राहुल,
>> इसका क्या अर्थ है: "गलती से मेरा नंबर चला गया"?
अपने आप फ़ोन नंबर चलकर हमारे पास आया था? संस्था आपको स्वयं कभी सामने से कॉल नहीं करती - पहले आपने ख़ुद वेबसाइट पर जाकर फ़ॉर्म भरा था और उस फ़ॉर्म में अनुरोध/स्वीकार किया था कि संस्था आपको कॉल करे।
और अगर आप चाहते थे कि संस्था कॉल न करे, तो वेबसाइट पर यह भी साफ़ बताया गया है कि अकाउंट कैसे डिलीट करते हैं। WhatsApp के हर संदेश पर लिखा आता है - "इन संदेशों को रोकें" (STOP Messages)। आप अपना नंबर हटा सकते थे। आप पढ़े लिखे तो होंगे? पाँच साल में ये नहीं पता चला कि अकाउंट कैसे डिलीट करना है? रोज़ सैकड़ों लोग करते हैं, बस आप ही अनूठे निकले.
>> “रोज़ कॉल और व्हाट्सएप आते हैं कि पैसे दो और कोर्स लो। ये अध्यात्म के नाम पर शुद्ध धंधा चला रहे हैं।”
भाई, तुम्हें मुफ़्त में कुछ दिया जा रहा है, और अगर तुम कुछ दो भी दोगे तो भी 50 रुपए दोगे। यही वो न्यूनतम योगदान राशि है जिस पर दो लाख छात्रों को संस्था आज गीता पढ़ा रही है। आज तक तुमने 50 रुपए के लिए किसी को बार-बार कॉल करते हुए सुना है? बड़ी-बड़ी कंपनियाँ भी पैसे बचाने के लिए ऐसा नहीं करतीं। जितना तुम दोगे, उससे कहीं ज़्यादा संस्था सिर्फ़ कॉल और WhatsApp पर तुम पर खर्च कर देती है। तुम्हें गीता से जोड़ने से पहले ही संस्था तुम पर ज़्यादा खर्च कर चुकी होती है - और इसमें हम ये तो गिनाना भी नहीं चाहते कि गीता समझने का मूल्य क्या होता है। तो फ़ोन तुमसे कुछ लेने के लिए नहीं, तुम्हें कुछ देने के लिए किया जाता है।
जो भी व्यक्ति आचार्य जी की गीता से जुड़ता है, उसे
🔸महीने के तीसों दिन या तो सत्र या तो परीक्षा उपलब्ध करवाई जाती है। प्रतिदिन।
🔸गीता के हर श्लोक को दो-दो घंटे समझाया जाता है, और हर श्लोक की रिकॉर्डिंग्स पिछले कई सालों की आपके लिए उपलब्ध हैं।
🔸सिर्फ़ गीता ही नहीं, कबीर साहेब के भजन, बौद्ध दर्शन, अष्टावक्र गीता, ऋभु गीता, लाओ त्ज़ू पर भी सत्र होते हैं।
🔸एक पूरी सोशल मीडिया ऐप आपके लिए बनाई गई है जहाँ गॉसिप नहीं, गहरी चर्चा होती है। एक सोशल मीडिया के IT system पर कितना खर्चा होता है, कुछ अंदाज़ा है? और वो आपको बिना किसी शुल्क के मिलता है।
🔸Ask AP AI आपको मुफ़्त में, हाँ मुफ़्त में, ऐसे जवाब देता है जो पिछले 25 सालों की आचार्य जी की मेहनत से निकले हैं।
🔸महीने में 15 गीता परीक्षापत्र बनाए जाते हैं, आपकी समझ को धार देने के लिए।
थोड़ा बुद्धि को ज़ोर दो, ये सब ₹50 में देना मुमकिन है? जिन्हें तुम धर्मगुरु वगैरह कहते हो, वे तुम्हें ₹50 में मिलने भी न दें, सिखाना तो दूर की बात है। इतने में तो Zomato पर एक समोसे की डिलीवरी भी नहीं आती।
और तुम कहते हो हम धंधा चला रहे हैं? अरे, ये धंधा नहीं, अहंकार के लिए बहुत बड़ा फंदा है, जो गीता से भागना चाहता है। तुम्हारा यह ट्वीट बता रहा है कि हमारा तरीका सच में कारगर है।
>> “इतनी शिद्दत से तो कोई भगवान का नाम नहीं जपता, जितनी शिद्दत से ये लोग मार्केटिंग करते हैं।”
ये भगवान का नाम भी बिना मार्केटिंग के तुम तक नहीं पहुँचा होता - पर खैर, इतना तुम नहीं समझ पाओगे। शुक्र करो कि संस्था मार्केटिंग पर खर्चा कर रही है, वरना 2 लाख से भी ज़्यादा लोग कभी गीता सुनने और परीक्षा देने नहीं आते, वो परीक्षा इंडिया बुक ऑफ़ रिकॉर्ड्स के मुताबिक़ अध्यात्म क्षेत्र में दुनिया की सबसे बड़ी परीक्षा है। अगर पहली attempt में पास कर लोगे न राहुल, तो जीवन भर के लिए गीता तुम्हें मुफ़्त में सिखाई जाएगी।
>> “अगर आपके ज्ञान में वाकई दम होता, तो आपको फोन कर-करके लोगों से भीख नहीं मांगनी पड़ती।”
उपनिषदों में दम है? यदि है, तो तुमने ख़ुद पढ़े हैं? सार्त्र, हैडेगर, विटगेंस्टीन में दम है? यदि है, तो तुमने ख़ुद पढ़े हैं? शून्यता सप्तति में दम है? यदि है, तो तुमने ख़ुद पढ़ी है?
