The Universal Oneness Celebration in New York exemplifies an interfaith gathering where RSS Sarsanghchalak Dr. Mohan Bhagwat ji will communicate with a diverse, multicultural, and multi-faith audience. Organized in the spirit of open dialogue and mutual respect, the event reflects Bharatiya ethos which is fundamentally inclusive and welcoming to all.
This initiative is in line with longstanding tradition of engagement by Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS) with varied communities across India and the world fostering understanding and shared purpose.
We invite anyone interested in learning more about the RSS vision and philosophy to participate in these open forums of dialogue.
Universal Oneness Celebration in New York brings together people across faiths, cultures and communities in a spirit of openness, dialogue and mutual respect. RSS Sarsanghchalak Dr. Mohan Bhagwat will address this diverse gathering, reflecting a vision rooted in inclusion and shared human values. @aheadforum1@Uni1ness #UniversalOneness #RSS #MohanBhagwatInUS
वंदे मातरम् को खंडित किया देश खंडित किया। अब हमारे समाज और परिवार को खंडित करने का बीड़ा उठाया है। जन्म देने वाली भी माँ है और अन्न-जल-शिक्षा देने वाली भी माँ है। #वन्देमातरम्#VandeMataram150#vskmalwa
दोहा:
विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम्।
श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते৷৷
भावार्थ:
शास्त्रविधि से हीन, अन्नदान से रहित, बिना मन्त्रों के, बिना दक्षिणा के और बिना श्रद्धा के किए हुए यज्ञ को तामस यज्ञ कहते हैं।।
श्रीमद्भगवद्गीता
अध्याय 17
श्लोक 13
दोहा:
अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत्।
इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्৷৷
भावार्थ:
परन्तु हे अर्जुन! जो यज्ञ केवल दम्भाचरण के लिए अथवा फल को भी उद्देश्य रखकर किया जाता है, उस यज्ञ को तू राजस जान ৷৷
श्रीमद्भगवद्गीता
अध्याय 17
श्लोक 12
2/2
भावार्थ:
हे अर्जुन! जो यज्ञ शास्त्रविधि से नियत किया हुआ है तथा यज्ञ करना ही कर्तव्य है, ऐसे मन को समाधान करके, फल को न चाहने वाले पुरुषों द्वारा किया जाता है, वह यज्ञ तो सात्त्विक है।।
श्रीमद्भगवद्गीता
अध्याय 17
श्लोक 11
दोहा:
यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्।
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्৷৷
भावार्थ:
जो भोजन अधपका, रसरहित, दुर्गन्धयुक्त एवं बासी और उच्छिष्ट है तथा जो अपवित्र भी है, वह भोजन तामस पुरुष को प्रिय होता है।
श्रीमद्भगवद्गीता
अध्याय 17
श्लोक 10
2/2
भावार्थ:
कड़वे, खट्टे, लवणयुक्त, और अति गरम, तथा तीक्ष्ण, रूखे, और दाहकारक एवं दुःख, चिन्ता और रोगों को उत्पन्न करने वाले आहार अर्थात् भोजन करने के पदार्थ राजस पुरुष को प्रिय होते हैं।।
श्रीमद्भगवद्गीता
अध्याय 17
श्लोक 9
2/2
भावार्थ:
आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख और प्रीति को बढ़ाने वाले, रसयुक्त, चिकने और स्थिर रहने वाले तथा स्वभाव से ही मन को प्रिय- ऐसे आहार अर्थात् भोजन करने के पदार्थ सात्त्विक पुरुष को तो प्रिय होते हैं ৷৷
श्रीमद्भगवद्गीता
अध्याय 17
श्लोक 8
2/2
भावार्थ:
हे अर्जुन! जैसे श्रद्धा तीन प्रकार की होती है, वैसे ही भोजन भी सबको अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार तीन प्रकार का प्रिय होता है और वैसे ही यज्ञ, तप और दान भी तीन-तीन प्रकार के होते हैं; उनके इस न्यारे - न्यारे भेद को तू मुझ से सुन।
श्रीमद्भगवद्गीता
अध्याय 17
श्लोक 7
2/2
भावार्थ:
जो शरीर रूप से स्थित भूत समुदाय को अर्थात् शरीर, मन और इंद्रियादिकों के रूप में परिणत हुए आकाशादि पाँच भूतों को और अंतःकरण में स्थित मुझ अन्तर्यामी को कृश करने वाले है, उन अज्ञानियों को तू आसुरी स्वभाववाले जान।
श्रीमद्भगवद्गीता
अध्याय 17
श्लोक 6
दोहा:
अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः।
दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः৷৷
भावार्थ:
जो मनुष्य शास्त्र विधि से रहित केवल मनःकल्पित घोर तप को तपते हैं तथा दम्भ और अहंकार से युक्त एवं कामना, आसक्ति और बल के अभिमान से भी युक्त हैं।
श्रीमद्भगवद्गीता
अध्याय 17
श्लोक 5
2/2
भावार्थ:
उनमें सात्त्विक पुरुष देवों को पूजते हैं और राजस पुरुष यक्ष और राक्षसों को पूजते हैं तथा अन्य जो तामस मनुष्य हैं, वे प्रेत और भूतगणों को पूजते हैं।
श्रीमद्भगवद्गीता
अध्याय 17
श्लोक 4