक नहीं, बल्कि सुधारात्मक और पुनर्वासपरक होना चाहिए।
यही सोच तब महत्वपूर्ण हो जाती है, जब हम बच्चों में बढ़ते नशे के खतरे की बात करते हैं। नशे का सबसे खतरनाक पहलू यही है कि वह अक्सर दुश्मन बनकर नहीं, दोस्त बनकर जीवन में प्रवेश करता है। जब तक उसके दुष्परिणाम दिखाई देते हैं, तब तक वह शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवार, आर्थिक स्थिति और निर्णय लेने की क्षमता पर असर डाल चुका होता है।
कई मामलों में नशे पर निर्भरता व्यक्ति को चोरी, हिंसा, तस्करी या दूसरे अपराधों की ओर भी धकेल सकती है। इसलिए नशे के विरुद्ध लड़ाई केवल पुलिस या कानून की लड़ाई नहीं हो सकती। इसकी शुरुआत परिवार, विद्यालय और समुदाय से होनी चाहिए।
बच्चों को केवल यह बताना पर्याप्त नहीं है कि “नशा मत करो”, बल्कि हमें उन्हें यह भी सिखाना होगा कि वे नशे के प्रस्ताव को कैसे ठुकराएं, साथियों के दबाव से कैसे निपटें और संकट में मदद कैसे मांगें।
यदि कोई बच्चा पहले से नशे की गिरफ्त में है तो उसके लिए सबसे जरूरी संदेश यह है कि उसका जीवन समाप्त नहीं हुआ है। उसे दुनिया से छिपने की नहीं, सहायता लेने की जरूरत है। काउंसलिंग, चिकित्सकीय सहायता, मनोवैज्ञानिक सहयोग, परिवार का समर्थन और सकारात्मक वातावरण किसी युवा को नशे की निर्भरता से बाहर निकालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
इसके लिए पुनर्वास की एक सुविचारित और बहुआयामी व्यवस्था आवश्यक है। जिस बच्चे की पढ़ाई छूट गई है, उसे यथासंभव पुनः शिक्षा से जोड़ना होगा। जिन बच्चों के लिए औपचारिक शिक्षा कठिन है, उनके लिए व्यावसायिक एवं तकनीकी प्रशिक्षण के रास्ते खोलने होंगे।
कौशल केवल रोजगार का माध्यम नहीं है। यह आत्मसम्मान और गरिमा का माध्यम भी है। जब किसी युवा को यह विश्वास होता है कि वह अपने श्रम और कौशल से सम्मानपूर्वक जीवन जी सकता है, तो गलत लोगों और गलत रास्तों पर उसकी निर्भरता कम होती है।
कई बार अपराध किसी सुनियोजित योजना का परिणाम नहीं होता। वह कुछ क्षणों के अनियंत्रित आवेग का परिणाम होता है। क्रोध आना स्वाभाविक है, लेकिन क्रोध में लिया गया निर्णय जीवन बदल सकता है।
इसलिए युवाओं को यह सिखाना जरूरी है कि प्रतिक्रिया देने से पहले कुछ क्षण रुकें, परिस्थिति से थोड़ी दूरी बनाएं, गहरी सांस लें, किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात करें और स्वयं से पूछे “मैं अभी जो करने जा रहा हूं, क्या वह मेरे भविष्य को बेहतर बनाएगा?”