जिस भी चीज़ में दम है, वो तुमने ख़ुद कभी नहीं पढ़ी, तुम्हें ज़बरदस्ती ही पढ़वाई गई - स्कूल से लेकर कालेज तक। अपनेआप तो सड़ा कोकशास्त्र और व्हाट्सएप साहित्य ही पढ़ा है तुमने। अपनी ज़िंदगी देखो - तुम हो किस गुमान में? तुम्हें सचमुच लगता है तुम सच और गहराई की ओर अपनेआप ही चले जाओगे? नहीं, कभी नहीं। अपनेआप तो झूठ और गंदगी ही फैलते हैं। सफाई अपने आप कभी नहीं हो जाती - उसके लिए किसी को जान लगानी पड़ती है। सच स्वयं नहीं फैलता, दार्शनिकों और ज्ञानियों को सच फैलाने के लिए अपने प्राणों की आहुति देनी पड़ती है।
फ़ोन कर कर के भीख नहीं माँगी जा रही। फ़ोन कर कर के इस दुनिया को कुछ ऐसा दिया जा रहा है जो माँगने की भी इसकी औक़ात नहीं है। एहसान समझो कि तुम्हें कॉल किया जा रहा है। वरना आज कोई नहीं है जो तुम्हें गीता का अतिशुद्धतम अर्थ समझा रहा हो, जो अपना IIT और IIM का करियर छोड़कर तीसों दिन आपको समर्पित कर रहा हो और ऊपर से इस काम के लिए खुद खर्चा कर रहा हो ताकि तुम्हें कुछ सिखा सके।
जो काम आज कोई नहीं कर रहा, वो प्रशांतअद्वैत संस्था कर रही है, चाहे वो अंधविश्वास को तोड़ने की बात हो, चाहे पशु प्रेम सिखाने की बात हो, चाहे स्त्री सशक्तिकरण की बात हो। हमारी संस्था आज इन सब में सबसे अग्रणी है।
अगर ये बात समझ नहीं आ रही तो गीता कम्युनिटी पर आइए और कुछ दिन बिताइए। आपको खुद समझ आ जाएगा, जहाँ हर कुछ मिनटों में नए-नए testimonials आते हैं, जिनमें दुनियाभर के लोग बताते हैं कि गीता मिशन से जुड़ने के बाद उनकी ज़िंदगी में क्या परिवर्तन आया और क्या लाभ हुआ।
और हाँ, हमारे पास तुम्हें किए गए सारे कॉल्स, उनकी ऑडियो रिकॉर्डिंग्स, तारीख़ और समय सहित उपलब्ध हैं। ऐसी झूठी अफ़वाहें फैलाने के कारण तुम्हारा Twitter account रिपोर्ट भी कर सकते है।
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आपके होने न होने से आचार्य प्रशांत गीता मिशन को कुछ नहीं होगा पर आपका नुकसान जरूर होगा। सच को समझें और अभी जुड़ें:
वेबसाइट: https://t.co/CbUvSIqVnu
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@Advait_Prashant
Greater Noida, Uttar Pradesh: On Mahashivratri, Philosopher and author Acharya Prashant combined knowledge, art, and spirituality through a special theatrical performance and exhibition, educating 2,000 selected participants, sharing Vedantic insights, answering questions, and demonstrating the true essence of Shivtatva while signing over 10,000 books
वैसे मुझे मौक़ापरस्त लोगों से कोई मतलब नहीं होता।
लेकिन क्योंकि इसमें मेरे शिक्षक मुझे नया जन्म देने वाले व्यक्ति @Advait_Prashant जी का ज़िक्र है, इसलिए स्वयं को लिखने से रोक नहीं पाई। बाकी लोगों से मुझे कोई लेना-देना नहीं।
मैं बताती हूँ कि लोग आचार्य प्रशांत को क्यों सुनते हैं —
🔹 क्यों सुनते हैं लोग आचार्य प्रशांत को?
