@th_anonymouse मैं वो दरिया हूँ कि हर बूँद भँवर है जिसकी
तुम ने अच्छा ही किया मुझ से किनारा कर के
मुंतज़िर हूँ कि सितारों की ज़रा आँख लगे
चाँद को छत पे बुला लूँगा इशारा कर के
– राहत इंदौरी
दिल को अब तुझ से जुदा हो कर भी जीना आ गया
इस झरोके में हवा का ताज़ा झोंका आ गया
वो तो कहता था कि तुम से अच्छे सौ मिल जाएँगे
आज उसे इस हाल में देखा तो रोना आ गया
मारने वाला था अपने आप को उस रोज़ मैं
फिर मिरी आँखों के आगे उस का चेहरा आ गया
– Tahjeeb Hafi
#बज़्म#शायरांश
तेरी हर बात मोहब्बत में गवारा कर के
दिल के बाज़ार में बैठे हैं ख़सारा कर के
आते जाते हैं कई रंग मेरे चेहरे पर
लोग लेते हैं मज़ा ज़िक्र तुम्हारा कर के
मैं वो दरिया हूँ कि हर बूँद भँवर है जिस की
तुम ने अच्छा ही किया मुझ से किनारा कर के
@rahatindori
Birth Anniversary
#बज़्म
जवाँ नजरों पे कब उंगली उठाना भूल जाते हैं
पुराने लोग हैं अपना जमाना भूल जाते हैं
कोई टूटी सी कश्ती ही बगावत पर उतर आए
तो कुछ दिन को ये तूफ़ाँ सर उठाना भूल जाते हैं
जिन्हें आपस में टकराने से फुरसत नहीं मिलती
उन्हीं शाखों के पत्ते लहलहाना भूल जाते हैं
– वसीम बरेलवी
#बज़्म
हसरत है तुझे सामने बैठे कभी देखूँ
मैं तुझ से मुख़ातिब हूँ तेरा हाल भी पूछूँ
तू अश्क ही बन के मेरी आँखों में समा जा
मैं आईना देखूँ तो तेरा अक्स भी देखूँ
ऐ मेरी तमन्ना के सितारे तू कहाँ है
तू आए तो ये जिस्म शब-ए-ग़म को न सौंपूँ
– Kishwar naheed
#बज़्म#शायरांश
हर घड़ी चश्म-ए-ख़रीदार में रहने के लिए
कुछ हुनर चाहिए बाज़ार में रहने के लिए
मैं ने देखा है जो मर्दों की तरह रहते थे
मस्ख़रे बन गए दरबार में रहने के लिए
अब तो बदनामी से शोहरत का वो रिश्ता है कि लोग
नंगे हो जाते हैं अख़बार में रहने के लिए
– शकील आज़मी
#बज़्म#शायरांश
रास्ते में फिर वही पैरों का चक्कर आ गया
जनवरी गुजरा नहीं था और दिसंबर आ गया
मैनें कुछ पानी बचा रखा था अपनी आंख में
एक समंदर अपने सूखे होंठ लेकर आ गया
– राहत इंदौरी
#बज़्म#शायरांश
कभी ख़ुद पे कभी हालात पे रोना आया
बात निकली तो हर इक बात पे रोना आया
हम तो समझे थे कि हम भूल गए हैं उन को
क्या हुआ आज ये किस बात पे रोना आया
कौन रोता है किसी और की ख़ातिर ऐ दोस्त
सब को अपनी ही किसी बात पे रोना आया
– साहिर लुधियानवी
#बज़्म#शायरांश
मैं लाख कह दूँ कि आकाश हूँ ज़मीं हूँ मैं
मगर उसे तो ख़बर है कि कुछ नहीं हूँ मैं
अजीब लोग हैं मेरी तलाश में मुझ को
वहाँ पे ढूँड रहे हैं जहाँ नहीं हूँ मैं
मैं आइनों से तो मायूस लौट आया था
मगर किसी ने बताया बहुत हसीं हूँ मैं
– राहत इंदौरी
#बज़्म#शायरांश
तेरा चुप रहना मिरे ज़ेहन में क्या बैठ गया
इतनी आवाज़ें तुझे दीं कि गला बैठ गया
यूँ नहीं है कि फ़क़त मैं ही उसे चाहता हूँ
जो भी उस पेड़ की छाँव में गया बैठ गया
इतना मीठा था वो ग़ुस्से भरा लहजा मत पूछ
उस ने जिस जिस को भी जाने का कहा बैठ गया
– Tahjeeb Hafi
#बज़्म#शायरांश