कई बार जीवन बदलने के लिए केवल कुछ सेकंड रुक जाना ही पर्याप्त होता है।
पुलिस की भूमिका इसमें महत्वपूर्ण है। आधुनिक पुलिसिंग केवल अपराध होने के बाद कार्रवाई करने का नाम नहीं है। उसका उद्देश्य अपराध की रोकथाम, समुदाय के साथ विश्वास का निर्माण और सुरक्षित वातावरण तैयार करना भी है।
हमारी वास्तविक सफलता तब होगी, जब हम यह कह सकें कि कितने बच्चों को हमने नशे से बचाया, शिक्षा से जोड़ा, कौशल दिया, आत्मनिर्भर बनाया और कितनों को एक सामान्य, सम्मानजनक और उत्पादक जीवन में वापस पहुंचाया।
एक बच्चा जब संरक्षण गृह से निकले तो उसके हाथ में शिक्षा, कौशल और रोजगार का अवसर हो, नशे और नकारात्मक संगति से दूर रहने की योजना हो तथा अपने जीवन को सार्थक बनाने का विश्वास हो।
जब एक युवा नशे की जगह सपनों को, क्रोध की जगह अनुशासन को, निर्भरता की जगह कौशल को और अपराध की जगह जिम्मेदारी को चुनता है, तो समाज केवल एक सुधरा हुआ व्यक्ति प्राप्त नहीं करता, उसे एक नया नागरिक मिलता है।
यही वह दूसरा अवसर है, जो किसी एक बच्चे का जीवन बदलने से आगे बढ़कर पूरे समाज और राष्ट्र का भविष्य बदल सकता है।
औसतन भारत में हर घंटे 19 मृत्यु सड़क दुर्घटना से होती है।
और इनमें ज़्यादातर मृत्यु युवाओं की होती है।
कुछ चीज़ें जो हमेशा रखें ध्यान:
1) गाड़ी की गति को हमेशा नियंत्रण में रखें।
जब तक गाड़ी की गति 60 km/hr है तब तक आप गाड़ी पर सवार हैं । और उसके बाद गाड़ी आप पर सवार है।
इसलिए गाड़ी को कभी ख़ुद पर नहीं सवार होने दें।
2) नशे और नींद में गाड़ी ना चलायें।
3) दुर्घटना में घायल व्यक्ति को जल्द से जल्द अस्पताल पहुँचाए। पहले एक घंटे काफ़ी महत्वपूर्ण है।
सिर्फ़ ये फोटो देख कर किसी निष्कर्ष पर पहुँचना मुश्किल है।
लेकिन यह स्थिति गंभीर दिख रही है।
तुरंत किसी बड़े tertiary care hospital (Patna AIIMS, PMCH, IGIMS, या किसी vascular surgery/trauma center) मे दिखाना चाहिए ।
चिकित्सक कुछ जाँच जैसे की Color doppler, ct या mri देख कर ही कुछ इलाज के तरीक़े पर आएँगे । कई blood test की भी ज़रूरत पड़ेगी ।
देरी बिल्कुल न करें।
यदि दर्द बहुत ज्यादा है, बुखार है, बदबूदार स्राव है, सूनापन बढ़ रहा है, या काला हिस्सा फैल रहा है तो यह और भी चिंताजनक है
@dranuj_k सर, ज़रा इन पैरों पर गौर कीजिए। 17 को चोट लगी, 18 को कुछ नहीं हुआ और 19 से यह स्थिति उत्पन्न हो गई है। पैर में छेद हो गया है परंतु डाक्टर कह रहे हैं कि पैर काटना पड़ेगा।
कृपया मदद कीजिए। लड़के की उम्र 26 वर्ष है और मामला जयनगर, बिहार का है।
एक पुरानी पोस्ट:-
कैंसर एक ऐसी बीमारी ने जिसने करोड़ो घर तबाह किए हैं ।
सिर्फ मरीज ही नहीं बल्कि मरीज के परिवारों को ।
दवाइयों का खर्च वहन करते करते लोग टूट जाते हैं ।
और कैसे नहीं टूटेंगे अगर 600 रुपये की दवाई पर सरकार ने छूट दे रखी है 12000 रुपये MRP रखने की ।
जी हाँ ।
दवाई है Paclitaxel ।
रिटेलर खरीदते हैं 600 में और MRP है 12000.
एक मरीज को कई बार 20-30 vial की ज़रूरत पड़ती है ।
और ये कोई एक दवाई की बात नहीं ।
कीमोथेरेपी की ज़्यादातर दवाइयों का यही हाल है ।
200% मार्जिन भी समझ में आता है लेकिन 1900% margin??
वो कैंसर जैसी बीमारी में , जिसका इलाज वैसे भी काफ़ी लंबा चलता है??
ग़रीब तो मर ही जाएगा ना?
ये तो ठीक नहीं हैं ना साहब ?
