नेपथ्य
के भीतर
क्या छिपा हैं
कौन जानता हैं
यायावर
खोज रहा हैं
मुझें की उसे
कौन पहचानता हैं
नेजा
तान रखें हैं
शब्दभेदी
भानू की नोक पर
यकायक
खोज रहा हैं
पद्चिन्ह
उस पथिक के पाँव
भँवर के
चक्रव्यूह में
हाँक रहा नौका ,
वह सिंधु की चोंट पर
𝐆𝐨𝐩𝐚𝐥𓂃✍︎
सुननें को हैं ये मन आतूर प्रीत की वाणी
तुम मुख से चार मोती छलका दो पाखी
आनन-फानन में हैं जग फिरता सब जन
तुम सुख के चार सागर खनका दो बाक़ी
घुमड़-घुमड़ के हारे थकें चल रहें ये प्राण
तुम दो घड़ी बरखा बादल बरसा दो पानी
𝙶𝚘𝚙𝚊𝚕𓂃✍︎