Perhaps the most important discourse on the state of Hindu Samaj today & where we're collectively headed. Swami Nigrahacharya ji, true to his nature, doesn't hold back at all in this one & covers wide-ranging topics with impeccable authority. Must Watch!
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कॉकरोच जनता पार्टी Cockroach Janta Party का आन्दोलन, छात्रों का अधिकार या विदेशी षड्यन्त्र ? भारत में अपराध करने के लिए सरकार से हाथ मिलाना आवश्यक ! धर्मगुरुओं से भी नहीं है अधिक आशा - जगद्गुरु निग्रहाचार्य का दूरदर्शी विश्लेषण
(कुहासे के कारण आधे वीडियो में थोड़ा धुंधलापन है)
राम मन्दिर, भरत तिवारी, इथेनॉल और न्यायपालिका | जगद्गुरु निग्रहाचार्य ने खोल दी लोकतन्त्र की खोखली पोल। क्यों निग्रहाचार्य ने सभी मुकदमे वापस लिए ? न्याय के लिए न्यायपालिका पर आश्रित नहीं ! पुलिस प्रशासन को किस ��ात की दी चेतावनी ?
#निग्रहाचार्य #Nigrahacharya #jagadguru #राम_मन्दिर_चंदा_चोरी #शंकराचार्य
और कुत्तों ?? 😊 मज़ा आ रहा है ?? सरकारी सन्तों और उनके आराध्य नेताओं की कमाई देखकर ? जो राम को लाये हैं ... वे खूब कमाएंगे ... योगी ��ैं हनुमान् तो भैया मोदी हैं श्रीराम ! और वास्तविक श्रीराम ? वे तो आरएसएस के अनुसार इमाम - ए - हिन्द हो गए। अब मलूकपीठ, बागेश्वर धाम, रामभद्राचार्य सब अपना अपना हिस्सा बताएं 😊 हिन्दू यही "डिज़र्व" करता है।
क्यों रे धीरेन्द्र ? बागेश्वर धाम ? अब नहीं निकालेगा राम मन्दिर घोटाले से जुड़े लोगों की पर्ची ? क्यों रे @JagadguruJi ? अब तेरे मित्र @narendramodi के सपने में राजा दशरथ आकर धन्यवाद नहीं दे रहे ? श्रीराम मन्दि�� के नाम और श्रीराम की आड़ में इस देश के साथ जो विश्वासघात किया जा रहा था, हम सब उसका ही विरोध कर रहे थे, तब हमें रामद्रोही और इन कुत्तों को सन्त और सम्राट् बताया जा रहा था। क्यों रे @myogiadityanath ? मुल्लों को तो जगद्गुरुओं के साथ बैठाया था न प्रतिष्��ा वाली नौटंकी के दिन !!
#निग्रहाचार्य #Nigrahacharya #Jagadguru
सुन ! तेरे यशस्वी प्रधानमन्त्री @narendramodi ने ही रामभक्तों के हत्यारे को पद्मविभूषण दिया है और आज भी प्रत्येक वर्ष मुलायम सिंह की मृत्युतिथि पर तू चूड़ी तोड़ता हुआ रोता रहता है फेसबुक और ट्विटर पोस्ट पर। तो ये न���टंकी अपने पास ही रख। वैसे तेरे उस षडयन्त्रकारी दल्ले आशुतोष और रामभद्राचार्य के पोक्सो आरोपों का क्या हुआ ?
