दलित छात्रा की हत्या के विरोध में हो रहे प्रोटेस्ट में पहले से हिरासत में लिये ग���े प्रदर्शनकारी को मेरठ SSP द्वारा इस तरह खीझकर मारपीट करना पूरी तरह संविधान विरुद्ध है।
इसकी जितनी निंदा की जाये कम है।
एक IPS अधिकारी का इस तरह से आपा खो देना ये दर्शाता है कि इन दिनों लोकतांत्रिक तरीके से धरना प्रदर्शन कर रहे लोगों को पुलिस प्रशासन दुश्मन समझता है।
@Uppolice @meerutpolice
The Central Government’s unilateral and coercive decision to make “Vande Mataram” the national song and to mandate all its stanzas in all government programmes, schools, colleges, and functions is not only a blatant attack on the freedom of religion guaranteed by the Constitution of India but also a systematic attempt to curtail the constitutional rights of minorities.
Muslims do not prevent anyone from singing or playing “Vande Mataram”; however, some verses of the song are based on beliefs that portray the homeland as a deity, which contradict the fundamental belief of monotheistic religions. Since a Muslim worships only one Allah, forcing him to sing this song is a clear violation of Article 25 of the Constitution and several judgments of the Supreme Court.
Making this song mandatory and attempting to impose it on citizens is not an expression of patriotism; rather, it reflects electoral politics, a sectarian agenda, and a deliberate effort to divert public attention from fundamental issues. The true measure of love for one’s country lies not in slogans but in character and sacrifice. The shining examples of which can be seen prominently in the historic struggle of Muslims and the Jamiat Ulama-i-Hind. Such decisions weaken the country’s peace, unity, and democratic values and undermine the spirit of the Constitution.
It must be remembered that Muslims worship only one God; they may endure everything, but they cannot accept associating partners with Him. Therefore, making “Vande Mataram” compulsory is a clear assault on the Constitution, religious freedom, and democratic principles.
#ArshadMadani
#vandematram
जमीयत उलमा-ए-हिंद वक़्फ़ कानून की तीन अहम विवादित धाराओं पर मिली अंतरिम राहत के फैसले का स्वागत करती है। । जमीयत उलमा-ए-हिंद इस काले कानून ���े ख़त्म होने तक अपनी क़ानूनी और लोकतांत्रिक जद्दोजहद जारी रखेगी।
यह नया वक़्फ़ कानून ��ेश के उस संविधान पर सीधा हमला है जो नागरिकों और अल्पसंख्यकों को न केवल समान अधिकार देता है बल्कि उन्हें पूर्ण धार्मिक आज़ादी भी प्रदान करता है। यह क़ानून मुसलमानों की धार्मिक आज़ादी छीन लेने की संविधान-विरोधी एक ख़तरनाक साज़िश है।
इसलिए जमीयत उलमा-ए-हिंद ने वक़्फ़ कानून 2025 को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। हमें यक़ीन है कि सुप्रीम कोर्ट इस काले कानून को समाप्त करके हमें पूर्ण संवैधानिक ��्याय देगा, इंशा अल्लाह।
#waqfamendmentact
#ArshadMadani
मुसलमानों के सामने एक-दो नहीं, बल्कि कई मसले हैं।
आज़ादी के बाद सांप्रदायिक सोच को मौका मिला और मुसलमानों के खिलाफ माहौल बनाया गया।
जमीयत उलेमा-ए-हिंद सबसे पहले इन ताक़तों के ख़िलाफ़ सामने आई थी।
हम सड़कों पर लड़ाई नहीं करेंगे, क्योंकि ये देश के लिए नुकसानदायक है।
हमारी लड़ाई उन लोगों से है जो सत्ता में रहकर इन सांप्रदायिक ताक़तों को खुला छोड़ रहे हैं।
"भारत में मुसलमान हज़ार साल से ज़्यादा वक़्त से रह रहे हैं।
केरल से कश्मीर तक, हर बिरादरी में हिंदू भी हैं और मुसलमान भी।
हमारा इतिहास किसी से कम नहीं है।"
इस देश की तरक़्क़ी तभी मुमकिन है जब आपसी भाईचारा और मेल-जोल बना रहे।
#ArshadMadani
सरकारी स्कूलों में गीता के श्लोक अनिवार्य करना संविधान के धर्मनिरपेक्ष ढ��ंचे पर हमला है।
उत्तराखंड की भाजपा सरकार क्या अब सरकारी स्कूलों को भी ‘धर्मशाला’ बनाना चाहती है?