•लाखों-करोड़ों छात्र ऐसे हैं, जिनके जीवन को अंधकार में जाने से आचार्य जी ने रोका है।
•मेरे जैसी लाखों महिलाएँ हैं, जिन्होंने उड़ना सीखा है; जिन्हें नया जन्म मिला है।
•लाखों जानवरों को बचाया गया है और बचाया जा रहा है।
•Climate Change जैसे गंभीर विषय पर, जहाँ भारत में खुलकर बात तक नहीं होती, वहाँ आचार्य जी इसे आम लोगों तक पहुँचा रहे हैं।
•हज़ारों लोगों के रिश्ते बेहतर हुए हैं।
•जहाँ आज का युवा वेदांत, उपनिषद, भगवद्गीता जैसे ग्रंथों से दूर भाग रहा है, वहाँ विशुद्ध अध्यात्म को युवाओं तक पहुँचाया जा रहा है।
सूची बहुत लंबी है। तू चाहें तो नीचे दिए गए लिंक पर पूरा लेख पढ़ सकता हैं।
A rigorous exposition of AP Framework: Advaita stripped of metaphysics and refined into a relentless inquiry into ego and suffering.
👉🏻 Read here: https://t.co/DXlrl8bxlC
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अब कुछ स्पष्ट बातें:
तुम्हारी पोस्ट देखकर यही लगता है कि न तो ओशो का मर्म तेरे जीवन में उतरा है, न किसी और का।
तू आज भी “Original Vichar” सुन-सुनकर अपनी ही दुकान चला रहे हैं।
ओशो ने स्वयं कहा था —
“Listen to me, but don’t follow me blindly.”
तो फिर अंधानुकरण क्यों?
और आज के सबसे Logical, समकालीन और ज्वलंत मुद्दों पर बोलने वाले व्यक्ति को “सस्ती copy” कहना क्या दर्शाता है?
क्या तुम सच में जानते हैं कि आप किसके बारे में बात कर रहे हैं?
🔹 ओशो / आचार्य प्रशांत
•ओशो के पास कम्यून था, सैकड़ों संन्यासी थे।
•कृष्णमूर्ति के पास curated halls थे, elite audience थी, और राजनीति से दूरी का luxury था।
लेकिन आचार्य प्रशांत?
•Digital battlefield में अकेले खड़े हैं। Live sessions में हज़ारों unfiltered सवाल लेते हैं।
•हर चीज़ recorded है, फिर भी 8-second clips बनाकर संदर्भ से काटकर हमला किया जाता है।
•आज का सबसे बड़ा माध्यम algorithm है, जो “feel good” wellness industry को promote करता है।
और आचार्य जी उसी industry को expose कर रहे हैं।
•बिना किसी political backing, बिना foreign buffer के — भारत की जड़ समस्याओं पर सीधी बात कर रहे हैं:
जाति, धर्म, मांसाहार-उपभोगवाद, स्त्री-स्वतंत्रता, Climate Crisis।
कोई चमत्कार नहीं।
कोई aura-chakra की कहानी नहीं।
कोई पिछले जन्म का रहस्य नहीं।
सिर्फ़ तर्क।
सिर्फ़ आज की हक़ीक़त।
@Advait_Prashant ये तो इतना सब कर रहें हैं और तुम ? तुम क्या कर रहे हो - आचार्य प्रशांत के नाम से रोटी पानी की व्यवस्था?
तू confusion फैला रहा क्योंकि तुझ में सच सुनने की हिम्मत नहीं। Free Press Journal में कपिल जोशी ने लिखा है—'The Unique Mandate: The Difficulty Of Acharya Prashant's Role' ये uniquely arduous है, कोई copy नहीं, नया युद्धक्षेत्र है। डिजिटल chaos, पहचान-प्रेरित हमले, वेलनेस इंडस्ट्री का बैकलैश, संस्था चलाने का बोझ सब झेल रहे हैं बिना समझौते।
तेरे जैसे सारे 'ओशो लवर' जो सिर्फ सुनते हैं लेकिन बदलते नहीं, लेकिन आज आचार्य जी आग बनकर इस भारतवर्ष को रोशन करने की कोशिश कर रहे कहीं तो हम पिघल जायें इसी कोशिश में।
आचार्य जी सच के बंदे हैं और सच का बंदा जंगल में शेर होता है उनकी दहाड़ तुम्हारे जैसे चमगादड़ों की नींद उड़ा रही है - सच की आग सबको जला रही है fake spirituality, neta-baba nexus, ego की दुकानें। 🔥🐕🦺💥
पढ़ ले पूरा लेख, शायद तेरी आँखें खुल जाएँ:
https://t.co/hYtKDKdfzT
#AcharyaPrashant
@sachinsgaur सचिन, या तो तुम एकदम बुद्धिहीन हो, या चतुर बनने की नाकाम कोशिश में हो!