@PMOIndia
https://t.co/TNzzvf5gAl
There are essential medicines for cancer for which MRP is ₹27000 and PTR (price to retailer) is ₹2700. That’s absolute rampage and carnage and broad day light dacoity with the patients. How can a patient be cheated for a medicine which the manufacturer sells to the retailer at ₹2700 and MRP is printed at ₹27000? It is surprising that the authorities who are supposed to take a decision on this are absolutely silent. We need not spell out the reasons for that: Supreme Court
अगर कोई दवाई बनने के बाद स्टॉकिस्ट तक 600 रुपये में पहुँच जाती है तो उस दवाई पर MRP 12000 लिखने की इज़ाज़त सरकार क्यों देती है??
https://t.co/a6zcPVFeAn
The most expensive part of a hospital bill may never touch the hospital at all.
A patient admitted for care has no way of knowing whether the price on a medical consumable reflects its actual cost or a markup fixed long before it ever reached the ward. That gap in information is, at its core, a public health issue.
A survey of hospital consumables in Maharashtra found an IV infusion set with a trade price of ₹11.05 carrying a printed MRP of ₹325 ; a markup of 2,841%. A syringe procured at ₹6.75 carried an MRP of ₹57.20. A catheter procured at ₹29.41 carried an MRP of ₹310.
These are not elective purchases. Patients cannot compare prices, seek alternatives, or question a number printed on a box while receiving care and the MRP itself is often fixed upstream by manufacturers and distributors, disconnected from the trade price by a wide, unexplained margin. The result is a system where the party bearing the cost has the least information to evaluate it.
The regulatory gap is structural: scheduled medicines are capped under the Drugs (Prices Control) Order, 2013. Most medical devices and consumables are not leaving both the pricing and the information around it almost entirely unmonitored.
A review of these findings and clear guidelines on the permissible gap between trade procurement price and declared MRP have been recommended to the Department of Pharmaceuticals and the NPPA ; a step toward closing not just a pricing gap, but the information gap patients are left to bear alone.
#PublicHealth #GoodGovernance #Leadership #TukaramMundhe
https://t.co/Ye9CVzr8qU
Irritable Bowel Syndrome/ IBS
बहुत से लोग सालों से पेट दर्द, गैस, पेट फूलना, कभी दस्त और कभी कब्ज की शिकायत करते हैं।
लेकिन कई खून की जांच, सोनोग्राफी, और एंडोस्कोपी के बाद भी तकलीफ बनी रहती है। यही IBS है।
यह आंतों की एक आम समस्या है।
इसमें आंतें खराब नहीं होतीं, उनमें घाव या सूजन नहीं होता, कैंसर का खतरा भी नहीं बढ़ता लेकिन आंतें गलत तरीके से काम करने लगती हैं।
आइए समझते हैं की इस बीमारी में आखिर होता क्या है।
हमारा दिमाग और पेट हर समय एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं।
खाना पचाने, आंतों को चलाने और दर्द महसूस करने का काम इसी कनेक्शन से चलता है।
IBS में यही तालमेल बिगड़ जाता है।
आंतें सामान्य गैस और खाने पर भी ज्यादा दर्द महसूस करने लगती हैं।
कुछ लोगों की आंतें बहुत तेज चलती हैं, खाना जल्दी निकल जाता है और दस्त होता है।
और कुछ लोगों में आंतें बहुत धीरे चलती हैं, मल सूख जाता है और कब्ज हो जाता है।
