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कृष्णा लैब, कारनामे जारी....
TB और प्रेग्नेंसी दोनों जांच अलग हैं
डॉ, ने प्रेगनेंसी टेस्ट ही नहीं लिखा
बिल के लिए फर्जी जांच कर दी
एक अविवाहित को पॉजिटिव दे दिया
उस परिवार की ओर उस लड़की की हालत क्या रही होगी?
भारत में स्वास्थ्य व्यवस्था अजीब मोड में चल रही है।
जुखाम हो गया - ब्लड टेस्ट करा लो।
खांसी हो गई - ब्लड टेस्ट करा लो।
छींक आ गई - ब्लड टेस्ट करा लो।
हल्का बुखार हो गया - ब्लड टेस्ट करा लो।
ऐसा लगता है जैसे हर बीमारी का एक ही इलाज है - “ब्लड टेस्ट”।
गांव-कस्बों में तो हालत और भी खराब है।
झोलाछाप डॉक्टर बिना किसी मेडिकल ट्रेनिंग के मरीजों को लाइन से ब्लड टेस्ट लिख देते हैं। उन्हें खुद नहीं पता कि किस बीमारी में कौन-सा टेस्ट जरूरी होता है।
इनका पूरा सिस्टम बहुत सीधा है कि
मरीज आया → ब्लड सैंपल लिया → किसी जान-पहचान की लैब को भेज दिया → रिपोर्ट बना दी गई।
मरीज को कभी नहीं पता चलता कि
टेस्ट सही तरीके से हुआ भी या नहीं,
मशीनें कैलिब्रेटेड थीं या नहीं,
लैब टेक्नीशियन प्रशिक्षित था या नहीं,
रिपोर्ट असली है या सिर्फ कॉपी-पेस्ट।
लेकिन एक बात तय है ,
झोलाछाप डॉक्टर और लैब वालों का कमीशन पक्का होता है।
सबसे हैरानी की बात यह है कि देश में
हजारों पैथोलॉजी लैब चल रही हैं,
लाखों टेस्ट रोज हो रहे हैं,
लेकिन किसी मजबूत रेगुलेटरी सिस्टम से इनका ऑडिट ही नहीं होता।
ना कोई यह जांचता है कि
लैब में योग्य पैथोलॉजिस्ट है या नहीं,
मशीनें प्रमाणित हैं या नहीं,
रिपोर्ट की गुणवत्ता सही है या नहीं।
नतीजा यह है कि भारत में कई जगह इलाज डॉक्टर नहीं , बल्कि “ब्लड टेस्ट रिपोर्ट” तय कर रही है।
और जब रिपोर्ट ही संदिग्ध हो,
तो इलाज कितना सही होगा - इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं।
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राजस्थान की विश्व स्तरीय सरकारी जांच व्यवस्था अब निजीकरण के नाम से सवालों के कटघरे मे
गलत जांचरिपोर्ट के दुष्परिणाम से जनहित में हमने पहलेही अवगत कराया था
दूसरे राज्यों में निजीकरण ने पूरे स्वास्थ्य व्यवस्थाओं को धूमिल किया है
@BhajanlalBjp@GajendraKhimsar@cmo
युवा दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं
युवाओं के हित में - जनहित में - राज्य हित में जांचों के निजीकरण को वापस लो
LT की ग्रेड पे4200
पदनाम का कैबिनेट अप्रूवल
पैरामेडिकल की सीधी भर्ती (मेरिट प्लस बोनस)
स्टॉपिंग पैटर्न जैसी मांगे पूरी हो