कुलमार्ग के अभिषेकक्रम में शाक्ताभिषेक, पूर्णाभिषेक, क्रमाभिषेक, राज्याभिषेक और पांच प्रकार के साम्राज्याभिषेक होते हैं - लघुसाम्राज्य, महासाम्राज्य, मेधासाम्राज्य, योगसाम्राज्य और दिव्यसाम्राज्य। लघुसाम्राज्य को ही सरलता में राज्याभिषेक (शासनेतर) भी कहते हैं ―
शाक्तः पूर्णः क्रमो राज्यः साम्राज्यश्चैव पञ्चधा।
लघुर्महा तथा मेधा योगो दिव्यः प्रकीर्तितः॥
(आगमान्तरे)
योगसाम्राज्य की प्रधानता दत्तोपासना में है। जैसा कि वेद भगवान् कहते हैं -
दत्त���त्रेयो महायोगी भगवान्भूतभावनः।
चतुर्भुजो महाविष्णुर्योगसाम्राज्यदीक्षितः॥
(जाबालदर्शनोपनिषत्)
यद्यपि आदिशङ्कराचार्य जी के मत में महासाम्राज्य और दिव्यसाम्राज्य को समकक्ष ही माना गया है ―
महासाम्राज्यदीक्षा च तत एवाभिजायते।
एषैव दिव्यसाम्राज्यदीक्षापि विनिगद्यते॥
कलियुग में आदिशङ्कराचार्य जी तो दिव्यसाम्राज्याभिषेक से युक्त थे ही -
कलौ युगे शङ्करो हि दिव्यसाम्राज्यदीक्षितः।
उनके मत में गृहस्थावधूत ���ी कुलमार्ग के अनुसार बिन्दुत्रितय का पूजन करते हुए प्राजापत्य ब्रह्मचर्य की मर्यादा के अनुरूप दिव्यसाम्राज्य से युक्त हो सकते हैं, यथा -
स्थित्यर्चने गृहस्थस्तु बिन्दुत्रितयपूजकः।
प्रथमस्तत्र सोऽस्त्येव द्वितीया सहधर्मिणी॥
तृतीयश्चक्रराट् प्रोक्त ऐक्यमेषां विभावयेत्।
अनुस्वारो विसर्गश्च बिन्दुत्रयमुदाहृतम्॥
एवं क्रमात्पञ्चतत्त्वमनस्तत्त्वजयो भवेत्।
अहन्तत्त्वजयं ल���्ध्वा दिव्यसाम्राज्यदीक्षितः॥
गृहस्थ��� स्थित्यर्चना क्रम को तीन बिन्दुओं में पूजेगा। प्रथम तो वह स्वयं ही है, दूसरा बिन्दु उसकी अपनी पत्नी और तीसरा बिन्दु चक्रराज ही है। इनमें ऐक्यता की भावना करें। अनुस्वार का एक (ं) और विसर्ग के दो (:) यही बिन्दुत्रय है। प्राजापत्य ब्रह्मचर्य के विषय में वेद-पुराण कहते हैं कि विहित तिथि में मासमात्र में केवल एक बार स्वाधिकृता पत्नी से ही संसर्ग करने वाला गृहस्थ प्राजापत्य ब्रह्मचारी कहाता है -
ब्रह्मचारिवनस्थानां भिक्षुकाणां द्विजोत्तमाः।
साधारणं ब्रह्मचर्यं प्रोवाच कमलोद्भवः॥
ऋतुकालाभिगामित्वं स्वदारेषु न चान्यतः।
पर्ववर्जं गृहस्थस्य ब्रह्मचर्यमुदाहृतम्॥
(कूर्मपुराणे पूर्वभागे)
प्राजापत्यं च सावित्रं ब्राह्मं नैष्ठिकमेव च।
चतुर्विधं ब्रह्मचर्यं तत्रैकं शक्तितः श्रयेत्॥
(स्कन्दपुराणे वैष्णवखण्डे)
स्वदारनिरत ऋतुकालाभिगामी सदा परदारवर्जी प्राजापत्यः ���
(आश्रमोपनिषदि)
चतुर्विध ब्रह्मचर्य का प��लन करने वाले साधक ब्रह्मचिन्तनद्योतक महावाक्यों के अनुसरण में भी प्रवृत्त होते हैं।
