तीले तट पर बंधा हुआ छोटा सा आपका ईंटों का घर है, और नदी की हर लहर वो बालू को, रेती को ले जा रही। कब गिर जाए आपका ये नदी तट, रेतीले बालू के तट पर आपका मकान? कोई पता नहीं। ऐसे ही नदी की लहर, हर लहर बालू को, रेती को काटती है, ऐसे ही हर श्वास आपका आयुष्य काट रहा है। इतना खतरा सिर पर लेकर आप ही ....ही... हा... हा.. करके काय को आयुष्य खत्म करते। कब आकर ये श्वास के झपेटे आपके शरीर रूपी घर को गिरा दे, कोई पता नहीं। गिरेगा, ये पक्की बात है।
बेटा होगा कि नहीं होगा, इसमें सवाल है। और बेटा फिर आज्ञा में रहेगा कि नहीं रहेगा, ये भी सवाल है। बेटा विदेश जाएगा कि नहीं जाएगा, ये भी सवाल है। लेकिन बेटा हुआ है, वो मरेगा कि नहीं मरेगा, ये सवाल कभी नहीं पूछा जाता है। पैदा हुआ है, तो मरेगा। ऐसे ही आपका शरीर पैदा हुआ है, तो जाएगा। पक्का है।
तुम विदेश जाओ कि नहीं जाओ, ये पक्का नहीं है। अगले साल सत्संग में आओ कि नहीं आओ, ये पक्का नहीं है। लेकिन मरो कि नहीं मरो, ये पक्का है। पूछने की जरूरत नहीं। मरना पक्का, बाकी सब कच्चा है। बोलो। जब शरीर का मरना पक्का है, तो मौत की दाल नहीं गलती। उस अमर को पा लो न भैया ला ला लालियां।
#AsharamjiBapu
उपवास करने से पहले सुबह भगवान नारायण को प्रार्थना करना चाहिए कि आज तुम्हारी प्रीति के लिए, भगवदभक्ति, भगवदज्ञान, भगवदप्राप्ति के लिए मैं आज ये व्रत करूंगा... फिर भगवान की पुष्पों से पूजा करें, धूप-दीप करें, एकादशी की रात्रि का जागरण करें, इस प्रकार एकादशी का व्रत करने से बड़े बड़े अनर्थ भी दूर हो जाते हैं।
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#निर्जला_एकादशी
भगवत् कथा सुनने से आयु, आरोग्य और पुष्टि होती है। श्रवण मनन से दुःख निवृत्त होते हैं। अगर संसार की वार्ता सुनोगे तो राग द्वेष पैदा होगा, उत्तेजनाएं पैदा होगी। आपकी औरा और ऊर्जा ज्यादा क्षीण होगी। जब भगवत् कथा सुनोगे तो सहनशक्ति, क्षमाशक्ति, ब्रह्मचर्य शक्ति, शौर्य शक्ति, उदार शक्ति आपकी खिलेगी और सब शक्तियों का भंडार जो रब है उसमें ध्यान करने की भी रुचि पैदा होगी और उसके नाम उच्चारण करने की भी रुचि पैदा होगी। #AsharamjiBapu
जो एकादशी के दिन चावल खाते हैं उनको शारीरिक दोष तो प्राप्त होता है बीमारियां आदि, लेकिन मानसिक खिन्नता भी उनकी बढ़ती है एकादशी के दिन चावल खाना निषेध कहा गया शास्त्रों में और एकादशी के दिन उपवास रखने का बड़ा भारी माहात्म्य कहा गया है।
#AsharamjiBapuQuotes#निर्जला_एकादशी
आओ श्रोता तुम्हें सुनाऊं, महिमा लीलाशाह की।
सिंध देश के संत शिरोमणि, बाबा बेपरवाह की।
जय जय लीलाशाह
दुःख को हरते,सुख को भरते,करते ज्ञान की बात जी।
जग की सेवा लाला नारायण, करते दिन-रात जी।
जीवनमुक्त विचरते हैं ये, दिल है शंहांशाह की।
आओ श्रोता तुम्हें सुनाऊं..
