बहुत हुआ, चलो युवा,
हाथ से हाथ जोड़ के,
अन्याय का घड़ा फोड़ के।
युवा ख्वाब ये जल जाएंगे,
सिंहासन तब हिल जाएंगे,
छात्रों की गूंज, ये है छात्रों की गूंज।
शिक्षा Revolution की ओर देश के सभी छात्रों और युवाओं का उत्साह और जोश बढ़ाने के लिए #ChhatronKiGoonj Anthem.
बदलाव अब दूर नहीं।
भाजपा ने देश का स्वर्ण-मान बेच दिया है।
अब देश की जनता को समझ में आया कि भाजपा सरकार सोना खरीदने से मना क्यों कर रही थी क्योंकि अगर सोना जनता के पास चला जाता तो ये बेचते कैसे।
5 ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी के जुमले की सुनहरी परत अब उतर गयी है। भाजपा के दावों का Golden Curtain बेपर्दा हो गया है। जनता इस समाचार के बाद डरकर बैंक जाकर अपने लॉकर खोलकर देख रही है कि सब सही-सलामत है भी कि नहीं?
जनता को समझ में आ गया है कि भाजपाई भ्रष्टाचार ने देश की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह खोखला कर दिया है और विदेशी सत्ताओं के आगे भाजपा और उनके भ्रमणशील संगी-साथी अब साष्टांग नतमस्तक क्यों हैं।
‘काला चश्मा’ लगाकर आनेवाले
अपने सच्चे मुक़दमे हटवानेवाले
झूठे-फ़र्ज़ी मुक़दमे लगवानेवाले
घमंड में रावण तक को हरानेवाले
नमस्ते का भी संबंध न निभानेवाले
बुलडोज़र से घर-दुकां ढहानेवाले
बिजली-पानी के लिए सतानेवाले
पत्रकार पर अपशब्द बरसानेवाले
‘हाता नहीं भाता’ नीति चलानेवाले
वनस्पति-खोज में विदेश जानेवाले
अपना झूठा महाप्रचार करवानेवाले
अधिवक्ताओं पे लाठी चलवानेवाले
मणिकर्णिका का घाट तुड़वानेवाले
सत्ता सजातीय पे कृपा बरसानेवाले
सांप्रदायिकता का विष फैलानेवाले
‘पीडीए’ पर घोर जुल्म करवानेवाले
आरक्षण पे अपनी कैंची चलानेवाले
शिक्षकों से भूसे का दान जुटानेवाले
झूठे आश्वासन पे शासन चलानेवाले
सबकी माँगों पर केवल टरकानेवाले
आशा-आंगनबाड़ी को भटकानेवाले
शिक्षामित्रों का मानदेय घटवानेवाले
संतो तक पर झूठे आरोप लगानेवाले
फ़र्ज़ी एनकाउंटर का राज चलानेवाले
अब हैं जानेवाले लौटकर न आनेवाले!
आर्काइव | गांधी के हत्यारे को संघ कभी अपना मानने का साहस नहीं जुटा पाया. 2 फरवरी 1948 को ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ ने लिखा, “राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संघचालक ने बंबई से एक वक्तव्य में कहा, महात्मा गाँधी के कथित हत्यारे का राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से कभी कोई संबंध नहीं था.” दो दिन बाद, संघ को प्रतिबंधित संगठन घोषित कर दिया गया.
गोडसे से सारे सबंधों को सिरे से नकारने के बाद अब संघ ने नई लाइन पकड़ ली. 1949 के पूरे साल, जब गोडसे और अन्य आरोपियों का मामला अदालत में लड़ा जा रहा था, संघ के ऊपर से पाबंदी हटाने को लेकर गोलवलकर नेटवर्किंग करते फिर रहे थे. संघ द्वारा यह दलील दी जाने लगी कि गोडसे असल में, 1930 की शुरुआत में संघ से जुड़ा जरूर था, लेकिन गांधी की हत्या से बहुत पहले ही उसने संघ से अपने संबंध तब खत्म कर लिए थे, जब वह हिन्दू महासभा में शामिल हुआ. उसी साल जुलाई के महीने में, संघ से प्रतिबंध हटा लिया गया. अब उसे संघ के पूर्व सदस्य के रूप में संबोधित किया जाने लगा. इस बात को लेकर भी संघ, कईयों को आश्वस्त करने में सफल रहा कि दोनों संगठनों के बीच किसी किस्म का तादात्मय नहीं है.
गोडसे पर किए अपने शोध के दौरान मैंने ऐसे कई ऐतिहासिक दस्तावेजों की छानबीन की, जिनसे इस बात की पुष्टि होती है कि उसने संघ की सदस्यता कभी भी नहीं छोड़ी थी. इस दस्तावेज के पृष्ठ 18 और 19 में उसने अपने 1940 के दशक का विवरण दिया है. उसने लिखा, “मैंने फिर से हिंदू महासभा का काम करना शुरू कर दिया और साथ ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में भी अपनी सक्रियता जारी रखी.”
11 मई 1940 का राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का एक दस्तावेज, किसी “एनवी टेलर” का जिक्र करता है, जिसकी बैठक पूना के एक संघ संयोजक के साथ हुई थी. रिकॉर्डों में यह साफ दर्ज है कि संघ के कई सदस्यों के पास संघ और महासभा की दोहरी सदस्यता थी और कि दोनों संगठन नजदीकी रूप से एक-दूसरे के साथ सहयोग किया करते थे.
