किसी बच्चे का जान गँवा देना दुःखद है। आत्महत्या कर ले तो और दुखद है, लेकिन नकल करते पकड़ा जाए और आत्महत्या कर ले, उसके लिए प्रोफेसर पर जातीय विद्वेष का मामला दर्ज हो जाए, यह देश को, शिक्षा व्यवस्था को गर्त में डालने जैसा है। राजनीति करते यह शायद ही समझ में आए, लेकिन जाने-अनजाने हम उसी दिशा बढ़ रहे हैं कि, कुछ न समझ आए तो जातीय घृणा का मामला दर्ज करा दो। रोहित वेमुला के मामले में भी कुछ यही हुआ था। दुर्भाग्यपूर्ण है कि, #IITBombay के छात्र की दुखद आत्महत्या के मामले में यही सब होता दिख रहा है।
बेटे को कुर्सी दिलाने के लिए सर्वनाश पर उतारू कांग्रेस, एक बुजुर्ग मां को कुर्सी देने का मज़ाक उड़ा रही है 😃😃😃
उस बुजुर्ग मां को तो कुर्सी मिल गई, इस अयोग्य बेटे का क्या होगा
आज मुझे मेघना गुलज़ार की नई फिल्म ‘दायरा’ का स्पेशल प्रिव्यू देखने का मौका मिला. ये फिल्म 18 सितंबर को सिनेमाघरों में रिलीज़ होने जा रही है . फिल्म देखने के बाद पहला एहसास यही होता है कि यह सिर्फ एक जघन्य अपराध की कहानी नहीं है बल्कि उस अपराध के बाद पैदा होने वाले उन सवालों की पड़ताल भी है, जिनका जवाब समाज और सिस्टम दोनों के लिए आसान नहीं है . दायरा में इस सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश है कि इंसाफ आखिर है क्या? और कानून की हद कहां तक है ?
फिल्म की कहानी देखते हुए बार-बार हैदराबाद के उस चर्चित गैंगरेप और हत्या के मामले की याद आती है, जिसने पूरे देश को झकझोर दिया था . 26 वर्षीय युवती के साथ सामूहिक बलात्कार के बाद उसकी हत्या कर दी गई थी और शव को जला दिया गया था . घटना के बाद देश भर में आक्रोश था . पुलिस ने चार आरोपियों को गिरफ्तार किया और बाद में उन्हें उसी जगह ले जाकर मुठभेड़ में मार दिया गया, जहां उस लड़की की हत्या की गई थी.
उस एनकाउंटर ने देश में एक अलग तरह की बहस को जन्म दिया . एक तरफ बड़ी संख्या में लोगों ने इसे त्वरित इंसाफ़ के तौर पर देखा तो दूसरी तरफ यह बुनियादी सवाल उठा कि क्या किसी आरोपी को अदालत में मुकदमा चलाए बिना पुलिस हिरासत में मार दिया जाना कानून के राज के अनुरूप हो सकता है ? सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर गठित सिरपुरकर आयोग की जांच ने बाद में एनकाउंटर को लेकर गंभीर सवाल उठाए और 10 पुलिसकर्मियों के खिलाफ हत्या का मुकदमा चलाने की सिफारिश की . हालांकि इस मामले में पुलिसकर्मियों को अब तक सजा नहीं हुई है .
मेघना गुलज़ार ने आधिकारिक तौर पर भले यह न कहा हो कि ‘दायरा’ उसी घटना पर आधारित है लेकिन फिल्म देखते हुए उस घटना की छाया से बच पाना मुश्किल है. शायद मेघना की दिलचस्पी भी इसी में है कि वो किसी वास्तविक घटना की हूबहू पुनर्रचना कहने की बजाय उसके बहाने एक बड़े नैतिक और कानूनी सवाल को सामने रखना चाहती हैं .
‘दायरा’ की कहानी एक जघन्य अपराध की जांच से शुरू होती है और धीरे-धीरे पुलिस, आरोपी, पीड़ित और पूरी न्याय व्यवस्था के बीच मौजूद उन परतों को खोलती है, जहां सच हमेशा उतना सीधा नहीं होता, जितना पहली नजर में दिखाई देता है. गैंगरेप और जघन्य हत्या को लेकर स्वाभाविक गुस्सा है, पीड़ित के लिए न्याय की बेचैनी है लेकिन उसके साथ ही पुलिस की कार्रवाई और तथाकथित त्वरित न्याय पर गंभीर सवाल भी हैं .
