@YourQuoteApp एक राइटिंग प्लेटफॉर्म है जहां 100 में से 99 कलम से लंगड़े हैं लेकिन जो 1 लेखक है वो कमाल है। मैं ऐसे कुछ एक को जनता हूं। वैसे बात ये है कि ये एप पहले फ्री था और अब खुद के लिखे रचनाओं को पढ़ने के पैसे मांगता है,सालों दूसरों के पोस्ट मत दिखा पर मेरे तो दिखा भिखारियों।
@WokeFuneral@Meta@instagram@facebook I had followed this page on day 1 of creation of this ac but after viewing this video, i checked back and found that i was not following, so i followed back again.
हजारों की संख्या में छात्रों का हुजूम है लेकिन किसी ने मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री को गाली नहीं दी, किसी ने धर्म के खिलाफ नहीं बोला, किसी ने भी पुलिस पर पत्थरबाजी और बदसलूकी नहीं कि , किसी भी बच्चे ने आजादी और देश विरोधी नारे नहीं लगायें.. क्योंकि वो अपने हक़ के लिए सड़कों पर है...
I Stand with Jharkhand Students ❤️🩹
#StudentProtestJharkhand
समाज की दशा बताने वाली खबर
मुंबई में बड़े कपड़ा व्यापारी रहे शिवचरण रामरत्न गुप्ता (74) की हरियाणा के सोनीपत स्थित एक वृद्धाश्रम में मौत हो गई। वे पिछले तीन साल से आश्रम में रह रहे थे। दो साल पहले उनकी पत्नी का भी इसी आश्रम में निधन हुआ था। मंगलवार को आश्रम प्रबंधन ने उनकी मौत की सूचना उनकी तीनों टीचर बेटियों को दी।
आश्रम संचालक आनंद कुमार के अनुसार, बेटियों ने ऑनलाइन 5100 रुपए भेजकर अंतिम संस्कार सोनीपत में ही कराने के लिए कहा। जब मुखाग्नि देने की बात उठी तो उन्होंने वीडियो कॉल के जरिए पूरी प्रक्रिया दिखाने को कहा।
यह केवल एक वृद्ध व्यक्ति की मृत्यु नहीं है—यह हमारे समाज की मरती हुई संवेदना की चिता है।
बड़े कपड़ा व्यापारी रहे 74 वर्षीय शिवचरण रामरत्न गुप्ता जी पिछले कुछ वर्षों से सोनीपत के एक वृद्धाश्रम में रह रहे थे। उनकी पत्नी जी का निधन भी दो वर्ष पहले उसी आश्रम में हुआ। अब गुप्ता जी के जाने पर, अंतिम संस्कार के लिए ₹5100 ऑनलाइन भेज दिए गए और मुखाग्नि की प्रक्रिया वीडियो कॉल पर दिखाने को कहा गया।
सोचिए! एक पिता—जिसने बच्चों को जन्म दिया, बड़ा किया, पढ़ाया, जीवन भर उनके लिए कमाया—अपनी अंतिम यात्रा में अपनों का कंधा भी न पा सका। मौत के बाद भी घर नहीं लौटा; वह एक फोन की स्क्रीन पर सिमट गया।
₹5100 से चिता जल सकती है, लेकिन संतान का धर्म नहीं चुकता।
वीडियो कॉल पर अंतिम संस्कार दिख सकता है, पर पिता के प्रति कर्तव्य नहीं निभता।
यह आधुनिकता नहीं, रिश्तों का दिवालियापन है।
यह स्वतंत्रता नहीं, संस्कारों का पतन है।
जिस घर में माँ-बाप बूढ़े होकर बोझ लगने लगें, वहाँ महँगी डिग्रियाँ हो सकती हैं, बड़े मकान हो सकते हैं, बैंक बैलेंस हो सकता है—पर मनुष्यता नहीं होती।
वृद्धाश्रम सेवा का आश्रय हो सकता है, अपनी संतान द्वारा माता-पिता को छोड़ देने का बहाना नहीं।
हर पुत्र और पुत्री को याद रखना चाहिए—जिस दिन माता-पिता “जिम्मेदारी” लगने लगें, उसी दिन समझ लेना कि जीवन की सबसे बड़ी परीक्षा हार चुके हो।
#माता_पिता_सेवा #संस्कार #समाज_का_सच #वृद्धाश्रम
1952 में 600-700 जातियाँ दलित थी, बाबा साहेब के संविधान ने 600 और जोड़ दिया, यानी 5000 वर्ष के मनुवादी, ब्राह्मणवादी व्यवस्था ने 600 अछूत जातियाँ दी, 70 साल के बाबा साहेब संविधान ने 600 और जोड़ा। तार्किक रूप से सुधीजन ये बताएँ कि आरक्षण से जातियों का उत्थान हो रहा है या पतन?