दिव्यसाम्राज्यसंयुक्तो ब्रह्मरूपः सनातनः।
प्राप्यते चेन्महाभाग्यं साधकस्यात्र निश्चितम् ॥
(शक्तिसङ्गमतन्त्रे ताराखण्डे)
दिव्य साम्राज्य दीक्षा से संयुक्त साधक सनातन ब्रह्मस्वरूप है, यदि वह प्राप्त हो जाए तो साधक का भाग्य निश्चित रूप से जाग गया, ऐसा समझे ॥
दिव्यसाम्राज्यदीक्षा तु ताराविद्य���प्रगोचरा।
ऊर्ध्वाम्नायेश्वरी देवि महोग्रातारिणी स्मृता॥
(शक्तिसङ्गमतन्त्रे छिन्नमस्ताखण्डे)
दिव्यसाम्राज्यदीक्षा तारा विद्या से प्राप्त होती है। हे देवि ! ऊर्ध्वाम्नाय की ईश्वरी 'महोग्रातारिणी' कही गई है। आज श्रीतारापीठ महाश्मशान में श्रीमज्जगद्गुरु निग्रहाचार्य श्रीभागवतानन्द गुरुजी का दिव्यसाम्राज्याभिषेक परिपूर्ण हुआ।
#निग्रहाचार्य #Nigrahacharya #Jagadguru
गोमांस खाने वाली कंगना को भक्तिमती मीराबाई और वीराङ्गना लक्ष्मीबाई के समान बताने वाले आदित्यनाथ की बुद्धि भ्रष्ट है - जगद्गुरु निग्रहाचार्य
#निग्रहाचार्य#Nigrahacharya#Yogi_Aditynath
पुरुष यदि अपनी वासना पर नियन्त्रण कर लें अथवा कम से कम अपनी पत्नी के ही प्रति निष्ठावान् बने रहें तो भारत की 80% कॉरपोरेट नौकरी और राजनीति वाली स्त्रियों की पदोन्नति एवं सशक्तिकरण खतरे में पड़ जायेगा। स्त्रियां यदि अपने पति के प्रति निष्ठा रखने लगें और अपने कर्तव्य को समझें तो भारत के 80% पुलिसकर्मी और जजों की करोड़ों की अय्याशी पर संकट आ जायेगा। इसीलिए कानून और न्यायपालिका यह चाहती है कि देश के पति पत्नी तो आपस में खूब लड़ें पर समाज में सैकड़ों बार अवैध सम्बन्ध बनाएं। विशेषकर हिन्दुओं को विवाह न करने और सङ्ख्या घटाकर म��ने हेतु विवश करने के षड्यन्त्र के साथ व्यभिचारसमर्थक न्यायपालिका ने भारत को एक मनोरोगी, यौनरोगी और आपराधिक देश बना दिया है। ऐसी असामाजिक संस्था का विनाश स्वस्थ समाज हेतु अनिवार्य है।
― जगद्गुरु निग्रहाचार्य श्रीभागवतानन्द गुरुजी
#निग्रहाचार्य #Nigrahacharya #Jagadguru
ईसाई और मुसलमानों के समर्थक एवं देवनिन्दक पाखण्डियों को बुला काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में सोमनाथ पर्व के ढोंग पर भड़के जगद्गुरु #निग्रहाचार्य | ऐसे आयोजनों में जाने के कारण जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामी वासुदेवाचार्य पर व्यक्त किया आक्रोश ! #Jagadguru#Nigrahacharya