फिल्म की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मेघना गुलज़ार दर्शक को कोई आसान नैतिक फैसला नहीं देतीं. वह न तो अपराध की भयावहता को कम करती हैं और न ही ‘तुरंत न्याय’ की लोकप्रिय धारणा को बिना सवाल स्वीकार करती हैं. इसके बजाय वह दर्शक को उस असहज जगह पर खड़ा कर देती हैं, जहां भावनाओं और कानून के बीच टकराव शुरू होता है. यहां मेघना का निर्देशन खास तौर पर ध्यान खींचता है . ‘दायरा’ कोर्टरूम ड्रामा कम और जांच, संस्थागत सोच और कानून बनाम त्वरित न्याय के तनाव पर बनी फिल्म ज्यादा है . कहानी को जिस तरह धीरे-धीरे खोला गया है, उसमें निर्देशक का संयम दिखाई देता है . फिल्म कई जगह आपको जवाब देने के बजाय सवालों के साथ छोड़ती है और यही उसकी ताकत भी है .
करीना कपूर और पृथ्वीराज सुकुमारन अपने-अपने किरदारों में पर्याप्त गहराई लेकर आते हैं . खासकर दोनों के बीच मौजूद वैचारिक और पेशेवर टकराव फिल्म को बांधता भी और सोचने को मजबूर भी करता है. अभिनय यहां सिर्फ संवाद बोलने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि किरदारों की सोच और उनके भीतर चल रहे द्वंद्व को सामने लाने का माध्यम बनता है.
फिल्म की सबसे बड़ी खूबी शायद यही है कि इसका असर आखिरी दृश्य के साथ खत्म नहीं होता . पर्दे से निकलने के बाद भी एक सवाल आपके साथ चलता रहता है कि अगर कानून पर भरोसा कम होने लगे, तो क्या इंसाफ के नाम पर कानून को ही किनारे किया जा सकता है? और उससे भी बड़ा सवाल कि क्या किसी भयावह अपराध के जवाब में मिली तत्काल सजा को न्याय कहा जा सकता है , अगर उसके लिए न्याय की स्थापित प्रक्रिया को ही दरकिनार कर दिया गया हो?
मेघना गुलज़ार की ये फिल्म आपको रोमांचित करने से ज्यादा असहज करती है और शायद इस विषय पर बनी फिल्म के लिए यही उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है . ‘दायरा’ खत्म होती है लेकिन उसके सवाल खत्म नहीं होते हैं . यही इस फिल्म की असली ताकत है .
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UPI पर चार्ज लगाना बड़ा रायता है, जिसको समेटने में सरकार को बड़ी दिक्कतें आने वाली हैं.
अब सरकार कह रही है कि 2000 से ज़्यादा पेमेंट करने पर ही MDR लगेगा, उससे कम पर नहीं.
एक लाख रुपए की आमद गल्ले में करने वाला छोटे व्यापारी देश में बहुत कम हैं. महीने में एक लाख रुपए की सेल बहुत सारे लोग कर रहे हैं.
अब ई-कॉमर्स वेबसाइट पर भी UPI से पेमेंट करने पर चार्ज लगेगा.
रेलवे से ट्रैवेल करेंगे तो फ़्लैट चार्ज 5 रुपए का लगेगा, लेकिन फ्लाइट से ट्रैवल करने पर 0.4 परसेंट.
और ये सारा चार्ज कस्टमर को नहीं देना है, ऐसा सरकार का कहना है.
और आप इसको अब नए लेंस से देखिए. दिन भर में आप अकेले कस्टमर नहीं हैं, जो UPI से सामान खरीद रहे हों. एक बड़े मर्चेंट, या Amazon वग़ैरह पर हज़ारों की संख्या में रोज़ लोग खरीददारी कर रहे हैं. ब्लिंकिट वगैरह, स्विगी-ज़ोमैटो वग़ैरह पर भी.
लेकिन इन बड़े मर्चेंट्स या ई-कॉमर्स वाले हमारे-आपके फूफा तो नहीं हैं कि दिन भर में हज़ारों बार UPI से पैसे का लेनदेन करें, और MDR भी दें. न ही ये पेमेंट सिस्टम वाले. कोई न कोई तो पैसा भरेगा. और पैसा तो भरना ही है.
तो आख़िर में ये घूमकर हमारे सिर पर आएगा, इसके चांस ज़्यादा हैं. ऐसे में या तो पैसा भरना होगा, या तो चीज़ों का दाम बढ़ जाएगा. कहीं न कहीं पैसा तो जाना हमारी जेब से ही है.