ओशो के विचार इंटरनेट पर हैं इसीलिए आचार्य प्रशांत को सुनने की बहुत जरूरत है,— ओशो ने अध्यात्म को सेक्स, कविता और अंधविश्वास की चाशनी में लपेट दिया है और तुम चाट रहे हो और आचार्य प्रशांत तुम्हारे नशे छुड़वा रहे हैं!
सचिन, आगे सुनो -
पुनर्जन्म, कुंडलिनी साँप जैसा उठना, चक्र, पिछले जन्मों की यादें (खुद दावा: तिब्बती मॉन्क थे, तीसरी आँख से खोपड़ी फटी) — सब literal फैक्ट की तरह पेश किए थे ओशो ने
1. पुनर्जन्म = बिना प्रमाण की कहानी
अनुभव कहकर मिथक को तथ्य बना देना।
2. कुंडलिनी = काल्पनिक ऊर्जा-सर्प
प्रतीक को शारीरिक सच्चाई की तरह बेचना।
3. चक्र = शरीर में अनदेखे पावर-सेंटर
जिनका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं।
4. आभा/वाइब्रेशन = माप से परे दावे
नाप नहीं सकते, पर मानना होगा।
5. टेलीपैथी = मन पढ़ने का संकेत
परामनोविज्ञान को आध्यात्मिक संभावना कहना।
6. सिद्धियाँ = चमत्कार को ‘संभव’ छोड़ना
साफ़ इनकार नहीं, बस नैतिक चेतावनी।
7. गुरु-ऊर्जा = व्यक्तित्व को रहस्य बनाना
मनोवैज्ञानिक प्रभाव को अलौकिक रंग देना।
8. ध्यान = गुप्त आध्यात्मिक टेक्नोलॉजी
सामान्य मानसिक अभ्यास को रहस्यवादी पैकेजिंग।
9. “तर्क सीमित है” = आलोचना से बचाव
जब सवाल आए, तो बुद्धि को ही कटघरे में खड़ा कर दो।
10. ज्योतिष= "लीजिटिमेट साइंस", एनलाइटेंड मौत का समय चुन सकते हैं — प्स्यूडोसाइंस + सुपरस्टिशन।
दुनिया ओशो की तरफ क्यों आकर्षित होती है?
गोरों की भीड़, 93 रोल्स रॉयस, अमीरों का गुरु, लग्जरी कम्यून — राल टपकती है ऐसे शो-ऑफ पर। लेकिन असल वेदांत?
अब सचिन, सद्गुरु की सुन लो-
आज के युग में प्स्यूडोसाइंस और अंधविश्वास के सबसे बड़े प्रचारकों में एक ऊंचा नाम है बस!
ये आदमी हर सनातनी के मुँह पर थूक देता है ये बोलकर कि
"गीता उपनिषद क्यों पढ़ना है?
अपनी शरीर में सारा ज्ञान है!"
गुरु माने वो जो रौशनी दे
और जो रौशनी से दूर करे वो कौन हुआ फिर?
और ये परिभाषा स्वयं उपनिषद हमें देते हैं
भारतीयों की जिंदगी पर लानत है कि ऐसे आदमी के नाम के पीछे गुरु लिखा है
1. ग्रन्थ मत पढ़ना
2. मुर्दे को जिंदा कर दूंगा
3. पानी में मेमोरी है
4. ग्रहण में खाना जहर है, (कोई गोरा मरा आजतक?)
5. चुंबकीय क्षेत्र खून दिमाग में खींचता है
6. पैर इस दिशा में करके सोना
सूची बहुत लंबी है
ये कहता है कभी स्कूल नहीं गया, प्रमाण सामने है, और अनपढ़ सब ताली बजाते हैं!
समाज अगर ज़रा भी जगे हुए लोगों का होता, तो ऐसे आदमी की तस्वीर आचार्य प्रशांत के साथ रखने पर जेल हो जाती!
अब असली बात सुनो:
जिसे "सस्ती कॉपी" बोल रहे हो, वो घर-घर गीता पहुंचा रहा है आचार्य प्रशांत: सिंपल, सीधा, साफ वेदांत — बिना किसी मिलावट के।
कोई रोल्स रॉयस नहीं, कोई शो-ऑफ नहीं — सिर्फ तर्क, स्पष्टता और स्क्रिप्चर।
▪️आज 2 लाख+ लोग उनकी लाइव गीता सेशंस में रोज/रेगुलर जुड़ते हैं।
▪️कुल रीच: 10 करोड़+ लोगों के दिलों में — सोशल मीडिया पर 100M+ फॉलोअर्स, ऐप पर मिलियंस डाउनलोड्स।
▪️दुनिया का सबसे बड़ा ऑनलाइन गीता एग्जाम (वर्ल्ड रिकॉर्ड), 17 रूपों की गीता + 60+ उपनिषद पढ़ाते हैं। अंधविश्वास (पुनर्जन्म, कुंडलिनी, ज्योतिष) को सीधा काटते हैं।
ओशो/सद्गुरु की तरह कहानियाँ नहीं — "अभी, यहीं समझो, बदलो।" करोड़ों घरों तक शुद्ध वेदांत पहुंचा रहे हैं।
भाई, तुम जैसे लोग ओशो की लग्जरी और सद्गुरु की "मिस्टिक" स्टोरी पर राल टपकाते हो, लेकिन आचार्य प्रशांत जैसे सिंपल टीचर से चिढ़ते हो क्योंकि वो तुम्हारे अंदर के अहंकार और अंधभक्ति को बेनकाब करते हैं। सस्ती कॉपी नहीं, असली सुधार है।अगर हिम्मत है, तो खुद गीता पढ़ो, लाइव सेशन जॉइन करो। वरना बस ट्वीट करके लोगों को भ्रमित करो अपने echo chamber झूठ फैलाते रहो।
सुधर जाओ!