सूचना - चलचित्र में हमने श्वेत काष्ठ चन्दन लगाया है, हल्दी मिश���रित तो दूर से सूर्य के प्र��ाश में स्पष्ट रंग नहीं दिख रहा। उक्त कार्यक्रम में आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण भी थे जिसका संज्ञान वक्तव्य की रिकॉर्डिंग के समय हमें नहीं था अतः उल्लेख छूट गया।
संसद, न्यायपालिका और नौकरशाही में चरित्रहीन नशेड़ी भरे हैं, उनका बन��या कानून भारत को अन्धकार में ले जाएगा। लोकतन्त्र भारत के हित में नहीं है ― जगद्गुरु निग्रहाचार्य
#Jagadguru #निग्रहाचार्य #Nigrahacharya
कैसे संविधान का कानून ही योग्य ���ोगों को उचित कार्य करने से रोकता है ? न्यायपालिका से न्याय की अपेक्षा छोड़ दे हिन्दू – जगद्गुरु निग्रहाचार्य
#jagadguru #Nigrahacharya #निग्रहाचार्य
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बहुधा सनातन धर्म के अनेक प्रसिद्ध मठाधीश एवं जगद्गुरु व्यक्तिगत एवं एकान्त में हमसे यह प्रश्न करते हैं कि उनका चित्त शुद्ध नहीं रह पाता। हम उन्हें उनके सम्प्रदायोक्त आराधना की मर्यादा में कुछ परामर्श अवश्य प्रदान करते हैं किन्तु ��ार्वजनिक रूप से भी कुछ चिन्तन प्रस्तुत करेंगे। हमने अनेक मञ्चों पर इस तथ्य को स्पष्ट किया है कि धर्मगुरुओं के मतिविभ्रम का एक प्रमुख कारण अन्नदोष है। अपने मठ को सर्वाधिक भौतिक सुख सुविधाओं से युक्त क��ने की महत्त्वाकाङ्क्षा, स्वयं को बड़े बड़े उद्योगपति एवं नेताओं के साथ उठने बैठने वाला दिखाकर समाज को आकर्षित करने की लोकैषणा एवं अपने सम्प्रदायोक्त सदाचार के प्रति निष्ठा के अभाव के कारण मठाधीशों के जीवन में भय, लोभ, अज्ञान एवं मात्सर्य की भावना अनियन्त्रित रूप से बढ़ती जा रही है।
मात्र किसी सम्प्रदाय के मठ का अधिपति बन जाना, अथवा किसी मठाधीश का कृपापात्र बनकर व्यासपीठ पर बैठ जाना, अथव�� किसी सेठ, मीडिया, नेता की अनुकम्पा पर बड़े मञ्च पर स्थान मिलने मात्र से किसी व्यक्ति में धर्मोपदेश का सामर्थ्य और विवेक भी आ जायेगा, यह इस कलिकाल में वन्ध्यापुत्र के विवाह के समान असम्भाव्य है। शास्त्र स्पष्ट कहते हैं -
पुराणन्यायमीमांसाधर्मशास्त्रार्थचिन्तकाः।
सदाचारपरा ये वै तदुक्तं यत्नतश्चरेत्॥
(शारदापुराणे)
पुराण, न्याय, मीमांसा और स्मृति��ों के शास्त्रीय अर्थ का चिन्तन करते हुए जो स्वयं भी उस सदाचार का पालन करते हैं, ऐसे धर्मज्ञ जनों के निर्देश का अनुसरण समाज को प्रयत्नपूर्वक करना चाहिए। एक ओर आप स्वयं को जगद्गुरु कहेंगे और फिर उस कर्त्तव्य का स्वयं ही पालन नहीं करेंगे तो समाज की दिशा और दशा क्या होगी ? जगद्गुरु कौन है ?
