जब सर्वाइवल की बात आती है तो एक कमजोर से कमजोर जीव भी अपने और अपने परिवार की सुरक्षा के लिए लड़ता है और शायद क�� बार उस लड़ाई में जीत भी जाता है लेकिन हिंदू उस कमजोर जीव से भी कमजोर है, आपको बुरा लग सकता है लेकिन कहा जाता है की हिंदू खतरे में है कहा है हिंदू खतरे में और खतरे में है तो किसी मजहब की वजह से नहीं है हिंदुओं की ख़ुद की वजह से खतरे में है क्योकि हिंदू एक स्वार्थी क़ौम है उसे ना अपने मंदिरों की परवाह है और ही गुरुकुलों की परचाह है उन्होंने अपनी सुरक्षा की ठेकेदारी एक पार्टी और एक संगठन (RSS) को दे के र��ी है।
हिंदू अपने घर में अपने परिवार के साथ बैठ के समाज के सामने खड़ी चुनौतियों (लव जिहाद, लैड जिहाद, थूक जिहाद, कॉर्पोरेट जिहाद, धर्मांतरण वगेरह) पे कभी बात ही नहीं की, यदि आप नहीं करोगे तो आपकी नस्ले इन चुनौतियों के लिए कभी तैयार नहीं रहेगी।
शब बखैर। 🤲
अंबेडकर और हिंदू !!!!!!
आज आजादी के 79 सालों बाद जब दलित समाज ने अंबेडकर के कद और उनके महत्व को समझना शुरू किया है तो यहां के लोग परंपरा के मुताबिक वह अंबेडकर के देवीकरण का प्रयास कर रहे हैं इसमें किसी को क्यों समस्या होनी चाहिए समय के साथ वो उन्हें पढ़ना और समझना भी शुरू करेंगे इसमें वक्त लगेगा लेकिन ऐसा होगा आज हिंदुत्व की विचारधारा के पास दो रास्ते हैं पहले की अंबेडकर और हिंदुत्व को एक दूसरे के विपरीत खड़ा कर दिया जाए और दूसरा की अ��बेडकर को हिंदुत्व में समेट लिया जाए जहां कुछ विरोधाभास के साथ दोनों एक साथ चले जैसा कि वर्तमान में दलित समाज का एक बड़ा हिस्सा कर रहा है वो अपने मंदिरों के एक कोने में ��ंबेडकर की छोटी सी तस्वीर रखता है यह आपको रेलिया में नहीं दिखेंगे इन्हें देखना हो तो सामान्य दिनों में इस समाज को करीब से जाकर देखना होगा तो ऐसे में संघ और भाजपा ने इस दूसरे रास्ते को चुना क्योंकि अंबेडकर को दलितों से और दलितों को हिंदुत्व से छांट देना प्रैक्टिकल अप्रोच नहीं सबको हिंदुत्व में ही समेटना है जहां सब की जगह एक समान होगी गिनी चुने तबके का वर्चस्व नहीं चलेगा लेकिन इस बात से भाजपा क��� कुछ पुराने लोगों को तकलीफ ���ो रही है वह चाहते हैं कि भाजपा हिंदुत्व के नारे के साथ ब्राह्मण बनिया वर्चस्व वाली पार्टी बनी रहे जहां इनका स्थान सिंहासन पर हो जब भाजपा अंबेडकर के सामने अपना शीश झुकाती है अंबेडकर धाम विकसित करती है तो उनके सीने पर सांप लौटे हैं इन्हें वह वर्चस्व फिसलता हुआ जान पड़ता है कभी बीजेपी पर हिंदुत्व के रास्ते से भटकने का आरोप लगाते हैं या अंबेडकर और दलितों का मजाक उड���ाते हैं