SC के 135-145 IAS ऑफ़िसर्स हैं, 50-62000 क्लास 1 ऑफ़िसर्स, डेढ़ से पौने दो लाख क्लास 2 ऑफ़िसर्स हैं इस देश में। अंबेडकर को उनके शिक्षक ने और तत्कालीन महाराज सयाजीराव गायकवाड ने उन्हें विदेश भेजा, फिर छत्रपति शाहूजी महाराज ने उनकी लंदन की पढ़ाई पूर्ण करवाई।
अब प्रश्न यह है कि ऊपर के IAS, क्लास 1 और 2 के लगभग 2 लाख अफ़सरों में से कितनों ने अपनी ही जाति समूह के बच्चों को स्पॉन्सर किया है?
मीना समाज 1000% अधिक ओवर रिप्रिजेंटेड है, जाटव का भी प्रतिनिधित्व SC वर्ग में अधिक है, यादव, कुर्मी, जाट, गुर्जर को OBC में देख लीजिए! तो प्रश्न यह है कि असली आदिवासी, भील कहाँ हैं ST में?
मुसहर, माँझी, वाल्मीकि, सुदर्शन, बहेलिया, बंतार, डोम, हलालखोर, तुरी, पासी, भंगी और मदारगी के बच्चे स्कूल भी पहुँच पा रहे हैं? OBC की लगभग 1,000 जातियों की सरकारी नौकरियों में हिस्सेदारी शून्य या नगण्य है, जैसे कश्यप, केवट, मल्लाह, निषाद, बिंद, राजभर, पाल, बघेल, बढ़ई, कुम्हार, लोहार, तेली, चौरसिया, नाई (सैलानी) और नोनिया!
फिर कहा जाता है कि आर्थिक आधार पर रिजर्वेशन नहीं होना चाहिए, क्योंकि जो दो-चार जातियाँ सारा आरक्षण खा रही हैं, उनकी आर्थिक स्थिति भी ठीक है, पर उन्होंने स्वयं को इन जाति समूहों में राजनैतिक रूप से ब्लैकमेलिंग करके घुसा रखा है, इसलिए वो कभी भी अपनी ही जाति समूहों में आरक्षण नीचे तक नहीं जाने देंगे।
इसीलिए, Reservation पर ReThink, Rationalise, Reform और अंततः Remove करने के लिए हमें चर्चा करनी चाहिए।
@ajeetbharti सवाल तो पूछा जाना चाहिए यें गुंडे नागपुर के है या पाकिस्तान सखा के 👇👇
यें पुलिस तो लगते नहीं,अडानी नें निजी फ़ोर्स तो भर्ती करना नहीं न शुरू कर दिया,ईस्ट इंडिया कम्पनी की तरह और यें गुंडे उसके ही तो नहीं है 🤔
ऐसे अनेको गुंडों घूम रहे थे दिल्ली मे कल,कौन थे यें?
#संसद_मार्च
अब मुझे यह समझ में नहीं आ रहा कि सरकार ने UGC पर इंगेज नहीं किया, CBSE/NEET पर जब बोलना था, तब एक शब्द नहीं बोला, आज कैसे थूक चाटने लगे?
यही बात तो पार्टी के समर्थक सात महीने से बोल रहे थे। पूरा कम्यूनिकेशन ब्लैकआउट किया, मीडिया में अपने प्रवक्ताओं को भेजना बंद किया, हाउस अरेस्ट कराया, सुप्रीम कोर्ट से स्टे के बाद से ऐसे जताया कि उपकार कर दिया हो, आज घुटनों पर आ गए?
