बीज मंत्रों की साधना में जप, प्राणायाम और एकाग्रता का संयोजन मन को शांत तथा अनुशासित करने में सहायक हो सकता है। नियमित साधना से व्यक्ति में आत्मविश्वास और सकारात्मकता बढ़ती है।
जैसे ओमकार बीज मंत्र है, ऐसे 21 बीज मंत्र हैं। जैसे थं.. थं.. थं ..थं.. थ���.. स्त्री संबंधी रोग सारे थम जाएंगे। 108 बार जप करे, प्राणायाम करे। मासिक तकलीफ, ये वो, हाई बीपी, लो बीपी ये सब थम जाएगा। ऐसे घुटनों का दर्द है तो बं... बं ...बं ..बं.. बं ..बं ..बं.. सवा लाख बार जप करे, शिवरात्रि की रात को। घुटनों की तकलीफ बं बं हो जाएगी। भाग जाएगी। ऐसे ऐसे बीज मंत्र है कि बाप रे बाप कोई आलसी आदमी है। निद्रा आती है। भजन करते तो आलस होता है। लं.. लं.. लं.. लं.. लं.. लं ..लं.. लं.. लं.. लं ..लं ..लं.. 108 बार जप करे, प्राणायाम करे, फुर्तीला बन जाएगा।
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@Asharamjibapu__ मंत्र-साधना को आध्यात्मिक अभ्यास के रूप में करना उचित है, लेकिन हाई/लो BP, मासिक धर्म संबंधी समस्या या घुटनों के दर्द जैसी स्वास्थ्य समस्याओं के उपचार के लिए केवल मंत्र पर निर्भर न रहें; आवश्यक हो तो चिकित्सकीय सलाह और उपचार भी लेते रहें।#AsharamjiBapu
जैसे ओमकार बीज मंत्र है, ऐसे 21 बीज मंत्र हैं। जैसे थं.. थं.. थं ..थं.. थं.. स्त्री संबंधी रोग सारे थम जाएंगे। 108 बार जप करे, प्राणायाम करे। मासिक तकलीफ, ये वो, हाई बीपी, लो बीपी ये सब थम जाएगा। ऐसे घुटनों का दर��द है तो बं... बं ...बं ..बं.. बं ..बं ..बं.. सवा लाख बार जप करे, शिवरात्रि की रात को। घुटनों की तकलीफ बं बं हो जाएगी। भाग जाएगी। ऐसे ऐसे बीज मंत्र है कि बाप रे बाप कोई आलसी आदमी है। निद्रा आती है। भजन करते तो आलस होता है। लं.. लं.. लं.. लं.. लं.. लं ..लं.. लं.. लं.. लं ..लं ..लं.. 108 बार जप करे, प्राणायाम करे, फुर्तीला बन जाएगा।
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गीता की विशेषता यही है कि उसका संदेश किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं है। अलग-अलग संत परंपराओं के लोगों द्वारा इसकी प्रशंसा यह दर्शाती है कि इसके संदेश में मानव जीवन के लिए व्यापक आध्यात्मिक और नैतिक मार्गदर्शन है।
गीता ��क ऐसा अद्भुत ग्रंथ है कि हिंदू संतों ने, सिक्ख संतों ने, जैन संतों ने तो इसकी भूरीभूरी प्रशंसा की, लेकिन मुसलमान फकीरों ने भी गीता की प्रशंसा की। ख्वाजा दिल मोहम्मद लिखता है कि “उर्फानी ग्रंथ जिसके सात सौ श्लोक रूपी पुष्पों का गुलदस्ता जिसका नाम गीता है, हजारों वर्ष बीते और लाखों करोड़ों लोगों के हृदय में आया यह गुलदस्ता, फिर भी मुरझाया नहीं। इसकी खुशबू नित दिन दुनी रात चौनी, ऐसे ग्रंथ को मैं ���्रणाम करता हूं।”
गीता ये भगवान के श्री मुख से निकला अमृत है ! कुटुंब का बड़ा जब बोलता है तो पूरे कुटुंब की भलाई के लिए बोलता है। ऐसे ही ईश्वर, सृष्टि का स्वामी जब बोलेगा तो सृष्टि के सभी जीवों के भलाई के लिए बोलेगा।
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@Asharamjibapu__ जैसे परिवार का मुखिया पूरे परिवार के हित को ध्यान में रखकर मार्गदर्शन देता है, वैसे ही गीता में भगवान का संदेश मनुष्य को कर्तव्य, आत्मसंयम, समत्व और आत्मज्ञान की ओर ले जाता है। यही कारण है कि समय बदलने पर भी इसका संदेश प्रासंगिक बना हुआ है।
#AsharamjiBapu#BhagavadGita#Gitaज्ञान
