जन्मदिन की बधाई देने के लिए श्री राहुल गांधी जी को बहुत-बहुत धन्यवाद!
‘सामाजिक न्याय का राज’ लाने में साथ निभानेवाले सब लोगों का स्वागत है। हमें अपनी एकता का संकल्प हर बार दोहराना है, और सांप्रदायिक ताक़तों को दबे-छिपे लाभ पहुँचानेवालों के चेहरे से परदा हटाना है।
PDA राजनीति से बहुत ऊपर उठकर देश की 95% उस आबादी के हक़-अधिकार, मान-सम्मान और ख़ुशहाली-तरक़्क़ी का आंदोलन है, जो सदियों से हर समाज में शोषित, वंचित, ग़रीब रहे हैं। ‘पीडीए’ पीड़ा के एकसूत्र से बंधे हैं और 5% परंपरागत वर्चस्ववादियों के अत्याचार व प्रभुत्व के कारण पीढ़ियों से ‘पीड़ित, दुखी, अपमानित’ रहे हैं। ‘प्रेम, दया, अपनापन’ पीडीए की एकता का मूल आधार है।
वो हर कोई पीडीए में शामिल है, जिसके पास रहम और इंसानियत भरा दिल है।
@RahulGandhi
#PDA
#सामाजिक_न्याय_का_राज
कर्बला की भयानक जंग और भीषण प्यास के बीच भी हजरत इमाम हुसैन और उनके साथियों ने नमाज़ अदा की थी, जिसे इतिहास में 'नमाज़-ए-खौफ' (युद्ध के दौरान पढ़ी जाने वाली नमाज़) कहा जाता है।मुहर्रम की 10 तारीख (आशूरा) को दोपहर के समय जब जंग अपने चरम पर थी, तब यह ऐतिहासिक नमाज़ पढ़ी गई।
दोपहर के समय इमाम हुसैन के एक वफादार साथी अबू शुमामा अल-सैदावी ने आसमान की तरफ देखा और कहा, "या मौला, जंग का वक्त है लेकिन हमारी आखिरी ज़ुहर की नमाज़ का वक्त भी हो चुका है। मेरी ख्वाहिश है कि आपके पीछे आखिरी नमाज़ पढ़कर शहीद हूँ।"
इमाम हुसैन ने मुस्कुराकर फरमाया, "तुमने नमाज़ को याद किया, अल्लाह तुम्हें नमाज़ कायम करने वालों में रखे। हाँ, यह नमाज़ का ही वक्त है।"
जब इमाम हुसैन नमाज़ के लिए खड़े हुए, तो यज़ीदी सेना ने तीरों की बौछार शुरू कर दी। नमाज़ को पूरा कराने के लिए इमाम के दो वफादार साथी—ज़ुहैर इब्न कैन और सईद इब्न अब्दुल्लाह—सामने ढाल बनकर खड़े हो गए।
उन्होंने यज़ीदी सेना को संबोधित करते हुए कहा, "ओ लोगों! जल्दबाजी न करो। ज़रा सोचो कि मैं कौन हूँ? मेरा वंश क्या है? क्या मैं तुम्हारे नबी (मुहम्मद साहब) का नवासा और अली व फातिमा का बेटा नहीं हूँ? क्या तुमने नबी का वह फरमान नहीं सुना कि मैं और मेरा भाई हसन जन्नत के नौजवानों के सरदार हैं?"
जब उनसे यज़ीद की गुलामी स्वीकार करने को कहा गया, तो उन्होंने अपना सबसे प्रसिद्ध वाक्य कहा, "मुझ जैसा (जो हक पर है) यज़ीद जैसे (जो ज़ालिम है) की बैअत (वफादारी) कभी नहीं कर सकता। ज़िल्लत (अपमान) की ज़िंदगी से इज़्ज़त की मौत बेहतर है।"
नोट:- और आज तुम ऐसी खुराफात कर रहो कि तुम्हें देखकर इब्लीस भी डर जायें.. नमाज़ रोजा अहम है ना कि ये सब खुराफात
इस्लाम ने ऐसा करने से मना किया है।
अगर तुम ऐसा करते हो तो शैतान का भाई हो। इस्लाम का मानने वालें नहीं हो सकते हो...
पूछना यह था कि "इमाम ज़ैन-उल-आबिद्दीन" , जो "इमाम हुसैन" के बेटे थे ,
और जिन्होंने "वाक़िया कर्बला" अपनी आंखों से देखा था ...
आप वाक़िया कर्बला के बाद तक़रीबन 40 साल ज़िंदा रहे , इस तरह 40 मर्तबा आपकी ज़िंदगी में 10 मुहर्रम का दिन आया ..!!