जगतः परमहितोपदेष्टृत्वाज्जगद्गुरुः॥
(प्रणवकल्पप्रकाशे)
संसार को उसके परम कल्याण का उपदेश करने वाले जग���्गुरु हैं।
प्रत्ययाष्टाङ्गवादेन कामार्थाभिहतान्नृपान्।
शनैर्धर्मे नियुञ्जीत ज्ञानयोगे पुनः क्रमात्॥
एवं यः सर्वयत्नेन राजानं बोधयेद्बुधः।
जगद्गुरुस्सविज्ञेयस्सर्वलोकानुकम्पनः॥
(शिवधर्मोत्तरपुराणे प्रथमाध्याये)
मन्त्र, औषधि, निधि आदि धर्ममार्गावतार अष्टविध नीतियों का प्रयोग करके अर्थ-काम में फंसे विलासी राजाओं को भी सभी प्राणियों पर कृपा करने की भावना से मार्गदर्शन देकर धीरे धीरे उसे धर्म और ज्ञान के प्रति प्रेरित करने वाले को जगद्गुरु कहा जाता है।
आज स्वयं को धनबल और सत्ताबल के चरणों में निवेदित करने वाले अशास्त्रविहित जीवन से युक्त मठाधीश क्या जगद्गुरु शब्द की शास्त्रीय परिभाषा में स्वयं को व्यवस्थित देखते हैं ? शास्त्रों में नादबिन्दु भेद से दो प्रकार के वंश बताये गये हैं।
वंशो द्विधा विद्यया जन्मना च।
(सिद्धान्तकौमुद्याम्)
विद्यया जन्मना वा प्राणिनामेकलक्षणसंतानो वंश इत्यभिधीयते।
(काशिकावृत्तिः)
विद्या एवं जन्म, दो माध्यमों से वंश का निरूपण किया जाता है। विद्यावंश का जनक गुरु है, जन्मवंश का जनक पिता है। अतः वेद भगवान् श्रीगुरुमुख से शिष्य के लिए अनुशासन कहते हैं -
यान्यनवद्यानि कर्माणि तानि सेवितव्यानि। नो इतराणि॥ यान्यस्माकं सुचरितानि तानि त्वयोपास्यानि। नो इतराणि॥
(��ैत्तिरीयोपनिषदि)
हे शिष्य ! तुम हमारे शास्त्रोक्त एवं निष्पाप चरित्र एवं कर्म का ही सेवन करना, अनिन्द्य का ही अनुसरण करना, अन्य का नहीं। वेद की इसी मर्यादा का उपदेश महर्षि विश्वामित्र भी अपने पुत्र देवरात को करते हैं -
वेदे शिष्याः प्रबोध्यन्ते गुरुणा स्वयमेव हि।
यानि सुचरितान्येव ह्यस्माकं शृणु पुत्रकाः॥
तान्येव समुपास्यानि नेतराणि कदाचन।
यतो नरो बहुज्ञोऽपि न सर्वज्ञ इति स्थितिः॥
अल्पज्ञत्वात्प्रमादाद्व�� कदाचाररतो भवेत्।
तेजीयांसः समर्था ये तेषां दिव्यं हि जीवनम् ॥
नानुकर्तुं हि तच्छक्यं मनुजैरल्पशक्तिभिः।
विषदिग्धं पूतनायाः पपौ स्तन्यं जनार्दनः ॥
मुञ्जाटवीदवाग्निञ्च शिवो हालाहलं विषम्।
अल्पशक्तिर्नरस्तस्मान्न देवचरितं चरेत्॥
(कौशिकरामायणे)
वेद में गुरु शिष्य को सर्वप्रथम स्वयं यही उपदेश देते हैं कि हे पुत्र ! सुनो, हमारे जो वेदानुमोदित अच्छे आचरण हों, उनका ही तुम अनुकरण करना, अन्य का नहीं क्योंकि मनुष्य बहुत कुछ का ज्ञाता होता हुआ भी सर्वज्ञ तो नहीं होता, यह बात स्पष्ट है। इसलिए अल्पज्ञ होने के कारण अथवा प्रमादवश मनुष्य अधर्म के आचरण में रत हो सकता है। जो तेजस्वी और समर्थ होते हैं उनका जीवन दिव्य कोटि का होता है, अल्पशक्ति वाला साधारण मनुष्य उनके दिव्य आचरणों की नकल नहीं कर सकता। भगवान् श्रीकृष्ण ने पूतना का विषाक्त स्तनपान किया और मुञ्जवन में लगी अग्नि का भी पान किया । भगवान् शिव ने हालाहल विष का पान किया, क्योंकि वे समर्थ थे। इसलिए अल्पशक्ति वाले मनुष्य को देवताओं के आचरण का अनुकरण नहीं करना चाहिए।
शास्त्रीय धर्मनिष्ठ हिन्दू ≠ धर्मद्रोही सरकारी श्वान