सनातन धर्म की सच्चाई देखना चाहो तो कदम कदम पर ऐतिहासिक ढंग से, साधना के ढंग से, वैदिक ढंग से आपको मिल सकती है। किसी पीर ने या किसी साधु ने या पैगंबर ने, अपनी भावना में आए ऐसा कुछ लिखकर धर्म ग्रंथ नहीं बनाया। यह तो सनातन सत्य है। हिंदू धर्म न��� इतनी बड़ी हिम्मत की कि विश्व के और किसी धर्म ने इतना साहस नहीं किया। भगवान को माता के रूप में अगर कोई मानने वाला धर्म है तो वह हिंदू धर्म है। अंबे मात की जय। महाकाली मात की जय। माता में, पिता में, गुरुजनों में, अरे पशु पक्षियों में भी परमेश्वर को देखने की कला अगर विश्व को किसी ने दी तो वो सनातन धर्म ने दी। संपूर्ण वैज्ञानिक कसौटियों से सर्वोपरि अगर कोई धर्म दिखा है तो विज्ञानियों को वैदिक धर्म ��िखा है, हिंदू धर्म दिखा है। स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मो भयावह:! भारतीय संस्कृति का सनातन धर्म राम और कृष्ण के पहले था और श्री रामचंद्र जी धरती पर 12 वक्त आ चुके हैं, उसके पहले सनातन धर्म था। श्री कृष्ण 16 बार आ चुके हैं, उसके पहले सनातन धर्म था। सभी धर्मों का हम सम्मान, इज्जत करते हैं, लेकिन भारतीय संस्कृति सभी का मूल है और ये वैदिक संस्कृति किसी व्यक्ति की बनाई हुई नहीं है। किसी ऋषि मुनि की बनाई हुई नहीं है। यहां तक कि भगवान राम ने भी नहीं बनाई। राम भी वैदिक सं��्कृति की विधि से, यज्ञ से, श्री रामचंद्र जी भी प्रकट हुए। कृष्ण भी वैदिक विधि से पधारे हैं। ये वैदिक विधि परंपरागत सनातन है। तो जो हिंदू धर्म को काटना चाहते हैं, वैदिक विधि को, उनसे हम प्रार्थना करते हैं कि भाई ये मानवता को काटने जैसा है। और उनके प्रति भी हमारी नफरत नहीं है। अगर नफरत होती तो ये ईसाई बच्चा मेरे पास काहे को रहता !
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सनातन परंपरा की विशेषता केवल धार्मिक मान्यता नहीं, बल्��ि वेद, उपनिषद, योग, साधना और प्रकृति के प्रति सम्मान जैसी दीर्घ परंपराओं में दिखाई देती है। माता-पिता, गुरु, जीव-जंतुओं और समस्त सृष्टि में ईश्वरत्व देखने की भावना मानवता और करुणा का संदेश देती है।
सनातन धर्म की सच्चाई देखना चाहो तो कदम कदम पर ऐतिहासिक ढंग से, साधना के ढंग से, वैदिक ढंग से आपको मिल सकती है। किसी पीर ने या किसी साधु ने या पैगंबर ने, अपनी भावना में आए ऐसा कुछ लिखकर धर्म ग्रंथ नहीं बनाया�� यह तो सनातन सत्य है। हिंदू धर्म ने इतनी बड़ी हिम्मत की कि विश्व के और किसी धर्म ने इतना साहस नहीं किया। भगवान को माता के रूप में अगर कोई मानने वाला धर्म है तो वह हिंदू धर्म है। अंबे मात की जय। महाकाली मात की जय। माता में, पिता में, गुरुजनों में, अरे पशु पक्षियों में भी परमेश्वर को देखने की कला अगर विश्व को किसी ने दी तो वो सनातन धर्म ने दी। संपूर्ण वैज्ञानिक कसौटियों से सर्वोपरि अगर कोई धर्म दिख�� है तो विज्ञानियों को वैदिक धर्म दिखा है, हिंदू धर्म दिखा है। स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मो भयावह:! भारतीय संस्कृति का सनातन धर्म राम और कृष्ण के पहले था और श्री रामचंद्र जी धरती पर 12 वक्त आ चुके हैं, उसके पहले सनातन धर्म था। श्री कृष्ण 16 बार आ चुके हैं, उसके पहले सनातन धर्म था। सभी धर्मों का हम सम्मान, इज्जत करते हैं, लेकिन भारतीय संस्कृति सभी का मूल है और ये वैदिक संस्कृति किसी व्यक्ति की बनाई ह���ई नहीं है। किसी ऋषि मुनि की बनाई हुई नहीं है। यहां तक कि भगवान राम ने भी नहीं बनाई। राम भी वैदिक संस्कृति की विधि से, यज्ञ से, श्री रामचंद्र जी भी प्रकट हुए। कृष्ण भी वैदिक विधि से पधारे हैं। ये वैदिक विधि परंपरागत सनातन है। तो जो हिंदू धर्म को काटना चाहते हैं, वैदिक विधि को, उनसे हम प्रार्थना करते हैं कि भाई ये मानवता को काटने जैसा है। और उनके प्रति भी हमारी नफरत नहीं है। अगर नफरत होती तो ये ईसाई बच्चा मेरे पास काहे को रहता !