बहुत से लोगों में यह दोनों लक्षण बारी-बारी से होता है ।
कई बार पेट के इन्फेक्शन के बाद भी यह शुरू हो सकता है। आंतों के अंदर के बैक्टीरिया का संतुलन बिगड़ने से गैस बनना बढ़ जाता है।
तनाव, खराब नींद, अनियमित खाना और कुछ खास खाद्य पदार्थ इस समस्या को और बढ़ा देती है।
महिलाओं में पीरियड्स के आसपास लक्षण तेज हो सकते हैं।
मुख्य लक्षण
इसके मुख्य लक्षण हैं पेट के निचले हिस्से में दर्द या ऐंठन, गैस, पेट फूलना, मल त्याग के बाद कुछ राहत, कभी पतला मल, कभी सख्त मल, और बाथरूम जाने के बाद भी पेट साफ न होने का अहसास।
ये लक्षण हफ्तों-महीनों तक आते-जाते रहते हैं। रात को सोते हुए दर्द से जागना आमतौर पर IBS का लक्षण नहीं होता।
अगर मल में खून आए, वजन अचानक गिरे, तेज बुखार रहे, उल्टी बार-बार हो, या उम्र पचास के बाद पहली बार ये लक्षण शुरू हों तो यह IBS न मानकर तुरंत डॉक्टर को दिखाएं।
इलाज का सही तरीका
IBS की कोई एक गोली नहीं है जो हमेशा के लिए खत्म कर दे।
इलाज के मुख्यतः तीन हिस्से हैं:-
खाना, दिनचर्या और जरूरत पड़ने पर दवा।
क्या करें अगर आप ऐसे लक्षणों से जूझ रहे हैं:-
तीन-चार हफ्ते तक एक छोटी डायरी रखें।
हर दिन उस डायरी में
1) सुबह, दोपहर, शाम और रात को क्या खाया-पिया
2) कितनी मात्रा में खाया मसलन एक रोटी, आधी कटोरी दाल, एक कप चाय
3)खाने के कितनी देर बाद पेट कैसा रहा
दर्द हुआ या नहीं, गैस हुई या नहीं, पेट फूला या नहीं
4) दस्त हुआ या कब्ज रहा
5) उस दिन नींद कैसी थी और मन तनाव में था या नहीं
तीन-चार हफ्ते बाद इस डायरी को शांत बैठकर देखें और पैटर्न पकड़ने की कोशिश करें ।
ज्यादातर लोगों में कुछ चीज़ें निकल के आती है जैसे की मसालेदार सब्जी के बाद पेट फूलना, दो-तीन रोटी एक साथ खाने के बाद भारीपन, ज्यादा दाल, राजमा, चने के बाद गैस, दूध, मिठाई या लस्सी के बाद दस्त या ऐंठन, तेज चाय-कॉफी या ठंडा ड्रिंक पीने के बाद दर्द, रात को देर से और भारी खाना खाने के बाद सुबह तकलीफ, तनाव वाले दिन पेट ज्यादा बिगड़ना,पीरियड्स के आसपास लक्षण तेज होना।
डायरी देखने के बाद एक-एक करके सिर्फ संदिग्ध चीजें कम करें।
सब कुछ एक साथ मत छोड़ें। दो हफ्ते एक चीज कम करके देखें, पेट शांत हो तो समझ जाइए वही परेशान कर रही थी। फिर दूसरी चीज चेक करें।
मुख्यतः आपको ये पता करना है की आपकी आंतें किस चीज को संभाल नहीं पाती।
तो अंततः ध्यान रखें की IBS कोई संक्रमण, कैंसर या जानलेवा बीमारी नहीं है।
यह एक functional disorder है, जिसमें आंतों की संरचना सामान्य रहती है लेकिन उनका काम प्रभावित हो जाता है।
कल हमारी टीम ने 25 वर्ष के एक युवक की सर्जरी की जो पिछले लगभग 13 वर्षों से अपना मुँह बिलकुल भी नहीं खोल पा रहा था।
इस बीमारी को TMJ Ankylosis कहते हैं ।
यह ऐसी स्थिति है जिसमें जबड़े का जोड़ (jaw joint) खोपड़ी की हड्डी से जुड़कर जाम हो जाता है और मुंह खुलना बहुत कम हो जाता है या बंद हो जाता है।
13 वर्षों से चली आ रही इस समस्या के कारण सर्जरी काफी चुनौतीपूर्ण थी। ऐसे मामलों में जोड़ के आसपास महत्वपूर्ण नसें और खून की धमनियां होती हैं, और ये जगह skull base के काफ़ी नज़दीक रहता है इसलिए ऑपरेशन के दौरान अत्यधिक सावधानी की आवश्यकता होती है।
सफल सर्जरी के बाद मरीज का mouth opening संतोषजनक रूप से बढ़ गया । अब आगे की physiotherapy उसके उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा है, क्योंकि TMJ Ankylosis में ऑपरेशन जितना जरूरी होता है, उतनी ही जरूरी उसके बाद की exercises भी होती हैं।
अब समझतें हैं की TMJ Ankylosis क्यों होता है?