वरना डेबिट कार्ड पर भी 2 परसेंट का MDR लेने का भी प्रावधान नहीं है, लेकिन लिया हमसे ही जाता है.
सर
नारायण 1857 क्रांति में अंडमान भेजे गए
लेकिन माफी नहीं मांगे पहले शहीद हुए।
निरंजन सिंह
अल्लामा फ़ज़लुल हक़
लियाक़त अली
भीम नायक
मजनू शाह
शेर अली
बासुदेव बल्लभ फड़के
इनमें से किसी ने माफी नहीं मांगी शहीद हो गए
यह पुस्तक पढ़कर अभी पूरी हुई। वीर सावरकर पर बहुत कुछ पढ़ा है, लेकिन यह पुस्तक पूरी तरह से उनके आजीवन कारावास की कहानी कहती है। सावरकर अंदमान के कालापानी का विवरण दे रहे हैं। पढ़ते कलेजा मुँह को आने जैसा होता है। पता नहीं कैसे कलेजे वाले भारतीय और उनमें भी हिन्दू हैं जो वीर सावरकर के बारे में अनर्गल प्रलाप कर जाते हैं। प्रभु! ऐसे लोगों को सद्बुद्धि दें। शुभ रात्रि
2000 से ऊपर की UPI पेमेंट अब टैक्स के दायरे में आ गई है।
दुकानदार तो हर चीज ग्राहक पर डाल देता है। बोल देगा कि इससे ज्यादा पेमेंट अगर ऑनलाइन देनी है तो टैक्स के साथ दीजिये। हमें भी आगे सरकार को टैक्स देना होता है।
उत्तर प्रदेश –
बाराबंकी पुलिस ने सांसद चंद्रशेखर आजाद को रोका। वह गोंडा जिले में हुए व्यापारी विनोद साहनी हत्याकांड में पीड़ित फैमिली से मिलने जा रहे थे। यह हत्या सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर हुई थी।
फिल्में कम ही देखता हूं, लेकिन कल देर रात एक फिल्म देखी, मिर्जापुर. हालांकि औपचारिक डिस्क्लेमर लगा था कि उसका वास्तविक घटनाओं-पात्रों से कोई लेना-देना नहीं है. फिर एक बड़े फिल्मकार की बात याद आई कि ‘(सिनेमा) एक आईना है जो समाज को प्रतिबिंबित करता है.’ जैसलमेर, जहां यादवों की आबादी नगण्य है, वहां का बब्बन यादव नशीले पदार्थों का कारोबारी दिखाया गया और उत्तर प्रदेश में करीब दस साल से कोई यादव मुख्यमंत्री नहीं है वहां एक यादव मुख्यमंत्री को माफियाओं से पैसे लेते दिखाया गया. और फिल्म में दिखाए गए ब्राह्मण माफिया की अगली पीढी के तीन चेहरों को विजेता की तरह दिखाया गया है. मुझे समझ नहीं आया कि कथाकार क्या कहना चाहते हैं. -- जैसा मैंने पहले कहा, मैं सिनेमा कम देखता हूं और कोई समझ भी नहीं है. और हां, मेरा उपनाम कुछ भी हो, मैं अपने को पत्रकार के सिवा कुछ नहीं मानता.
जापान में होने वाले एशियन गेम्स के लिए भारतीय वुशु टीम से अचानक दिव्यांशी चौधरी को बाहर कर दिया गया !!
दिव्यांशी कोटा (राजस्थान) की रहने वाली हैं। उन्होंने करीब 9 मिनट का Video बनाकर अपना दुख दर्द बताया है। सुसाइड करने की बात कही है। मां–बाप से आखिरी बार माफी मांगी है।
दिव्यांशी का आरोप है कि उन्हें वुशु फेडरेशन ने उन्हें गलत तरीके से चोट पहुंचाई और फिर टीम से बाहर कर दिया।
#प्रयागराज, #हंडिया#हंडिया में गाय काटने से संबंधित मामले में पुलिस ने सागर शुक्ला, रचना शुक्ला और अनीता शुक्ला को गिरफ्तार किया है।
पुलिस के मुताबिक, आरोपियों के पास से घटना में इस्तेमाल किए गए 3 चापड़, 2 लकड़ी के ठिहे, गौवंश की खाल और मांस बेचकर प्राप्त शेष ₹880 बरामद किए गए हैं।
पुलिस ने मामले में आगे की कार्रवाई शुरू कर दी हैं...