@sachinsgaur ओशो ने एक बात बोली है "जैसे हो अपनी धुन में जिओ, मस्त रहो" ,अच्छा जी, फिर तो कसाई भी मस्त और आतंकवादी भी..क्या बात है..👏
ओशो की बातों में आकर्षण है, उनके बोल में अवैज्ञानिक बाते आती हैं, जैसे पिछले जन्म, ऊर्जा-चक्र, कुंडलिनी का उठना, ये सारी बाते काल्पनिक हैं, अवैज्ञानिक हैं।
“सस्ती कॉपी” बोलने से पहले ओशो का असली माल देख ले 😂
ओशो के “ओरिजिनल विचार” क्या थे? चलो याद दिला दूँ:
• Meditation से past-life memory खुल सकती है
• आज की suffering पिछले जन्म की EMI है
• Karma = Universe का moral CBI
• Kundalini = spine में चढ़ती literal energy
• Chakras = invisible service centers
• Aura & vibrations = spiritual WiFi signal
और इतिहास भी देख — 1984 Rajneeshee bioterror attack. उनके कम्यून के वरिष्ठ अनुयायियों ने चुनाव प्रभावित करने के लिए 751 लोगों को Salmonella से बीमार किया. U.S. इतिहास का सबसे बड़ा bioterror attack. Guru-centric insulated structure कहाँ जा सकता है, इसका उदाहरण।
चैट देखनी है?
https://t.co/8ucLV1uJSV
https://t.co/zcMKXyN2LI
https://t.co/jTzaUxgI3R
https://t.co/txR5ybcKdQ
https://t.co/4ryVCPpLvM
https://t.co/fXCctloCEy
ओशो सोने वालों के लिए हैं, AP जागने के लिए हैं।
ओशो भागने वालों के लिए हैं, AP लड़ने वालों के लिए हैं।
फ़र्क समझो — कहानीकार और दार्शनिक का।
ओशो की "आध्यात्मिक विरासत" पर एक नज़र:
• 1984 bioterror attack, 751 लोग बीमार — कम्यून की सेवा भावना
• wiretapping, जासूसी, हत्या की साज़िश — ध्यान के गहरे प्रयोग
• गिरफ्तारी, डिपोर्टेशन, 21 देशों से ban — ज्ञान की वैश्विक यात्रा
• "सब Sheela ने किया" — जिम्मेदारी का आदर्श
• "भगवान" की उपाधि — विनम्रता की पराकाष्ठा
• "आत्मा गंदी होती है" — वेदान्त की गहरी समझ
• ज्योतिष "scientific" है — विज्ञान को नई दिशा
• पुनर्जन्म की कहानियाँ, past life regression — कहानीकार
अब AP की विरासत देखो:
• IIT Delhi + IIM Ahmedabad छोड़ा, Civil Services छोड़ी — सिर्फ़ वेदान्त के लिए
• AP Framework — अद्वैत वेदान्त का सबसे sharp contemporary ढांचा, हर सवाल "किसके लिए?" पर लौटता है
• 17 प्रकार की गीता, 60 प्रकार के उपनिषद पढ़ाते हैं — शास्त्र-संदर्भ और तर्क के साथ
• 2 लाख+ गीता के विद्यार्थी, दुनिया की सबसे बड़ी गीता परीक्षा आयोजित की
• PETA "Most Influential Vegan" 2022 — लाखों को veganism से जोड़ा
• Operation 2030 — climate change के ख़िलाफ़ youth movement
• IIT Delhi Alumni Award 2025 — "Outstanding Contribution to National Development"
• 70M+ YouTube subscribers — दुनिया के सबसे ज़्यादा followed आध्यात्मिक शिक्षक
• 150+ किताबें — Karma, Ananda, Maya जैसी national bestsellers
• Women empowerment, animal rights, anti-superstition — हर मोर्चे पर सक्रिय
अगर यही "ओरिजिनल सोच" है, तो हमें ऐसा व्यक्ति चाहिए जो गीता, उपनिषद और वेदान्त को तर्क और शास्त्र-संदर्भ से पढ़ाए — स्कैंडल और कहानियों से नहीं।
शास्त्र-आधारित दार्शनिक ढांचा क्या होता है, जानना हो तो:
👉 https://t.co/Zcpx6HPgMa
अगर मोहित होके सोना है तो फिर क्या ही बोलना, सो जाओ सबके बस की बात नहीं है दर्शन।
"Sasti Copy" का रट्टा लगाने से पहले ज़रा तथ्यों की Post-Mortem Report देख लो। तुम्हारी 'अंधभक्ति' का इलाज करने के लिए मैंने दुनिया के सबसे निष्पक्ष AI Models (ChatGPT & Claude) और National Media से ओशो और आचार्य प्रशांत (AP) की तुलना करवाई है।
परिणाम (Results) तुम्हारी नींद उड़ा देंगे:
