#शास्त्रविरुद्ध_Vs_शास्त्रानुकूल
गीता अध्याय 3 श्लोक 14 से 15 में स्पष्ट किया है कि मुझ ब्रह्म काल की उत्पत्ति परम अक्षर पुरूष से हुई है। वही परम अक्षर ब्रह्म ही यज्ञों में पूज्य है। (ये ब्रह्म का�� ही गीता ज्ञान दाता है)।
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#शास्त्रविरुद्ध_Vs_शास्त्रानुकूल
गीता ज्ञान दाता ने अपनी भक्ति का मंत्र अध्याय 8 श्लोक 13 में बताया है कि मुझ ब्रह्म की भक्ति का केवल एक ओम (ॐ) अक्षर है। इस नाम का जाप अंतिम श्वांस तक करने वाले को इससे मिलने वाली गति यानि ब्रह्मलोक प्राप्त होता है।
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#शास्त्रविरुद्ध_Vs_शास्त्रानुकूल
गीता अध्याय 8 श्लोक 16 में स्पष्ट किया है कि ब्रह्मलोक में गए साधक भी लौटकर संसार में जन्म लेते हैं।
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Sant Rampal Ji Maharaj
#आध्यात्मिक_ज्ञान_चर्चा
संस्कृत के विद्वानों से सवाल -:
गीता अध्याय 7 श्लोक 18 में अनुत्तम शब्द का अर्थ अति उत्तम क्यों किया ?
जबकि अनुत्तम शब्द का अर्थ तो घटिया , अश्रेष्ठ होता है ।
Sant Rampal Ji Maharaj
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संस्कृत के विद्वानों से सवाल -:
गीता अध्याय 7 श्लोक 18 में अनुत्तम शब्द का अर्थ अति उत्तम क्यों किया ?
जबकि अनुत्तम शब्द का अर्थ तो घटिया , अश्रेष्ठ होता है ।
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#आध्यात्मिक_ज्ञान_चर्चा
पवित्र गीता जी में भी तीन प्रभुओं (1. क्षर पुरुष अर्थात् ब्रह्म, 2. अक्षर पुरुष अर्थात् परब्रह्म तथा 3. परम अक्षर पुरुष अर्थात् पूर्णब्रह्म) के विषय में वर्णन है। प्रमाण गीता अध्याय 15 श्लोक 16 व 17, अध्याय 8 श्लोक 3 में है तथा तीन प्रभुओं का एक और प्रमाण
#गीता_तेरा_ज्ञान_अमृत
गीता अध्याय 3 श्लोक 14 से 15 में स्पष्ट किया है कि मुझ ब्रह्म काल की उत्पत्ति परम अक्षर पुरूष से हुई है। वही परम अक्षर ब्रह्म ही यज्ञों में पूज्य है। (ये ब्रह्म काल ही गीता ज्ञान दाता है)।
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#गीता_तेरा_ज्ञान_अमृत
गीता अध्याय 8 श्लोक 16 में स्पष्ट किया है कि ब्रह्मलोक में गए साधक भी लौटकर संसार में जन्म लेते हैं।
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#गीता_तेरा_ज्ञान_अमृत
अध्याय 8 के श्लोक 13 में बताया है कि मुझ ब्रह्म की भक्ति का केवल एक ओम अक्षर है। इस नाम का जाप अंतिम श्वांस तक करने वाले को इससे मिलने वाली गति यानि ब्रह्मलोक प्राप्त होता है।
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#गीता_तेरा_ज्ञान_अमृत
गीता अध्याय 17 श्लोक 23-28 में ओम मंत्र जो काल का है तथा तत मंत्र जो सांकेतिक है, यह अक्षर पुरूष की साधना का है तथा सत मंत्र भी सांकेतिक है। यह परम अक्षर पुरूष की साधना का है। इन तीनों मंत्रों के जाप से पूर्ण मोक्ष प्राप्त होता है।
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#गीता_तेरा_ज्ञान_अमृत
गीता अध्याय 8 श्लोक 20 से 22 में काल ब्रह्म किसी अन्य पूर्ण परमात्मा के विषय में कहा है जो वास्तव में अविनाशी है।
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गीता अध्याय 8 श्���ोक 20 से 22 में काल ब्रह्म किसी अन्य पूर्ण परमात्मा के विषय में कहा है जो वास्तव में अविनाशी है।
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गीता जी के अध्याय 18 के श्लोक 66 में गीता ज्ञान दाता काल ने अपने से अन्य प���म अक्षर ब्रह्म की शरण में जाने को कहा है।
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#श्रीमद्भगवद्गीता_का_यथार्थ_ज्ञान
हिन्दू धर्मगुरू कहते हैं कि श्री विष्णु जी सतगुण, श्री शिव जी तमगुण व अन्य देवी-देवताओं की पूजा करो जबकि गीता में अध्याय 7 श्लोक 12.15 तथा 20.23 में कहा है कि इनकी पूजा करने वाले राक्षस स्वभाव को धारण किए हुए, मनुष्यों में नीच दूषित कर्म करने
#श्रीमद्भगवद्गीता_का_यथार्थ_ज्ञान
काल ब्रह्म कौन है?
गीता अध्याय 3 श्लोक 14-15 में बताया गया है कि काल ब्रह्म अविनाशी परमात्मा से उत्पन्न हुआ और कर्म, ब्रह्म से ���त्पन्न हुए और यहीं ब्रह्म यहां नकली ज्ञान फैलाकर हमें अपने वास्तविक घर जाने से रोकता है।
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#श्रीमद्भगवद्गीता_का_यथार्थ_ज्ञान
गीता ज्ञान दाता ने गीता अध्याय 2 श्लोक 12, अध्याय 4 श्लोक 5 व 9 तथा अध्याय 10 श्लोक 2 में अप��े आप को नाशवान यानि जन्म-मरण के चक्र में सदा रहने वाला बताया है।
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#श्रीमद्भगवद्गीता_का_यथार्थ_ज्ञान
गीता अध्याय 3 श्लोक 14 से 15 में स्पष्ट किया है कि मुझ ब्रह्म काल की उत्पत्ति परम अक्षर पुरूष से हुई है। वही परम अक्षर ब्रह्म ही यज्ञों में पूज्य है। (ये ब्रह्म काल ही गीता ज्ञान दाता है)।
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अथ फुटकर साखी का अंग | Ath Futkar Sakhi Ka Ang
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