प्रेस की स्वतंत्रता में इतनी भारी गिरावट किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए गंभीर एवं विचारणीय विषय है। भारत के लिए यह और ज़्यादा विचारणीय है क्योंकि इस देश ने प्रेस की स्वतंत्रता के लिए एक लम्बी लड़ाई लड़ी है।
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सरकार को जवाब तो यह देना चाहिए कि यदि सिर्फ़ पंजाब का किसान ही विरोध कर रहा है तो पूरा सरकारी तंत्र, बीजेपी और संघ परिवार का पूरा तंत्र मध्यप्रदेश के किसानों से क्यों संवाद करने में जुटा है?
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“If among the band of robbers, knowledge of robbing is obligatory, is a pious man to accept the obligation? So long as the superstition that men should obey the unjust laws exists, so long the slavery will exist”
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जो बदलाव किए गए हैं, क्या उनसे वह आख़री आदमी अपने जीवन और भाग्य पर क़ाबू कर पाएगा? क्या उस जैसे करोड़ों लोगों को स्वराज्य मिल सकेगा जिनके पेट भूखे हैं और आत्मा अतृप्त है?
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उन्हें यूँ ही एक साथ बाबा और साहब नहीं कहा जाता! वे व्यवस्था/तंत्र के रक्षक रहे। जिन्हें पता भी न हो कि उनके क्या अधिकार हैं, उनके लिए वे ताउम्र समर्पित रहे। किसी भी नज़रिए से देखिए वे कोहिनूर नज़र आएंगे। शर्त यह है कि आपमें जाति का दंभ न हो।
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यहाँ बुनियादी सवाल यह है कि दक्षता और प्रभावी कार्य क्षमता की कमी का भुगतान आम/निर्दोष जनता को करने के लिए क्यों छोड़ दिया जाए? क्या यह राज्य सरकार का दायित्व नहीं है कि अपने पुलिस व्यवस्था को मानवीय मूल्यों और मानवाधिकार के दायरे में रखना सिखाएं?
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इसलिए ऐसा तो नहीं है कि हांगकांग के नागरिक प्रतिकार के पीछे कहीं महात्मा गांधी की प्रेरणा है लेकिन ऐसा भी नहीं है कि वहां महात्मा गांधी की उपस्थिति है ही नहीं। यथासंभव शांतिमय लेकिन व्यापक हर नागरिक प्रतिरोध का चेहरा महात्मा गांधी की तरफ ही होता है।
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उनका यह प्रस्तावना बहुत माननीय है कि जब वे कहते हैं कि शायद आप मुझे हीरा समझे, मगर मैं एक धागा हूँ जो उस हीरा के माला के बीचों से गुज़रने का अवसर मिला, उस हीरा में छेद भी तो मुझसे नहीं बनाया गया है।
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भारतीय राजनीति के इस बाज़ारवाद में एक मनरेगा मज़दूर का विधानसभा चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में आना किसी वर्तमान चमत्कार से कम नहीं है। वो भी उस दौर में जब गिरते राजनीतिक स्तर की वजह से “भले लोग”राजनीति में आने से कतरा रहे हों।
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आखिर बिहार की जनता कबतक असंगठित क्षेत्र को अपनी रोजी-रोटी का सहारा बनाए रखेगी? कबतक महामारी जैसे दौर में पलायन को मजबूर होती रहेगी? कबतक दूसरे राज्यों में रोज़गार के नाम पर भटकती रहेगी? क्या बिहार में औद्योगिक निवेश के अवसर नहीं बनाए जा सकते?
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जंगलराज, पंद्रह बनाम पंद्रह, राम रावण, भारत माता की जय, ज़िंदाबाद ज़िंदाबाद के बीच मुद्दे फिर से दफ़न हो गए हैं। नेताओं ने समीकरण का राजनीतिक असमंजस उछाल दिया है। सवाल किससे पूछा जाए जो पंद्रह साल पहले थे उनसे या जो पंद्रह साल से हैं उनसे?
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Amidst prediction of a hung assembly and a situation of post-poll re-alignment in Bihar Assembly elections 2020, a serious anti-incumbency against the Nitish Kumar-led NDA government is underscored in the state.
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Shattering dreams early in life is difficult to handle. As a society, we hardly care for those who are marked with the stamp of ‘FAILURE’ though at a personal level it worries our families and parents, who are concerned about the well-being of the young...
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Dr. Kalam along with the likes of Gandhiji and Swami Vivekananda embraced the Indian version of secularism i.e. Sarva Dharma Sambhava. He had few possessions including a Veena (occupied by Goddess Saraswati).
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Have you ever watched a video or movie because YouTube or Netflix recommended it to you? Or added a friend on Facebook from the list of “people you may know”?
And how does Twitter decide which tweets to show you at the top of your feed?
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आजकल डीजे के बीट पर बेमतलब सर धुनने वाली दुनिया संगीत की रुहानियत पहचानना भूल गयी है। हम सबकी ज़िंदगी के बैक्ड्राप में कोई धुन बज रहा है, कोई तो है जो गाए जा रहा है, उनका होना या ना होना मायने नहीं रखता, मायने ये रखता है की हम सुन पा भी रहे हैं या नहीं। https://t.co/E1v6k8Rrqm