1. अंधविश्वास की दुकान बनाम विज्ञान (Superstition vs Science): ओशो ने "भूत-प्रेत", "ज्योतिष" (Astrology) और "700 साल पुराने तिब्बती भिक्षु" होने के पाखंड को बेचा। AI साफ़ बता रहा है कि ओशो ने अंधविश्वास फैलाया, जबकि आचार्य प्रशांत ने उसकी सफाई की। सफाई करने वाले को कचरा फैलाने वाले की "कॉपी" कहना तुम्हारी बुद्धि का दिवालियापन है।
ChatGPT Proof: https://t.co/9xLPgHl9WX
2. दर्शन का कचरा (Philosophical Garbage): ओशो ने कहा "आत्मा गंदी हो जाती है" और "प्रेम आत्मा का आत्मा से होता है"। यह वेदांत का Basic Failure है। उपनिषद कहते हैं आत्मा नित्य शुद्ध है। ओशो को ABCD भी नहीं पता थी, और तुम उन्हें "Original" कहते हो? AP ने इस Spiritual Pollution को धोया है।
ChatGPT Proof: https://t.co/SAl80Sm39y
3. अपराधी बनाम सुधारक (Criminal vs Reformer): ओशो का 'कम्यून' (Rajneeshpuram) Bioterrorism (1984) और ड्रग्स का अड्डा था। आचार्य प्रशांत अकेले दम पर Climate Change और Environmentalism की लड़ाई लड़ रहे हैं।
ChatGPT Proof: https://t.co/KsTTc3R2fh
4. मीडिया का खुलासा (National Media Exposes Reality): Free Press Journal का यह आर्टिकल पढ़ो (अगर हिम्मत है)। यह साफ कहता है:
"Osho's teachings came saturated with superstitious and pseudoscientific claims... He promoted astrology as a legitimate science..." (ओशो ने ज्योतिष और अंधविश्वास को विज्ञान बताकर बेचा।)
इसके विपरीत, AP के बारे में मीडिया कहता है:
"Acharya Prashant stands alone... surrounded not by disciples... but by the noise of a civilisation that defends its illusions with unprecedented speed and ferocity." (आचार्य प्रशांत अकेले खड़े हैं... उस सभ्यता के शोर के खिलाफ जो अपने भ्रमों को बचाने के लिए उन पर हमला करती है।)
Read Full Article: https://t.co/ZBiAchxSiv
Osho was part of a spiritual marketplace that offered comfort, rituals and pseudo-scientific mysticism — a guru who built communes, talked of “energy fields,” auras and other mystical paraphernalia, and had institutional followers ready to defend him.
Acharya Prashant stands as the singular saboteur of this economy. He is not merely refusing to sell the product; he is dismantling the demand itself. By teaching that “feeling good” is often a trap and that the ego’s desire for peace is the disturbance, he strikes at the foundation of spiritual consumerism.
So yes, by all means, totally a copy, right? 👏🤯
If spectacle and self-inquiry look identical to you. If selling transcendence and dismantling the consumer of transcendence seem like the same thing, then you are the confused one with brain-damage.
Read here:
https://t.co/QSBeYcl0j0
Acharya Prashant operates under entirely different conditions. He is doing philosophy in a new kind of warzone, one shaped not by state surveillance or institutional control, but by digital volatility, ideological fragmentation, and an audience that is both vast and unfiltered.
Osho openly promoted astrology as science, defended the literal existence of chakras and auras, spoke of remembering past lives, and described enlightenment as producing measurable energetic fields.
https://t.co/PZHS4qWFjl
@sachinsgaur ओशो ने खुद बोला है कि वो अमीरों के गुरु है और दूसरी तरफ है आचार्य प्रशान्त जी जिन्होंने ने गरीबों का हाथ थामा है !
