तयशुदा कहानी है, थोड़ी बहुत पढ़ाई, सात फेरे, मेटरनिटी वार्ड, देखा-देखी घर को फर्नीचर से भरना, कर्ज़ लेकर के मकान खरीदना, फिर टेलीविज़न , शॉपिंग मॉल में नकली सुख ढूँढना !
तीज-त्योहारों पर रिश्तेदारों के सामने झूठा चेहरा बनाकर के बधाइयाँ दे देना, दूसरों की ज़िंदगी से अपनी ..
छोटे आदमी की सज़ा ये कि उसकी ज़िंदगी में सब छोटे-छोटे मुद्दे होंगे।
पानी कब आता है ? भैंस का दूध या गाय का दूध ? नौकरी में फलाने को नीचा कैसे दिखाना है, बगल वाली बिट्टी कल किस लड़के के साथ घूम रही थी ? सेल कहां लगी हैं ? कपड़े खरीदने है !
ये अधिकांश लोगों की ज़िंदगी है ..
जीवन में जबतक कुछ ऐसा नहीं लाओगे
जो मजबूर कर दे
रजाई को उठाकर फेंकने के लिए,
चाहे वो प्रेम हो,
चाहे वो भय हो,
तबतक तो जवानी ऐसे ही
धीरे-धीरे बर्बाद जाती रहेगी।
अपने आपको किसी ऐसे
लक्ष्य के सामने खड़ा कर दो
या ऐसी किसी स्थिति में डाल दो
जहाँ मजबूर हो जाओ सुधरने के लिए!
हमारा सुधार कभी स्वेच्छित नहीं होगा,
हमारा सुधार हमेशा बेबसी में होगा।