यही इस सरकार का पैटर्न बन चुका है। फोड़े को बवासीर बनने देते हैं, फिर जब लगता है कि अब मामला हाथ से निकल गया, तब झुक कर बात मानने को तैयार हो जाते हैं।
सुबह के 11 बजे तक यह आंदोलन सरकार के हिसाब से चल रहा था, नियंत्रण में था। अब यह स्पष्ट है कि नड्डा के घर बुलाने और तीन माँगें सुनने के बाद, तिलचट्टों का विश्वास आकाश पर है और वो CAA, किसान आंदोलन की तरह, भारत को नया, फर्जी आंदोलन देने जा रहे हैं।
अब मुझे देखना है कि माँगों पर सरकार करती क्या है! आत्महत्या करने वालों के परिजनों को एक करोड़ की माँग उचित है, क्योंकि अधिकांश पेपर लीक के कारण ही ‘सॉरी’ लिख कर मरे। दो अन्य माँगों में से एक प्रधान के त्यागपत्र की है, जो होना तो जनवरी में ही था, पर ईगो के कारण आज तक खींच लाई सरकार।
प्रधान अब इनके गले की फाँस बन चुका है।ये हर वो चीज करते हैं, जिसका इन्होंने पहले विरोध किया पर वामपंथी इनसे करवाते हैं। ‘कास्ट सेंसस’ ये राहुल के कहने पर करा रहे हैं, और प्रधान अब तिलचट्टों के कहने से जाएगा।
इनकी पुलिस आज फिर पिटी है, जैसे लाल किला वाले आंदोलन में पिटी थी। आईटीसेलिए फिर से विक्टिम बने घूम रहे हैं और यह पूछ रहे हैं कि ‘क्या ऐसे लोग विद्यार्थी हैं’? फिर अपने मालिक से पूछो न कि क्यों नड्डा से मीटिंग को तैयार हो गए?
जब सरकार अपने समर्थकों पर थूकती है तब उन्हें दूसरों का थूका चाटना ही पड़ता है।
भाग्यनगर की एक प्राइवेट स्कूल की मुस्लिम शिक्षिका ने class 2 के हिंदू विधार्थी को कलमा याद करने का बोला
पहलगाम में भी आतंकवादियों ने यही पूछा था की कलमा पढ़कर सुनाओ
और अब तो जिहादने शिक्षा के माध्यम से हिंदू स्टूडेंट्स को कलमा सुनाने का कार्य होमवर्क में दे रही है
ये अपने मिशन पर है
चाहे मुस्लिम आतंकवादी हो या मुस्लिम शिक्षिका
बिना हेलमेट... जुर्माना 1000/-
नो पार्किंग में पार्किंग करना... जुर्माना 3000/-
मोटरसाइकिल का बीमा नही ... जुर्माना 1000/-
शराब पी कर वाहन चलाना... जुर्माना 10000/-
नो एंट्री में वाहन चलाना... जुर्माना 5000/-
मोबाईल फोन पे बात करना... जुर्माना 2000/-
प्रदूषण सर्टिफिकेट नहीं... जुर्माना 1100/-
ट्रिपल सीट ड्राइविंग... जुर्माना 2000/-
1-खराब सिग्नल... कोई जिम्मेदार नहीं है!
2-सड़क पर गड्ढ़े... कोई जिम्मेदार नहीं है!
3-अतिक्रमित फुटपाथ... कोई जिम्मेदार नहीं है!
4-सड़क पर रोशनी नहीं... कोई जिम्मेदार नहीं है!
5-सड़क पर कचरा बह रहा है...कोई जिम्मेदार नहीं है!
6-सड़कों पर लाइट के खंभे नहीं... कोई जिम्मेदार नहीं है!
7-सड़क के मेनहोल में गिर के मर जाये...कोई ज़िम्मेदार नहीं!
8-महीनों से खुदी सड़क ... कोई जिम्मेदार नहीं है!
9-गड्ढों में गिर कर आप गिरो चोटिल हो जाएँ... कोई जिम्मेदार नही है!
10-आवारा गायें जानवर टकरा जाए कुत्ता काट ले... कोई जिम्मेदार नहीं!
11-सड़कों में उफनाते नाले... कोई जिम्मेदार नहीं!
ऐसा लगता है कि जनता ही एकमात्र अपराधी है और जुर्माना देने के लिए उत्तरदायी है। प्रशासन, निगम और सरकार कोई जिम्मेदार नहीं है। उनके लिए कोई नियम लागू नहीं होते हैं। वे किसी भी चूक के लिए कभी ज़िम्मेदार नहीं हैं।
क्या उन्हें दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए ????
नागरिक केवल काम करेंगे... दर्द का सामना करेंगे... टैक्स चुकाना होगा... जुर्माने का भुगतान करेगा... सरकार की जेब भरें... और उन्हें फिर से सत्ता में आने के लिए वोट दें !