फरक साफ है।
इसलिए सब आचार्य प्रशांत जी को सुनते हैं।
ओशो और आचार्य प्रशांत में जमीन-आसमान का फर्क है:
ओशो: ओशो की शिक्षाएं अंधविश्वासों और छद्म-वैज्ञानिक दावों से भरी थीं। उन्होंने ज्योतिष को वैध विज्ञान बताया, पूर्वजन्म, आभामंडल, चक्रों को वास्तविक ऊर्जा केंद्र, और अटलांटिस को ऐतिहासिक सच्चाई के रूप में प्रस्तुत किया।
जबकि ओशो ने संगठित धर्म और उसके कर्मकांडों का मजाक उड़ाया, उन्होंने उन्हें अपने स्वयं के रहस्यमय विश्वासों और अनुष्ठानों के ढांचे से प्रतिस्थापित कर दिया।
आचार्य प्रशांत जी: वे इन सभी सहारों को अस्वीकार करते हैं। कोई चमत्कार नहीं, कोई पौराणिक कथाएं नहीं, कोई चक्र नहीं, कोई पूर्वजन्म नहीं, कोई दैवीय सुरक्षा नहीं। वे अंधविश्वास के प्रति निजी तौर पर कोई छूट नहीं देते — उनकी अस्वीकृति संपूर्ण और सुसंगत है।
शिक्षण को केवल अपनी सुसंगतता, अपनी प्रकाश डालने की क्षमता से काम करना होगा, या बिल्कुल नहीं।
---
अंतर: जबकि ओशो ऊर्जा संचरण और पूर्वजन्म की कहानियों से मोहित कर सकते थे, आचार्य प्रशांत इनमें से किसी भी सुरक्षात्मक परत के बिना कार्य करते हैं।"
ओशो ने अंधविश्वास को नया पैकेज दिया। आचार्य प्रशांत हर अंधविश्वास को ध्वस्त करते हैं। यही फर्क है।
पूर्ण लेख पढ़ें: https://t.co/jWNLCZDoWp
@sachinsgaur Osho को पेड़ पर चढ़ के ‘enlightenment’ मिल गया था।
आचार्य की के session में आकर ये सब बोलते तो बड़ी झाड़ पड़ती।
सारा enlightenment का भूत उतर जाता।
सही में ‘no mind’ में पहुँच जाते भाई साहब।
खैर!
😅
@sachinsgaur How Acharya prashant ji's philosophy is different and unique from all by free press journal.
https://t.co/qI2lEOc4vC
And yes , the level of superstition Spread by osho was literally insane.
Look at this 👇
https://t.co/4uGJt2LZTA
आचार्य प्रशांत को “कॉपी” कहना बेवकूफी है।
1. पद्धति का अंतर:
ओशो का मार्ग अनुभव, ध्यान-प्रयोग, प्रतीक, ऊर्जा, तंत्र आदि पर आधारित था।
आचार्य प्रशांत का कार्य तर्क, आत्म-परीक्षण और शास्त्रीय स्पष्टता पर आधारित है। वे किसी तकनीक या रहस्यवाद का सहारा नहीं लेते।
2. अंधविश्वास का प्रश्न:
ज्योतिष, पुनर्जन्म, ऊर्जा-चक्र आदि पर ओशो के कथन बहस के विषय रहे हैं।
आचार्य प्रशांत लगातार हर प्रकार की मान्यता और अंधविश्वास पर प्रश्न खड़ा करते हैं — चाहे वह धार्मिक हो या आधुनिक।
3. संरचना का अंतर:
ओशो का मॉडल कम्यून-आधारित था।
आचार्य प्रशांत का मॉडल डिजिटल, सार्वजनिक और व्यापक है — न्यूनतम योगदान पर खुला।
4. लक्ष्य:
सांत्वना देना आसान है।
भ्रम तोड़कर स्पष्टता देना कठिन।
आचार्य प्रशांत का मार्ग दूसरे प्रकार का है — इसलिए असुविधाजनक है।
व्यक्ति-पूजा या व्यक्ति-निंदा छोड़िए।
विचारों की तुलना कीजिए — विशिष्ट उद्धरण और तर्क के साथ।
How are you comparing Osho with Acharya Prashant, Uncle?
अंकल आप भी थोड़ा आचार्य प्रशांत को सुनें ताकि आपको basics of logic तो समझ में आए। इतना तो निशुल्क आचार्य जी की वीडियोज़ देख कर मुझे 15 साल में ही समझ में आ गया था (but it’s not too late for you)।
तुलना करनी है तो कीजिए, पर कम से कम तराज़ू सही रखिए।
एक तरफ़ कोई कहे कि उसे अपने पिछले जन्म याद हैं, उसने तीसरी आँख से खोपड़ी फटते देखी है, पुणे की ज़मीन में आध्यात्मिक करंट दौड़ता है, और उसके पास बैठने भर से “बुद्धफ़ील्ड” सक्रिय हो जाता है। दूसरी तरफ़ कोई कहे, “भाई, अभी जो तुम दुखी हो, पहले यह देखो कि दुख किसे है।”
फर्क़ यहीं से शुरू हो जाता है।
ओशो की बातों में कथाएँ हैं, ऊर्जा-क्षेत्र हैं, आध्यात्मिक रेज़िड्यू हैं, खोई हुई सभ्यताएँ हैं, करिश्माई दावे हैं। वहाँ एक रहस्यलोक खड़ा किया जाता है जिसमें शिष्य विस्मित होकर घूमता रहे। चमत्कार आध्यात्मिकता का विज्ञापन बन जाता है।
अच्यार्य प्रशांत उस पूरे बाज़ार को ही काट देते हैं। न कोई पिछला जन्म, न कोई गुप्त शक्ति, न कोई स्पर्श से जागरण, न कोई पवित्र भूगोल।
सिर्फ़ एक प्रश्न: “किसके लिए?”