और जब इन��ें से कोई उपाय काम नहीं करता तब खुद भाजपा छोड़ने की धमकी देते हैं उनके अनुसार भगवान परशुराम और चाणक्य के सम्मान में कार्यक्रम आयोजित होना ब्राह्मणवाद नहीं है महाराणा प्रताप और पृथ्वीराज चौहान को सम्मान देना क्षत्रियवाद नहीं है लेकिन अंबेडकर पर माला चढ़ाने से हिंदुत्व खतरे में आ जाता है और भाजपा अंबेडकरवादी हो जाती है उनके अनुसार राम मंदिर बनवाने मात्र से भाजपा हिंदुत्ववादी पार्टी नहीं बनती लेकिन अंबेडकर की मूर्ति पर माला चढ़ाने से अंबेडकरवादी पार्टी हो जाती है यह अतीत में अटके हुए लोग इन्हें समझना होगा कि यह समय के साथ होने वाला बदलाव है जिन्हें अस्वीकार्य होगा वह समय के साथ अप्रासंगिक हो जाएंगे
कांग्रेस सांसद और प्रसिद्ध वकील कपिल सिब्बल अदालत में एक तारीख पर जा कर बहस करने के लिए मरी हालत में भी लग��ग 35-40 लाख रुपए फीस लेते है, तो वहीं अभिष��क मनु सिंघवी एक दिन की पैरवी करने के लिए अंदाजन 30-35 लाख रुपए चार्ज करते हैं। जबकि कार्पोरेट केस हो तो इनकी फीस करोड़ों में पहुँच जाती है। वहीं वकील सलमान खुर्शीद, सिद्धार्थ लूथरा, सिद्धार्थ दवे और गौतम खजांची प्रत्येक 10-10 लाख रुपए से ज़्यादा हर सुनवाई के फीस आमतौर पर चार्ज करते हैं।
यह सभी वकील दिल्ली के हिन्दू विरोधी दंगों और देशद्रोह के आरोपित उमर खालिद, शरजील इमाम, गुलफिशा फातिमा, शिफा उर ���हमान, मीरान हैदर, शादाब अहमद, मोहम्मद सलीम खान के लिए सुप्रीम कोर्ट में पैरवी कर रहे हैं।
आप उमर खालिद को जानते हैं? वही जे एन यू के छात्र नेता, "भारत तेरे टुकडे होगें, इंशाअल्लाह..." गैग के सदस्य, जो अपने आप को एक वामपंथी मानते है लेकिन जुमा की नमाज जरूर पढते हैं। ये सा��ब पिछले पाँच साल से जेल में बंद हैं और इस बा�� फिर उनकी जमानत सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी है। यहाँ तक कि सबूतों को मद्देनज़र रखते हुए अगले एक साल तक जमानत अर्जी लगाने पर भी रोक लगा दी है।
आप सोच रहे होंगे, मैं ऊपर इन वकीलों की सिलसिलेवार फेहरिस्त क्यों गिना रहा हूँ? आप को बता दूँ कि ये सभी वकील मिलकर उमर खालिद का केस लड रहे हैं। उमर खालिद दिल्ली दंगों का साजिशकर्ता, देश विरोधी नारों, देशद्रोह क�� मामले में जेल में बंद है।
जानकारी के लिए ब��ा दूँ कि 38 साल के उमर खालिद का जन्म दिल्ली में हुआ है और इनके अब्बू महाराष्ट्र और अम्मी उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखती हैं। उमर खालिद साधारण मध्यम वर्गीय परिवार से आते हैं। जवाहर लाल युनिवर्सिटी में वजीफा/ स्कॉलरशिप लेकर पी एच डी कर रहे थे!
