उनकी निगाह-ए-तल्ख़ तबस्सुम में ढल गई
तज़दीद-ए-ऐतबार की सूरत निकल गई
वो मुस्कुरा के हाल मेरा पूछने लगे
ऐसा लगा कि आई हुई मौत टल गई
इक अजनबी ने उस को पुकारा था एक बार
फिर यूँ हुआ फ़कीर की क़िस्मत बदल गई
इक अधखिले कमल को जो इक आग ने छुआ
दो ज़िस्म आसमाँ में उड़े रुत बदल गई
~हरीश
कहाँ क़तरे की ग़म-ख़्वारी करे है
समुंदर है अदाकारी करे है
नहीं लम्हा भी जिस की दस्तरस में
वही सदियों की तय्यारी करे है
बड़े आदर्श हैं बातों में लेकिन
वो सारे काम बाज़ारी करे है
बुलावा आएगा चल देंगे हम भी
सफ़र की कौन तय्यारी करे है
~ वसीम बरेलवी
कोई मिलता नहीं ख़ुदा की तरह,
फिरता रहता हूँ मैं दुआ की तरह !!
है मरीज़ों में तज़्किरा मेरा,
आज़माई हुई दवा की तरह!!
हो रहीं हैं शहादतें मुझ में,
और मैं चुप हूँ कर्बला की तरह !!
जिस की ख़ातिर चराग़ बनता हूँ,
घूरता है वही हवा की तरह!!
~ फ़हमी बदायूनी
इतनी मुद्दत बा'द मिले हो
किन सोचों में गुम फिरते हो
तेज़ हवा ने मुझ से पूछा
रेत पे क्या लिखते रहते हो
काश कोई हम से भी पूछे
रात गए तक क्यूँ जागे हो
कौन सी बात है तुम में ऐसी
इतने अच्छे क्यूँ लगते हो
कहने को रहते हो दिल में
फिर भी कितने दूर खड़े हो।
#मोहसिन_नक़वी
शहर में भइया कुछ न धरा
मैं तो अपने गांव चला
साफ़ दिखाई देगा सब
आंखे मूंद के देख ज़रा
हुस्न तो दुनिया देखेगी
तू मत अपना खून जला
रांझा भी मिल जाएगा
पहले ख़ुद को हीर बना
यार बता इस दुनिया से
भरकर झोली कौन गया
सस्ता कौन खरीदेगा
और ज़रा सा दाम बढ़ा
विजेंद्र ✍️