नवंबर 1948 के गोडसे के इस बयान कि उसने संघ छोड़ दिया था पर विश्वास न करने के कई कारण हैं. वकील के सिखाए-पढ़ाए जाने के बाद अब तक गोडसे, हत्या की सारी जिम्मेवारी अपने सर लेने के लिए तैयार हो चुका था. उसकी कोशिश थी कि हत्या में, यथासंभव कम लोगों का नाम सामने आए. अपने जिस 150 पैराग्राफ वाले बयान को अदालत के सामने रखने में उसे पांच घंटे लगे, उसे उसने पूरी तरह से खुुद तैयार नहीं किया था. हिंदू महासभा के साथ मिलकर बचाव पक्ष के वकीलों के गुट में से एक, पीएल नामदार नामक वकील ने इस तथ्य का उजागर किया. “नाथूराम मामले में मुख्यतः बंबई के बैरिस्टर-ऐट-लॉ जमनादास मेहता ने उसका हलफनामा तैयार किया था,” इनामदार ने लिखा. मेहता असल में विनायक दामोदर सावरकर के पुराने साथियों में से एक थे; और उस समय के हिंदुत्व संगठनों के प्रमुख मार्गदर्शक भी थे.
गोपाल समेत गोडसे के परिवार ने भी कभी यह नहीं कहा कि उसने संघ का साथ छोड़ दिया था. फ़्रंटलाइन पत्रिका को 1994 में दिए गए अपने साक्षात्कार में गोपाल ने कहा, “अदालत में दिए अपने बयान में उसने कहा था कि उसने संघ छोड़ दिया था. उसने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि गांधी की हत्या के बाद गोलवलकर और संघ भारी मुसीबत में आ गए थे. लेकिन उसने हकीकत में कभी संघ नहीं छोड़ा था. हम सभी भाई संघ के साथ जुड़े हुए थे. नाथूराम, दत्तात्रेय, मैं और गोविंद. आप कह सकते हैं कि हम घर से ज्यादा, संघ में पल कर बढ़े हुए थे. यह हमारे लिए एक परिवार की तरह था.”
पूरा लेख पढ़ें: https://t.co/cojvrSHSOF
#Godse #Gandhi #RSS100Years
आज NEET पेपर लीक से आहत होकर आत्महत्या करने वाले होनहार छात्र प्रदीप मेघवाल के परिवार से मिला।
उनका दर्द शब्दों में नहीं समा सकता। एक माँ-बाप ने अपना बेटा खोया है और उनका कोई कसूर नहीं था।
देश के लाखों बच्चे पढ़ाई, प्रतियोगिता और भविष्य के दबाव में जी रहे हैं। और जब पेपर लीक होता है, तो सिर्फ़ एक परीक्षा नहीं टूटती - एक बच्चे का सपना, और एक पूरा परिवार टूट जाता है।
प्रदीप की मौत आत्महत्या नहीं - एक टूटी हुई, भ्रष्ट व्यवस्था की देन है।
जिन्होंने परीक्षा प्रणाली को माफ़ियाओं के हवाले कर दिया, और आज भी अपनी कुर्सी से चिपके हैं - मोदी-प्रधान की जोड़ी इस परिवार के सामने जवाबदेह है।
मैं पिछले 2 दिन से अपने गांव एटा उत्तर प्रदेश के sarnau में आया हूं लेकिन देख रहा हूँ कि मेरा SIM card जो @JioCare है जिसमें नेटवर्क problem इतना आ रहा है कि इन्टरनेट स्पीड to लगता है 2g की है और @JioCare ने नाम कर रखा है 5g का| सबसे बेकार घटिया service है jio की
असली शस्त्र के तो लाइसेंस बनते हैं लेकिन कुछ अदृश्य शस्त्र भी हैं, जो गुप्त रूप से देश, समाज और आपसी प्रेम पर अंदर से बेहद घातक हमला कर रहे हैं।
वकील कह रहे हैं कि लगे हाथों :
- भाजपाइयों के घर, दुकान, कार्यालय, प्रतिष्ठान के काग़ज़-नक्शे मँगाकर उनकी वैधता भी जाँच ली जाए।
- साथ ही भाजपा और उनके संगी-साथियों द्वारा निर्माणों, आयोजनों व आपदाओं के नाम पर ‘जगह-जगह’ से बटोरे गये ‘तरह-तरह’ के चंदे-फ़ंड का हिसाब भी माँगा जाए और उनका ऑडिट हो।
- और हाँ जनता ये भी पूछ रही है कि इस बात का भी क़ानूनी पहलू समझाया जाए कि ‘अनरजिस्टर्ड’ लोग ज़मीन किसके नाम से लेकर अपना निर्माण करते हैं और ये संपत्तियाँ कैसे बेनामी नहीं हैं?
- इसके अतिरिक्त जनता की जिज्ञासा ये भी है कि गुप्त-गतिविधियों में संलिप्त भाजपाई संगी-साथियों के ऐसे निर्माणों को ‘कार्यालय’ कहा जाए या ‘अड्डा’?
- इन ‘संगी-साथी’ अवैध लोगों का ख़र्चा-पानी कौन उठाता है? इसका कच्चा चिट्ठा तलाशकर खोला जाए।
- ये तथाकथित स्वदेशी ‘संगी-साथी’, विदेश भ्रमण करने क्यों जाते हैं?
- ये ‘संगी-साथी’ औपनिवेशिक समय से किसकी कठपुतली हैं?
- इन ‘संगी-साथियों’ का इतिहास मुख़बिरी का क्यों रहा है?
- ये ‘संगी-साथी’ सामाजिक सौहार्द क्यों बिगाड़ते हैं?
- वकील ये भी पूछ रहे हैं कि अब ये ‘संगी-साथी’ किस नई साज़िश के तहत ‘मानस के मान’ पर लाठियाँ चलवा रहे हैं?