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@Asharamjibapu__ सभी धर्मों का सम्मान” और अपने धर्म-संस्कृति के प्रति आस्था—दोनों साथ चल सकते हैं। सनातन परंपरा की यही व्यापक दृष्टि संवाद, सह-अस्तित्व और आत्मचिंतन को महत्व देती है; किसी मत के प्रति द्वेष क��� ��जाय अपने मूल्यों को समझना और आचरण में उतारना अधिक सार्थक है। 🙏🚩
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श्राद्ध को केवल एक कर्मकांड न मानकर पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और स्मरण की परंपरा के रूप में देखा जा सकता है। यह परिवार में संस्कार, सेवा और अपने मूल से जुड़े रहने की भावना को मजबूत करता है।
मरने के बाद भी हमारा अस्तित्व रहता है इसलिए श्राद्ध कर्म करने वालो��� को, अपने पूर्वजों का जो श्राद्ध करते हैं, उनके घर में तेजस्वी संतान आती है। धन संपदा और यश बिन बुलाए आते हैं, जिनके यहां श्राद्ध परंपरा नहीं है उनके यहां चिरंजीवी आत्माओं का अवतरण नहीं होता, उनके यहां रुपए पैसे तो आ जाएंगे लेकिन आत्मतृप्ति देने वाला सत्कर्म, शुभकर्म, उत्साह आनंद से नहीं होता है।
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#श्राद्ध_महिमा
@Asharamjibapu__ धन-संपत्ति जीवन की हर खुशी की गारंटी नहीं है। शुभ ���र्म, परिवार के अच्छे संस्कार और पूर्वजों के प्रति सम्मान मन में संतोष और आत्मीयता बढ़ा सकते हैं। इसलिए श्राद्ध परंपरा का उद्देश्य कृतज्ञता और सद्भाव की भावना को आगे बढ़ाना भी है।
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मंत्र केवल श���्दों का उच्चारण नहीं, बल्कि श्रद्धा, एकाग्रता और नियमित साधना का माध्यम है। जब मन बार-बार एक पवित्र नाम या मंत्र पर टिकता है, तो विचारों में स्थिरता और भीतर सकारात्मक भाव विकसित होने लगते हैं।
किसी भी धर्म में, किसी भी मजहब में, पंथ में अथवा साधना में, उपासना में, कोई प्रगति करना चाहता है तो उसे मंत्र रूपी शब्द की आवश्यकता पड़ती है। नाम की बड़ी भारी महिमा है। शब्द की बड़ी भारी महिमा है। शब्द में अनंत अनंत शक्ति है। परब्रह्म की एक शब्द शक्ति है। शब्द शक्ति, शब्द ब्रह्म रूप में उपासना करने का अवसर मिल जाए। शब्द की शक्ति से ही योगी नि:शब्द नारायण तक पहुंच जाते हैं। शब्द को ब्रह्म कहा है - शब्द ब्रह्म । उसकी उपासना सभी धर्मों में, सभी मतों में, सभी मजहबों में, सभी संप्रदायों में, सभी व्यक्तियों के लिए शब्द की उपासना तो है। वे शब्द अगर मंत्र हैं तो उसका प्रभाव इस लोक में जो दृश्यमान चीजें हैं, उससे अलग मंत्र की शक्ति, दृश्य में और सूक्ष्म जगत में भी काम करती है।
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@Asharamjibapu__ शब्द का प्रभाव केवल सुनने तक सीमित नहीं रहता। जैसे प्रेरणादायक शब्द मनोभाव बदल सकते हैं, वैसे ही ��ंत्र-जप साधक के ध्यान और चेतना को एक दिशा देता है। इसी कारण अनेक आध्यात्मिक परंपराओं में नाम-स्मरण और मंत्र-साधना को महत्वपूर्ण माना गया है।
किसी भी धर्म में, किसी भी मजहब में, पंथ में अथवा साधना में, उपासना में, कोई प्रगति करना चाहता है तो उसे मंत्र रूपी शब्द की आवश्यकता पड़ती है। नाम की बड़ी भारी महिमा है। शब्द की बड़ी भारी महिमा है। शब्द में अनंत अनंत शक्ति है। परब्रह्म की एक शब्द शक्ति है। शब्द शक्ति, शब्द ब्रह्म रूप में उपासना करने का अवसर मिल जाए। शब्द की शक्ति से ही योगी नि:शब्द नारायण तक पहुंच जाते हैं। शब्द को ब��रह्म कहा है - शब्द ब्रह्म । उसकी उपासना सभी धर्मों में, सभी मतों में, सभी मजहबों में, सभी संप्रदायों में, सभी व्यक्तियों के लिए शब्द की उपासना तो है। वे शब्द अगर मंत्र हैं तो उसका प्रभाव इस लोक में जो दृश्यमान चीजें हैं, उससे अलग मंत्र की शक्ति, दृश्य में और सूक्ष्म जगत में भी काम करती है।
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