सद्दाम का बच्चा मौत से लड़ रहा था
तो कासगंज की मीना देवी ने उसे 90 हज़ार रु दिए, बच्चे का इलाज हुआ और बच्चा बच गया
एक साल बाद मीना देवी ने पैसे वापस मांगे तो
सद्दाम ने मीना को मारकर गंगा जी में फेंक दिया..
फेंकते हुये एक साधू ने देख लिया तो सद्दाम ने उसकी झोपड़ी में आग लगाकर उसे जिन्दा जला दिया...
वाह क्या सिला दिया अल्ला के बन्दे ने ✍️
पगला डुप्लीकेट वाला दारू पी कर इंटरव्यू देते समय कह रहा है...
जब महात्मा गांधी को इंग्लैंड में ट्रेन से धक्के मार कर निकाल दिया तो मेरे परनाना नेहरू को बहुत गुस्सा आया और वो अपने कजिंस के साथ इलाहाबाद रेलवे स्टेशन पर गए और कुछ अंग्रेजों को फर्स्ट क्लास के डिब्बे से बाहर निकाल दिया
1: महात्मा गांधी को इंग्लैंड नहीं बल्कि अफ्रीका में फर्स्ट क्लास के डब्बे से बाहर निकाला गया था
2: जिस समय ये घटना हुई नेहरू की उम्र 3 साल थी
हिंदूस्थान का दुर्भाग्य है जो यह पगलेट विपक्ष का नेता है, क्या स्तर होगा उनका जो इसको अपना नेता मानते हैं,
पप्पू दा जवाब नहीं, इस वीडियो को देखने के बाद अभी भी कुछ पप्पू इस पप्पू को प्रधानमंत्री देखना चाहते है
मुझे नहीं पता था कि संविधान के अनुसार कोई पद पति को मिले तो पत्नी भी निरीक्षण करने निकल सकती हैं। @BJP4India में ‘प्रधानपति’ की परिकल्पना अब जेंडर न्यूट्रल हो कर ‘मुख्यमंत्री-पत्नी’ तक पहुँच चुकी है।
अच्छा है कि लोग पत्नी के नाम पर प्रधानी और सांसदी करते हैं, यहाँ पति के नाम पर पत्नी निरीक्षण कर रही हैं। कुछ कर तो रही हैं, बाकी तो कुछ करते ही नहीं। फुल सपोर्ट।
An Open Letter to the Jantar Mantar protestors:
My dear young friends,
I address you today not as a politician or an MP, but as someone deeply troubled by what is happening to your generation of young Indians.
This is personal for me. I was born to a middle-class family: my father was a salaried newspaper employee, my mother a homemaker, with three children to educate on one income. For a family like ours, merit was not a slogan. Scholarships, fair examinations, honest results — these were the only way one salary could carry three children's dreams.
I went to school in Mumbai and Kolkata, to college here in Delhi, topped the University and earned admission into IIM — and chose instead to follow my passion for international affairs, in America, on a scholarship. Nothing was inherited; everything was earned by hard work and yes, Exams.
So I know that a fair, merit-based system is the only ladder for young people from lower and middle-income families to climb up. When that ladder is broken — papers leaked, examinations cancelled, trust destroyed — the children of the rich and powerful do not suffer. They have other ladders. It is your dreams, and your families' sacrifices (and tragically, in some homes, young lives themselves) that are betrayed.
To the young people gathered at Jantar Mantar, and those raising your voices peacefully across India: this country hears you. Your anger is not indiscipline — it is the anguish of a generation that did everything right and was still betrayed . You are not alone.
And to the millions of young Indians watching quietly: your generation is not a problem to be managed. You are the answer to India's future. Do not lose hope. This ladder will be rebuilt — by you, and by every Indian who stands with you.
To Shri Sonam Wangchuk-ji, my heartfelt appeal: please end your fast. You have awakened the conscience of the nation; that is what a fast is meant to do. India needs your voice for the long road ahead.
With Parliament in session again from Monday, we will have an opportunity to raise the students’ issues in the highest forum of our democracy. That’s where the problem should be addressed, not by fasting unto death. Please heed my plea.
And finally, to the Government: I respectfully urge you to reach out and engage in the dialogue our democracy owes its young citizens. That is not weakness; that is statesmanship.