सबसे सामान्य कारण बचपन में ठुड्डी या जबड़े पर लगी चोट है। कई बार चोट मामूली लगती है और मरीज या परिवार उसे भूल भी जाता है, लेकिन धीरे-धीरे jaw joint के अंदर बदलाव शुरू हो जाते हैं और वर्षों बाद मुंह खुलना कम होने लगता है।
इसके अलावा infection और कुछ अन्य बीमारियां भी इसके कारण हो सकती हैं।
पहले forcep delivery के दौरान joint को कई बार चोट पहुँच जाती थी जिससे बच्चे को आगे जाकर ये समस्या हो जाती थी ।
किन लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए?
❌ मुंह का धीरे-धीरे कम खुलना
❌खाना चबाने में परेशानी
❌चेहरे की बढ़त का असामान्य होना
❌ बोलने में परेशानी
मुँह ना खुलने के कई और भी कारण होते हैं इसलिए अगर किसी मरीज को मुँह खोलने में तकलीफ़ है तो जल्द अपने चिकित्सक से मिलना चाहिए ।
एक जरूरी बात
यदि किसी बच्चे को चेहरे या ठुड्डी पर चोट लगी हो और उसके बाद मुंह खुलना धीरे-धीरे कम होने लगे, तो इसे सामान्य बात समझकर नजरअंदाज न करें। समय पर जांच और उपचार से भविष्य में होने वाली गंभीर समस्याओं से बचा जा सकता है।
पहली तस्वीर:-
१) नार्मल जबड़े के जोड़ का फोटो
२) सर्जरी के दौरान की फोटो जहाँ आप देख पाएंगे की कैसे जबड़ा ऊपर की हड्डी से जुड़ गया है
रात के खाने (Dinner) के बाद से जुड़ी 5 उपयोगी स्वास्थ्य बातें:-
1) खाने के तुरंत बाद लेटना नहीं चाहिए।
इससे एसिडिटी, गैस और रिफ्लक्स की समस्या बढ़ सकती है।
कम से कम 2–3 घंटे बाद सोना बेहतर माना जाता है।
2) डिनर के बाद 10–15 मिनट टहलना फायदेमंद है।
हल्की वॉक पाचन में मदद करती है और रक्त शर्करा (ब्लड शुगर) को नियंत्रित रखने में सहायक हो सकती है।
3) खाने के तुरंत बाद बहुत अधिक पानी न पिएँ। सामान्य मात्रा में पानी ठीक है, लेकिन एकदम से बहुत अधिक पानी पीने से कुछ लोगों को पेट में भारीपन महसूस हो सकता है।
4) डिनर दिन का सबसे हल्का भोजन होना चाहिए। देर रात भारी और तैलीय भोजन मोटापा, खराब नींद और पाचन संबंधी समस्याओं का जोखिम बढ़ा सकता है।
5) खाने के बाद मीठा खाने की आदत पर नियंत्रण रखें।नियमित रूप से अधिक मिठाई खाने से कैलोरी और शुगर का सेवन बढ़ जाता है, जिससे वजन और ब्लड शुगर पर असर पड़ सकता है।
एक रोचक तथ्य:
रात में अच्छी नींद लेने वालों में भूख नियंत्रित करने वाले हार्मोन बेहतर काम करते हैं, जिससे अगले दिन अधिक खाने की संभावना कम हो सकती है।
आमतौर पर एक बार गलती से लेने से बड़ा नुकसान नहीं होता, लेकिन रिस्क जीरो नहीं है।
1) एस्पिरिन 150 mg: पेट में जलन या हल्की ब्लीडिंग हो सकती है (अगर अल्सर या ब्लीडिंग की आदत हो)।
2) रोसुवास्टेटिन 20 mg: एक गोली से लगभग कोई नुकसान नहीं।
3) सॉर्बिट्रेट 5 mg: सिरदर्द, चेहरा लाल होना, चक्कर या BP गिरना हो सकता है।
हार्ट अटैक को लेकर बुनियादी जानकारी
प्राथमिक लक्षण है
सीने में दर्द होना।
यह एक pressure, heaviness या tightness जैसे भी महसूस हो सकता है।
यह दर्द पेट के ऊपर की तरफ जाता है कभी बायें हाथ या कंधे की तरफ जाता है कई बार जबड़े में या दांत में भी दर्द हो सकता है।
सांस लेने में तकलीफ और पसीना आना।
कुछ लोगो को गैस होने की फीलिंग आती है।
हार्ट अटैक आने पर क्या करें?