क्या आपने अपनी ज़िंदगी में एक बार भी 10 मोहर्रम को घोड़ा निकाला ..?
क्या आपने अपनी ज़िंदगी में एक बार भी 10 मोहर्रम का मातम किया ..?
क्या आपने अपनी ज़िंदगी में एक बार भी 10 मोहर्रम को अपने आप को छुरियां मारी ..?
अगर इमाम ज़ैन-उल-आबिद्दीन ने ऐसा कभी नहीं किया,
तो मेरा सवाल ये है कि, "आजकल जो लोग मुहर्रम में ऐसा करते हैं, वो कौन लोग हैं ..??"
किस के तरीक़े पर चलकर ऐसा करते हैं ..?
क्या उन लोगों को इमाम ज़ैन-उल-आबिद्दीन से भी ज़्यादा ग़म है शहादत इमाम हुसैन का ..??
कोटा के लिए निकल चुका हूँ पर दिल में दो नाम गूंज रहे हैं: उमेश और रिया।
कल, सीकर में उमेश और देहरादून में रिया - दोनों ने Re-NEET के दबाव में अपनी ज़िंदगी ख़त्म कर ली।
22 और 23 साल के बच्चे - जिन्हें सपनों के खुले आसमान में उड़ना था वो इस अन्यायी व्यवस्था से हार गए।
ये मौतें एक टूटी, भ्रष्ट व्यवस्था की देन हैं। और इसके ज़िम्मेदार हैं मोदी सरकार और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान जिन्होंने छात्रों की रक्षा करने के बजाय, बार-बार पेपर लीक, परीक्षा कुप्रबंधन, और भविष्य के सदागरों को संरक्षण दिया।
आज कोटा से हम वो लड़ाई शुरू करेंगे जिसका एक ही मक़सद है - किसी बच्चे के सपने ऐसे टूटने न पाएं, किसी माँ-बाप को फिर कभी अपने बच्चे को इस तरह खोना न पड़े।
हर परिवार की यह पीड़ा अब ‘छात्रों की गूंज’ बनकर पूरे देश में गूंजेगी।
#ChhatronKiGoonj
तक़ी उस्मानी नाम का एक आदमी ले आए हैं, इसे इस्माइल आग़ा में पेश/प्रमोट किया जा रहा है। यह आदमी हर चीज़ को शिर्क कहता है। इस आदमी की शक्ल में कोई भलाई नज़र नहीं आती, बिल्कुल काला, बे-रौनक और मनहूस है।
~ तुर्क मज़हबी स्कॉलर अहमद महमूद ओनलू
~ @RTEUrdu ❣️
चुनावी राहत खत्म, महंगाई की गर्मी तैयार!
29th April के बाद देखिए - पेट्रोल, डीज़ल, सब महंगे होंगे।
जब तेल सस्ता था, मोदी सरकार ने अपना मुनाफ़ा रखा। अब महंगा है, तो बोझ आप पर डालेगी।
सस्ते की लूट मचाती सरकार - जनता को बस महंगाई की मार।
Macron has not uttered one word of condemnation of the Israel-US war on Iran. He did not condemn Israel when it blew up fuel storage in Tehran, exposing millions to toxins. His current "concern" didn't follow Israel's attack on our gas facilities. It follows our retaliation. Sad!
मुफ़्ती @MuftiShahzadAla बरेलवी का अजमेर के राफ़्ज़ी मुजावरों" के ख़िलाफ़ सख़्त पैग़ाम यह है अजमेर के उन राफ़्ज़ी मुजावरों का असली चेहरा, जो पहले मसलक-ए-आला हज़रत के नारे से चिढ़ते थे और अब ईरान के खामनेई की मौत पर मज्लिस-ए-ताज़ियत कर के अपना रूहानी ताल्लुक़ ज़ाहिर कर रहे हैं।
Imam Darimi narrated that after the Prophet left the world, Madinah faced severe drought and famine. The people of the city came to Sayyidah 'A'ishah seeking help and advice so she instructed them to make an opening above the Beloved's grave ﷺ so there would be no barrier between him and the sky. As soon as they did this, it immediately began to rain until all the plants grew and the animals became extremely healthy, and the city rejoiced. Centuries later, a dome was built on the Masjid. The Ottomans placed a specific tile on the dome to commemorate this event.
During the time when Madinah was being attacked by Yazid, the adhan was not allowed to be said out aloud and the prayer was not allowed to be performed in the Masjid. Sa'id ibn Musayyib said, "I hid in the masjid and I would know the time for the prayer because I would hear the adhan from the resting place of the Messenger of Allah." If you went to Madinah with your heart in a state of drought, famine, loneliness and darkness, Imagine what one standing before Rasulallah ﷺ and giving salam to would do ﷺ. It would change your dunya and akhira.