वो ब्रह्मांड की कहानी नहीं सुनाते। वो तुम्हारी कहानी खोलते हैं। वो ‘बुद्धफ़ील्ड’ नहीं बनाते, वो ‘ईगो’ को पकड़ते हैं। वो ऊर्जा का प्रदर्शन नहीं करते, वो भ्रम का विसर्जन करते हैं।
दार्शनिक वही है जो विचार को उसकी जड़ तक ले जाए और काट दे। गुरु-नुमा व्यक्तित्व वही है जो अपने चारों ओर आभा का घेरा बना ले।
एक ने अध्यात्म को रहस्य और चमत्कार से सजाया। दूसरे ने अध्यात्म को सर्जरी बना दिया।
तय कर लीजिए, आपको सम्मोहन चाहिए या सर्जरी।
अंकल ये आपको तो समझ में आयेगा नहीं पर अगर कहीं कोई गलती से समझदार आदमी पढ़ रहा हो तो जरा ये website पढ़ लो आप: https://t.co/TngwyQYumI
ओशो का कंटेंट उपलब्ध है, तभी आज आचार्य जी को सुन रहे हैं झुन्नू..
जो लोग आचार्य जी को ओशो की कॉपी कहते हैं, वे या तो अध्यात्म को बिल्कुल नहीं समझते, या फिर लोकधर्म और पाखंड पर पड़ रही सीधी चोट से असहज हो जाते हैं।😅
Osho ने स्वयं को सत्य और enlightened घोषित किया, दीक्षा दी, नए नाम–पहचान दी और अपने व्यक्तित्व को केंद्र बना दिया। और नतीजा यह हुआ कि जिस लोकधर्म और गुरु-पूजा का वे विरोध बोलते थे, वही व्यवहार में और मज़बूत होकर खड़ी हो गई।
इसके ठीक उलट Acharya Prashant ji हैं- जो न खुद को सत्य कहते हैं, न किसी को अनुयायी बनाते हैं। वे साफ़ कहते हैं: “मुझे नहीं, वेदांत को देखो, और अपनी सभी बातों में हमशा श्री कृष्ण जी और वेदांत की बात करते हैं। वो अपनी हर बात को स्रोत खुद को नहीं बताते, और यही वजह है आज दुनिया का सबसे बड़ा आध्यात्मिक कार्यक्रम चल रहा है आचार्य जी का, जहां आचार्य जी ना सिर्फ गीता पढ़ा रहे हैं बल्कि दुनिया भर का दर्शन भी पढ़ा रहे हैं, और यही बात लोकधर्मियों को चुभती है।😀
इसलिए आचार्य जी को ओशो की कॉपी कहना अज्ञान का प्रमाण है। एक तरफ़ व्यक्ति-केंद्रित अध्यात्म है, दूसरी तरफ़ सत्य-केंद्रित वेदांत। दोनो का सामान कहना ही बता रहा है कि कहने वाले ने ना तो ओशो को ठीक से सुना है और ना आचार्य जी को।
तुझे सलाह है कि आचार्य जी को पहले पढ़ ले उसके बाद बोलना क्योंकि आचार्य जी मान ने पर नहीं जाने ने पर ज़ोर देते हैं।
Calling others a “cheap copy” doesn’t make Osho original.
Let’s speak facts.
Osho openly promoted superstition around rebirth mechanics, literal karma-phal accounting, out-of-body fantasies, and even recreational intoxication like nitrous oxide as spiritual exploration. His commune was involved in a bioterror attack in Oregon. This is documented history, not opinion.
That is not Advaita.
That is not scientific rigor.
That is spectacle wrapped as mysticism.
Advaita Vedanta is ruthless clarity about the self, not entertainment. The Upanishads dismantle ego and illusion; they do not market altered states, astral travel, or chemical “samadhi.”
Acharya Prashant works directly from the Gita and Upanishads, line by line, without myth-making, without sensationalism, and without selling transcendence through fantasy. He constantly aligns spiritual inquiry with reason, evidence, and ethical responsibility.
There is a difference between intellectual discipline and spiritual showmanship.
Read before you dismiss.
This is the essence of AP teachings:
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