क्या अब स्कूलों में बाइबल, कुरान और गुरु ग्रंथ साहिब भी पढ़ाए जाएंगे? या यह सिर्फ एक धर्म थोपकर अपना एजेंडा चलाने की साज़िश है?
हम संविधान के साथ हैं, न कि किसी धर्म विशेष की राजनीति के साथ।
भारत का संविधान एक धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना करता है, ��हां:
अनुच्छेद 28(1) कहता है:
> “राज्य की निधि से चलने वाले किसी भी शैक्षणिक संस्थान में धार्मिक शिक्षा या उपदेश नहीं दिया जा सकता।”
सरकारी स्कूलों में धार्मिक गतिविधियों को थोपा नहीं जा सकता, चाहे वह किसी भी धर्म की हों।
#ConstitutionFirst
#शिक्षा_पर_धर्म_नहीं
वक्फ संशोधन कानून के खिलाफ दायर याचिका पर 16 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होगी। जमीयत उलमा-ए-हिंद की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने इस मामले की शीघ्र सुनवाई की अपील की थी۔ वक्फ कानून संविधान, धर्मनिरपेक्षता और देश की एकता व शांति के लिए बड़ा खतरा है. हमें पूरा विश्वास है कि इस मामले में अदालत से हमें न्याय मिलेगा, क्योंकि इस कानून की कई धाराएं न केवल देश के ���ंविधान के खिलाफ हैं, बल्कि इससे नागरिकों के मौलिक और धार्मिक अधिकारों का उल्लंघन भी होता है। यह कानून ऐसे समय में लाया गया है जब पूरे देश में मुसलमानों के खिलाफ नफ़रत की आंधी चल रही है। हमारी कई मस्जिदें और दरगाहें पहले ही निशाना बनाई जा चुकी हैं, और वहां मंदिर होने के दावे किए जा रहे हैं। ऐसे में अगर यह असंवैधानिक कानून भी लागू हो गया तो इन बेलगाम सांप्रदायिक ताक़तों को हमारी मस्जिदों, खानकाहों, कब्रिस्तानों और इमामबाड़ों को निशाना बनाने का आधार भी मिल जाएगा।
#WaqfAmendmentBill2025
जमीयत उलमा-ए-हिंद ने वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 की संवैधानिक ���ैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, क्योंकि यह कानून देश के संविधान पर सीधा हमला है, जो न केवल अपने नागरिकों को समान अधिकार प्रदान करता है बल्कि उन्हें पूर्ण धार्मिक स्वतंत्रता भी प्रदान करता है। यह विधेयक मुसलमानों की धार्मिक स्वतंत्रता को छीनने की एक खतरनाक साजिश है। इसलिए ��मने वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है और जमीयत उलमा-ए-हिंद की राज्य इकाइयां भी अपने-अपने राज्यों के उच्च न्यायालयों में इस कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देंगी। हमें पूरा विश्वास है कि जिस तरह से अदालत ने कई मामलों में न्याय दिया है, उसी तरह हमें भी इस महत्वपूर्ण और असंवैधानिक कानून में न्याय मिलेगा।
#WaqfAmendmentBill2025
उत्तर प्रदेश सरकार का बुलडोज़र चल रहा है और एक बिटिया अपनी झोपड़ी से किताबें बचाकर निकाल रही है ताकि सत्ता का अहंकारी बुलडोज़र उसकी किताबों को मिट्टी में ना मिला दे।
ये विज़ुअल देश के हर व्यक्ति को देखना चाहिये कि धन्नासेठों के सामने नतमस्तक ये सरकारें किस तरह आम जनता की झोपड़ियॉं उजाड़ रहे हैं।
इन तरह के दृश्य देखने के बाद हुक्मरानों को नींद कैसे आती है ?
वक्फ संपत्तियों की सुरक्षा हमारा धार्मिक कर्तव्य है और जंतर मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शन के माध्यम से मुसलमानों ने सरकार को यह संदेश दे दिया है कि वक्फ संशोधन बिल मुसलमानों को स्वीकार नहीं है. साथ ही अगर बिल वापस नहीं लिया गया तो इसके खिलाफ पूरे देश में लोकतांत्रिक और संगठित आंदोलन चलाया जाएगा.