एक ऐसा विद्यार्थी जो साधारण मध्यम वर्गीय परिवार से आता है और वजीफे पर अपनी पढाई करता है। वह कांग्रेस नेता कप���ल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी ��ैसे महंगे और रसूखदार वकीलों की फीस कहाँ और कैसे देता है? ऐसे ही एक दूसरे देशद्रोह मामले में नेहा सिंह राठौर जिन्होंने दावा किया था कि तबले वाले को देने के भी पैसे नहीं बचे हैं उनके भी सुप्रीम कोर्ट में वकील यही कपिल सिब्बल ही हैं।
मैं तो सोच रहा हूँ कि सुप्रीम कोर्ट पर इन सब वकीलों के एक साथ उपस्थित होने पर मोटा-मोटी लगभग एक करोड़ से ज़्यादा का खर्च आता होगा।
और मेरा सर यह सोच कर चकरा रहा है कि हर तारीख पर यह एक करोड रूपए का इंतजाम कौन और कहाँ से करता होगा? कौन से वह लोग हैं जो इन कांग्रेसी नेताओं पर देशद्रोहीयों को बचाने के लिए करोड़ों खर्च कर रहे हैं?
क्या भारतीय मध्यम वर्ग इतना सक्षम है कि वह महँगे और रसूखदार वकीलों की फीस के तौर पर एक करोड़ रूपए अदा कर सकता है?
अगर नही कर सकता है तो फिर इनकी फीस कौन अदा कर रहा है? यह अलग जाँच का विषय है और इसकी भी जाँच होनी चाहिए कि देशद्रोहियो को आख��र इतने महंगे वकील रखकर बचा कौन रहा है? वह कौन सी देशी-विद��शी या इस्लामिक ताकतें हैं?
चलिए ��ह भी मान लें कि ये सारे वकील मुफ्त में अपनी सेवा दे रहे हैं तो वे उमर खालिद ��र शर्जिल इमाम पर इतनी मेहरबानी आखिर क्यों कर रहे हैं?
वैसे आप की जानकारी में इजाफा कर दूँ कि महिला वकीलों को जज बनाने की ट्रेनिंग देने वाले अभिषेक मनु सिंघवी नें अपने साले से हर तारीख पर हाजिर रहने के लिए 10 लाख रुपए बतौर फीस ली थी और वकील सिद्धार्थ लूथरा हर तारीख पर हाजिर रहने के अपने चचेरे भाई से तीन लाख रुपए लेते थे।
चलते-चलते आप को बताता चलू कि उमर खालिद के पिता जी का नाम सैयद कासिम रसूल इल��यास है। सैयद कासिम कभी सिमी के सक्रिय सदस्य थे,
कुछ लोग तो कानाफूसी करते हैं कि सैयद कासिम सिमी के छुपे हुए संस्थापक थे? आप अगर सिमी के बारे में नही जानते तो बता दूँ कि सिमी एक भारतीय इस्लामिक छात्र संगठन था! जिसे भारत सरकार द्वारा आतंकवादी गतिविधियों और देश की सुरक्षा के लिए खतरा मानते हुए बैन कर दिया गया है।
दो दशक पहले तक भारत में कहीं भी बम विस्फोट होते थे, आतंकवादी घटनाएँ होती थीं या धार��मिक-मजहबी दंगे होते थे तो उसमे बाक़ायदा ठोस सबूत के साथ सिमी का हाथ पाया जाता था।
��जे बुजुर्ग कहते थे कि किसी की शख्सियत जाननी पहचाननी हो तो उसकी परवरिश और खानदान देखना चाहिए। उमर खालिद की पहचान और परवरिश खुद ही उसकी शख्सियत की चुगली कर देती है कि चिकन नेक को काटकर भारत के एक हिस्से को अलग करने की साजिश में शामिल और शर्जिल इमाम के साथ दिल्ली दंगों का मास्टरमाइंड जिसे वामपंथी छात्र नेता बताने पर तुलें है�� वह कितना संगीन ख़्वाब पाले हुए था। और आज इसी की जमानत के लिए कांग्रेस नेताओं की पूरी फ़ौज उतरी हुई है। #UmarKhalid
@peldijiye हमारा विरोध “आंबेडकरवाद” से होना चाहिए “अंबेडकर” से नहीं।
अंबेडकर ने स्वयं कहा था मुझे हिंदू विचारधारा से नफ़रत नहीं उसमे फैली कुरीतियों से नफ़रत है।
और हिंदू विचारधारा ने रिफार्म लाए है।