#AsharamjiBapuQuotes
सदैव प्रसन्न रहना ईश्वर की सर्वोपरि भक्ति है और संसार के विकारों से बचना जीव का परम उद्योग है, उद्यम है। जो उद्यमी होता है, उसके द्वारा ईश्वर की अद्भुत शक्तियां छलकने लगती हैं।
हरि सम जग कछु वस्तु नहीं, प्रेम पंथ सम पंथ.....।
भगवान को अपना और अपने को भगवान का मानकर प्रीतिपूर्वक भज़ें तो उसे बुद्धि योग मिलता है अर्थात् कर्म में धर्म का नियंत्रण होने लगता है, उपासना में, भगवान में, प्रीति होने लगती है और ज्ञान में, भगवत तत्व का ज्ञान होने लगता है।
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~शंख ध्वनि का महत्त्व~
शंख बजाने से, एक मिनट में, 2800 घन फीट ताकत से फूंका हुआ शंख, 1300 फीट की रेंज (दायरे) में हार्मफुल बैक्टीरिया (हानिकारक जीवाणु) को नष्ट कर देता है और 2600 फीट तक के ये हार्मफुल बैक्टीरिया मूर्छित हो जाते हैं।
राम और कृष्ण अवतार के पहले से हमारे यहां (सनातन संस्कृति में) वैदिक काल से शंख ध्वनि की परंपरा है।
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श्वास लो। (‘ॐ...ॐ...’ जप करते हुए) यह एक बार हो गया। फिर से लो श्वास। (‘ॐ...ॐ...’ जप करते हुए) दो बार हो गया। फिर से। (‘ॐ...ॐ...’ जप करते हुए) यह तीन बार हो गया। इस प्रकार दस बार अगर करते हैं तो स्मरण-शक्ति बढ़ेगी, याद-शक्ति बढ़ेगी।
#RishiDarshan#AsharamjiBapu#Memory
हे रामजी, जो एक सांस भी आत्म विचार से रहित होती है, वह वृथा जाती है। मनुष्य की ऐसी एक सांस के समान संपूर्ण पृथ्वी का धन भी नहीं है। यदि एक सांस निष्फल जाए, तो फिर मांगे नहीं मिलती।
एक श्वास इतनी कीमती है कि पृथ्वी का धन दे दो, फिर भी एक श्वास आयुष्य बढ़ नहीं सकती। ऐसी कीमती श्वासे इधर-उधर गवाना गपशप में। सोहम्। श्वास अंदर जाए। 'सो' बाहर आए, तो 'हम्'। मैं शरीर नहीं हूं, मैं चेतन आनंद स्वरूप हूं, सुख स्वरूप हूं, भगवान का अविभाज्य अंग हूं। ये मानस जप। वो पुरुष खुद तीर्थ रूप हो जाता है। वो पुरुष खुद पवित्र करने वाला होता है। मनुष्य का एक श्वास भी आत्म विचार के सिवाय जाता है, तो व्यर्थ हो जाता है। सारी पृथ्वी का धन देने से भी एक श्वास जितनी आयुष्य वापस नहीं आती।
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कथा में एक-एक कदम चलकर आते हैं तो एक-एक यज्ञ करने का फल होता है, सुनते हैं तो भक्ति योग होता है, विचार करते हैं तो ज्ञान योग का फल मिलता है और कीर्तन करते हैं सामूहिक ध्वनि (गगन गूंजी) से तुमुल ध्वनि पैदा होती है इसीलिए सामूहिक कीर्तन का बहुत पूण्य कहा गया है।
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मन ही हमारे दुख-सुख का और ऊंचाई-नीचाई का, पतन और उत्थान का कारण है। ना ग्रह शास्त्र कारण है, ना प्रारब्ध वेग कारण है, ना ज्योतिष कारण है। हमारा मन ही हमारे पतन और उत्थान का कारण है। ये श्रीमद्भागवत के ग्यारहवें स्कंध में है।
और गीता कहती है, "आत्मैव आत्मनो बंधु।" मनुष्य अपने आप का बंधु है और अपने आप का शत्रु।
तो पुरुषार्थ ये करना है कि मन में जो आए वो खा लिया, जो आए वो बोल दिया, जैसा आए वो कर लिया, तो अपने आप का सत्यानाश करने वाला होगा।
अगर मन के आगे धर्मशास्त्र, ईश्वर आज्ञा, समाज व्यवस्था रखकर, नियंत्रित करके मन को चलाया जाए, तो मन आपको ईश्वरमय कर सकता है। यहां पुरुषार्थ है।
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शत्रुओं को मित्र बनाने वाला मंत्र देता हूँ। गुरु गीता का पाठ कर लेना। ललाट पे तिलक कर लेना। हो सके, दीया जलाओ तो ठीक है, नहीं तो चलेगा।
मंत्र बड़ा सरल है, लेकिन बड़ा शक्तिशाली।हूं, हूं, हूं,हूं, हूं, हूं, हूं, हूं, हूं, हूं , हूं इक्कीस बार।
दूसरा मंत्र है, अं रां अं, अं रां अं।
दोनों में से जो अधिक अनुकूल लगे, शत्रुओं को मित्र बना देता है। बस
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|| Thought of the Day ||
अच्छाइयाँ-बुराइयाँ सबके अंदर होती है, बुद्धिमान वह है जो सत्संग करके अच्छाइयाँ बढ़ाता जाय और बुराइयाँ छोड़ता जाय ।
#SantShriAsharamjiBapu#YogVedantSevaSamiti
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परदेसी का CHALLENGE कैसे पूरा किया वज़ीर ने ?
एक परदेसी आदमी वैशाली नगरी के राजा के दरबार में आया और दो घोड़ियाँ थीं उसके पास। उसने कहा, इसमें कौन पुत्री है और कौन माँ है? वो अगर कोई मुझे बता दे तो ये दो घोड़े उसको इनाम में और एक हज़ार रुपया भी दूँगा...
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