@PracticalSpy इसमें इतनी भी बड़ी समस्या क्या है?
“रावण साहब की बहन” हैं तो सपरिवार उनके घर शिफ्ट हो सकती हैं।
सुरक्षा भी रहेगी, भरोसे का माहौल भी रहेगा — और रोज़ नई शिकायतों से प्रशासन व पड़ोसियों को भी राहत मिल जाएगी। 😄
@PracticalSpy@Nishuazad11 ये मनुवादी ही हैँ जिन्होंने देवी देवताओं को गाली देने के बाद भी सिर्फ घर खाली करने को कहा है, अगर इस्लाम के खिलाफ कुछ बोल देते ना बेटा तो सर तन से जुदा हो जाता. अगर एक बाप की औलाद हो तो एक बार बोल के देख लो?
पिछले चार दिन में उज्जैन प्रशासन ने अपनी पूरी ताकत लगा दी, लेकिन खड़े हनुमान मंदिर की प्रतिमा को टस से मस नहीं कर सके,, अब मध्य प्रदेश पुलिस के जवान और अधिकारीगण बैंड बाजे के साथ हनुमान जी को मनाने पहुंचे है। #ujjain
रूबिका लियाकत न��� स्वरा भास्कर को सीधे "जौहर" के मुद्दे पर खुली बहस की चुनौती दी है।
NRC पर हुई पुरानी बहस तो याद ही होंगी उस डि��ेट में भी स्वरा भास्कर के पास कोई तर्कों नहीं था काफी आलोचना हुई थी। अब जौहर पर चुनौती मिलने के बाद सोशल मीडिया पर फिर चर्चा तेज हो गई है।
रूबिका लियाकत ने सीधे बहस के मैदान में आने का निमंत्रण दिया है। अब देखना होगा कि स्वरा इस चुनौती को स्वीकार करती हैं या नहीं। 👀🔥
जौहर की आग बेचारगी की नहीं थी..
वह उस स्वाभिमान की आख़िरी लौ थी..
जिसने सदियों तक इस मिट्टी पर यह मानकर जीवन जिया कि शरीर नश्वर है..
लेकिन सम्मान..अस्मिता और अपनी धरती के प्रति धर्म उससे कहीं बड़ा है..
जौहर को समझने के लिए उस समय की राजपूत मानसिकता को समझना होगा..
किला घिर चुका है..
शत्रु द्वार पर है..
तलवारें टूटने लगी हैं..
किसी भी सहायता की सारी आशाएँ समाप्त ह��� चुकी हैं..
अब प्रश्न यह नहीं है कि कौन जीतेगा
प्रश्न यह है कि ��ंत कैसे होगा..
और तभी राजपूत स्त्रियाँ अग्नि के सामने खड़ी होती हैं..
माथे पर सिंदूर होता है..
हाथों में शायद आख़िरी बार अपने बच्चों का स्पर्श होता है..
लेकिन उस क्षण निर्णय भय नहीं करता..
निर्णय स्वाभिमान करता है..
वह अग्नि किसी विजय का उत्सव नहीं थी..
वह पराजय को स्वीकार कर लेने की भी अग्नि नहीं थी..
वह उस विचार की अग्नि थी कि जीवन की कीमत आत्मसम्मान से बड़ी नहीं है..
और फिर जौहर के बाद आता थ��...साका
पुरुष केसरिया धारण करते थे..
उन्हें मालूम होता था कि अब लौटकर घर नहीं आना है..
जिस घर में पत्नी, माँ और बच्चे थे, वह घर अब पीछे छूट चुका है..
जिन स्त्रियों को वे आख़िरी बार देख चुके हैं, उनके बाद अब उनके सामने केवल रण है..
किले का द्वार खुलता था..
और वे निकलते थे..
जीतने के लिए नहीं अपनी आख़िरी सांस तक लड़ने के लिए..
यही साका था..
जौहर और साका को अलग अलग समझना मुश्किल ��ै..
एक ओर स्त्रियों का यह संकल्प कि उनकी देह पर किसी विजेता का अधिकार नहीं होगा..
दूसरी ओर पुरुषों का यह संकल्प कि उनकी तलवार आख़िरी वार तक झुकेगी नहीं..
यह केवल मृत्यु की कथा नहीं है..
यह उस सभ्यता की कथा है जिसने अपने जीवन-मूल्यों में आत्मसम्मान को जीवन से ऊपर रखा..
जिस क्षण एक स्त्री अग्नि में प्रवेश कर रही थी..उसी क्षण एक पुरुष केसरिया पहनकर किले का द्वार खोल रहा था..
दोनों के सामने मृत्यु ���ी..
लेकिन दोनों के भीतर एक ही संकल्प था..
मेरी देह नष्ट हो सकती है
मेरा किला गिर सकता है
मेरा जीवन समाप्त हो सकता है
लेकिन मेरी अस्मिता, मेरा स्वाभिमान और मेरी धरती-धर्म के प्रति निष्ठा किसी विजेता की विजय की वस्तु नहीं बनेगी..
यही जौहर था
यही साका था
और शायद इसी लिए, सदियों बाद भी उन अग्नियों की लपटें इतिहास के पन्नों से बाहर निकलकर आज तक सवाल करती हैं..
क्या मृत्यु से बड़ा भी कुछ होता है?
��ाजपूत इतिहास का उत्तर था..
हाँ होता है...स्वाभिमान 🙏🏻
@Arunkr750 रेखा गुप्ता सरकार दिल्ली में दिखावे के बजाय सुशासन, विकास और जनहित को प्राथमिकता द��कर अपने काम से जवाब दे रही है।यही फर्क है नैरेटिव बनाम काम।
कभी एक दावा, कभी दूसरा बयान और फिर अचानक U-Turn!
रंग बदलने की ऐसी कला देखकर तो गिरगिट भी सोच में पड़ जाए!
वहीं रेखा गुप्ता सरकार दिल्ली में दिखावे के बजाय सुशासन, विकास और जनहित को प्राथमिकता देकर अपने काम से जवाब दे रही है।
यही फर्क है नैरेटिव बनाम काम।