17 मार्�� को जंतर-मंतर पर वक्फ संशोधन बिल को लेकर तमाम मुस्लिम संगठनों ने सरकार को अपने रुख और देश के करोड़ों मुसलमानों की भावनाओं से अवगत कराने का प्रयास किया लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार मुस्लिम समुदाय की भावनाओं को नजरअंदाज कर अपनी मर्जी थोपना चाहती है, उसे मुसलमानों की भावनाओं की कोई परवाह नहीं है.
#RejectWAQFBill
#WaqfAct
सांकेतिक विरोध के रूप में, खुद को सेक्युलर कहने वाले नीतीश कुमार, नायडू और चिराग पासवान जैसे नेताओं की इफ्तार, ईद मिलन और अन्य आयोजनों में शामिल नहीं होगी जमीयत उलमा-ए-हिंद। ये लोग सत्ता के लिए मुसलमानों पर हो रहे अन्याय और अत्याचार पर चुप्पी साधे हुए हैं और देश के संविधान के खिलाफ सरकार का समर्थन कर रहे हैं. वक्फ संशोधन बिल पर इन नेताओं का रवैया इनके दोहरे चरित्र को उजागर करता है। उन्हें देश के संविधान और धर्मनिरपेक्ष��ा की कोई परवाह नहीं है; वे केवल अपने राजनीतिक हितों में रुचि रखते हैं।
#WaqfBoardAmendmentBill
शैक्षणिक वर्ष 2024-2025 के लिए जमीअत उलमा-ए-हिंद और एम.एच.ए. मदनी चैरिटेबल ट्रस्ट देवबंद ने एक कड़ोर साठ लाख रुपये छात्रवृत्ति वितरित की मैरिट के आधार पर 915 छात्र चुने गए, इस बार भी 46 ग़ैर-मुस्लिम छात्र शामिल हैं...
दुनिया में वही क़ौम विकास करती है जिसकी युवा पीढ़ी प्रशिक्षित एवं शिक्षित हो.
धार्मिक नफ़रत और सांप्रदायिक आधार पर लोगों को विभाजित करने का यह खेल देश को तबाह कर देगा, धर्म का नशा पिलाकर बहुत दिनों तक मूल समस्याओं को छिपाया नहीं जा सकता, रोटी, कपड़ा और मकान मानव की मूल आवश्यकताएं हैं इसलिए नफ़रत की राजनीति को बढ़ावा देने की जगह अगर रोज़गार के संसाधन नहीं पैदा किए गए और पढ़े-लिखे युवाओं को नौकरियां नहीं दी गईं तो वो दिन दूर नहीं कि जब देश की युवा पीढ़ी विरोध में सड़कों पर नज़र आएगी।
#ArshadMadani
तुझ को कितनों का लहू चाहिए ऐ अर्ज़-ए-वतन?
जो तिरे आरिज़-ए-बे-रंग को गुलनार करें
कितनी आहों से कलेजा तिरा ठंडा होगा
कितने आँसू तिरे सहराओं को गुलज़ार करें
#संभल में पुर-अमन एहतिजाज करने वालों पर उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा फायरिंग करने कि हम कड़ी निंदा करते हैं, पुलिस की फायरिंग में तीन नौजवान���ं की मौत हुई है।अल्लाह से दुआ है के अल्लाह मरहूमीन को मग़फ़िरत अदा कर��� और उनके घर वालों को सब्र ए जमील अदा करे। इस हादसे की निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए। जो अफ़सर ज़िम्मेदार हैं, उनके ख़िलाफ़ कार्यवाही होनी चाहिए।
बहराइच में हिंसा के बाद मुसलमानों पर एकतरफा कार्रवाई।
लेकिन प्रशासन हिंसक घटनाओं को रोकने में विफल हो रहा है, जिन अधिकारियों ने अपनी जिम्मेदारी निभाने में लापरवाही बरती है, उनके खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए.
रियासती जमीयत उलमा के सेवाकर पीड़ितों की मदद के लिए सक्रिय हैं।
गांव में मुस्लिम युवकों की एकतरफा गिरफ्तारियां शुरू हो गई हैं, जबकि एक मुस्लिम के घर में घुसकर उसकी पिटाई करने और घर की छत पर भगवा झंडा फहराने वाले असली अपराधी अभी भी दंगाइयों के मामले सामने आने के बावजूद उत्पात में लगे हुए हैं पुलिस प्रशासन उनके खिलाफ ���ोई कार्रवाई नहीं कर रहा है, सिर्फ मुसलमानों को निशाना बनाया जा रहा है. धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए और निर्दोष रूप से गिरफ्तार किए गए लोगों को तुरंत रिहा किया जाना चाहिए।