सबसे पहले मदद के लिए एम्बुलेंस को कॉल करें या आपके पास अपना साधन है जिससे आप अस्पताल पहुँच सकते हैं तो उसे तैयार करने को कहें।
नज़दीक में जो भी व्यक्ति या मित्र है उसे भी तुरंत आने को कहें।
जब तक गाड़ी तैयार होगी या एम्बुलेंस आएगा तब तक प्राथमिक तौर पर Aspirin की गोली मरीज़ को दें और चबाने को कहें।
Aspirin रक्त की धमनियों में Clotting को रोकती है।
मरीज़ को तब तक उचित जगह बैठने या लेटने को कहें जहाँ उन्हें आराम हो।
अगर घर में sorbitrate की 5mg की टेबलेट हो तो उसे जीभ के नीचे रखनी है।
अगर मरीज़ होश में नहीं है तो कुछ भी पिलाने की कोशिश ना करें। मरीज़ अगर साँस नहीं ले रहा, पल्स नहीं मिल रहा वैसी परिस्तिथि में तुरंत CPR शुरू करें।
एम्बुलेंस आते ही या गाड़ी तैयार होते ही अस्पताल के लिए निकल जायें।
अगर नज़दीकी अस्पताल का नंबर है तो उन्हें रास्ते से ही सूचित कर दें कि आप ऐसे किसी मरीज़ को ले कर अस्पताल पहुँच रहे हैं ताकि वो भी तैयार रहें।
दो साल पहले कानपुर के LPS Cardiology Hospital के डॉक्टरों ने एक दवाइयों की एक किट रखने की सलाह दी थी जो हार्ट अटैक के मामलों में अस्पताल पहुँचने से पहले मरीज़ को आप घर पर दे सकते।
उन्होंने इस किट को राम किट का नाम दिया है।
इस किट में तीन दवाई है
1) Ecospirin 75 mg के 2 टेबलेट
2) Rosuvastatin 20 mg का 1 टेबलेट
इन दोनों दवाइयों को पानी के साथ खा लेना है।
3) Sorbitrate 5 mg
इस दवाई को जीभ के नीचे रखना है।
ये दवाइयाँ आपके हृदय कि नली में बने खून के थक्के को हटाने में मदद करती है।
लेकिन याद रखें की:
१) ये किट पूरा इलाज नहीं है इसीलिए ये दवाई ले कर घर पर ना रुकें। हार्ट अटैक के लक्षण होने पर अस्पताल जायें।
२) हमेशा बेहतर है की लेने से पहले एक बार अपने फिजिशियन से बात कर लें और उन्हें जानकारी दे दें।
३) ये दवाई तभी दें जब मरीज़ होश में हो। अगर मरीज़ होश में नहीं है तो कभी भी कुछ खिलाने या पिलाने की कोशिश ना करें।
@akash762000 मस्कुलर डिस्ट्रॉफी कई प्रकार की होती है पर दुर्भाग्यवश पूरी तरह ठीक करने वाली दवा अभी नहीं है।
टाइप के हिसाब से स्टेरॉयड, फिजियोथेरेपी, सहायक उपकरण और कुछ नई जीन थेरेपी दवाएं उपलब्ध हैं।
न्यूरोलॉजिस्ट और जेनेटिक काउंसलर से परामर्श लें।
झारखंड सरकार के वरिष्ठ मंत्री श्री सुदिव्य कुमार सोनू जी के असामयिक निधन का समाचार अत्यंत दुःखद एवं स्तब्ध कर देने वाला है।
उन्होंने अपने सार्वजनिक जीवन में जनसेवा, शिक्षा युवा विकास और झारखंड के समग्र उत्थान के लिए उल्लेखनीय योगदान दिया। उनका निधन झारखंड की राजनीति और समाज के लिए एक अपूरणीय क्षति है।
ईश्वर दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें तथा शोक संतप्त परिवार को इस दुःख को सहने की शक्ति प्रदान करें।
भावपूर्ण श्रद्धांजलि एवं विनम्र नमन।
ॐ शांति
🙏🏼🙏🏼🙏🏼
Cancer treatment is evolving and we need to keep pace with the latest developments both in terms of technology and medicines
The recommended treatment should be available for all including the poorest of the poor