"मैं राम-कृष्ण" आदि को नहीं मानूंगा", "हिन्दू धर्म भारत के लिए खतरा है", "राम कौसल्या की अवैध सन्तान है", जैसी दण्डनीय बातों को बोलने लिखन��� वाले धर्मद्रोही भीमराव अम्बेडकर को जन्मदिन की बधाई देने हेतु हिन्दुओं के बड़े बड़े कथित आदर्श सन्त, शिक्षक नेता लगे हुए हैं। अम्बेडकरवादी नित्य सनातनी उत्सव और देवताओं को गाली देते रहें, भगवती दुर्गा को वेश्या तक बोल दें लेकिन उसी रामद्रोही अम्बेडकर के तलवे चाटने में "श्रीराममन्दिर' का कोषाध्यक्ष गोविन्ददेव कोई कमी नहीं करता। "रामानन्दाचार्य" विश्वविद्यालय वाला मदनमोहन झा और "रामभक���त" बनने का दावा करने वाला ढोंगी धीरेन्द्र शास्त्री, देवकीनन्दन और आदित्यनाथ, कितने नाम गिनाऊँ ? ��े सब हिन्दू नहीं, सरकारी श्वान हैं ! जबकि निकटवर्ती दिनों में ही धर्मनिष्ठ श्री राणा सांगा और श्री आर्यभट आदि के सम्मान में इन म्लेच्छों के मुख से अभिनन्दन नहीं निकला। हिन्दुओं ! अम्बेडकर, पेरियार, फुले आदि का समर्थक कोई भी व्यक्ति हिन्दू नहीं ! समाज में जिनकी योग्यता और उपयोगिता "सैनेटरी पैड" जितनी भी नहीं, वे भी इस देश के कुलपति, महामण्डलेश्वर, जगद्गुरु, मुख्यमन्त्री, प्रधानमन्त्री, न्याया���ीश आदि बनने का दावा करते हैं।
― श्रीमज्जगद्गुरु निग्रहाचार्य स्वामिश्री श्रीभागवतानन्द गुरु
A Classical, Devout Hindu ≠ A Traitorous Government Lapdog
Prominent figures among Hindus—so-called ideal saints, educators, and leaders—are currently vying to offer birthday greetings to the apostate Bhimrao Ambedkar; the very man who spoke and wrote punishable blasphemies such as, "I will not believe in Ram, Krishna, etc.," "Hinduism poses a threat to India," and "Ram was the illegitimate son of Kaushalya." Ambedkarites may ceaselessly hurl abuse at Sanatani festivals and deities—going so far as to label Goddess Durga a harlot—yet Govind Dev, the Treasurer of the 'Shri Ram Temple' Trust, spares no effort in groveling at the feet of that very anti-Ram figure, Ambedkar. Madan Mohan Jha of the "Ramanandacharya" University; the charlatan Dhirendra Shastri, who claims to be a "devotee of Ram"; Devakinandan; and Adityanath—how many names must I list? None of these are Hindus; they are merely government lapdogs! Yet, in recent days, not a single word of tribute or respect for devout figures like Shri Rana Sanga or Shri Aryabhata has escaped the lips of these *Mlecchas* (barbarians). O Hindus! Any individual who supports the likes of Ambedkar, Periyar, or Phule is *not* a Hindu! Those whose merit and utility to society amount to less than that of a sanitary pad nonetheless presume to lay claim to the offices of Vice-Chancellor, Mahamandaleshwar, Jagadguru, Chief Minister, Prime Minister, and Judge in this country.
― Shrimajjagadguru Nigrahacharya Swamishri Shri Bhagavatananda Guru
#निग्रहाचार्य #Nigrahacharya #आर्यभट्ट #जयभीम #जगद्गुरु #jagadguru #अंबेडकर_जयंती
स्वयं को हिन्दू मानने वाले लोगों के द्वारा धर्मद्रोही अम्बेडकर को नमन करने और बधाई देने की मूर्खता के आलोक में जगद्गुरु निग्रहाचार्य के दो वर्ष प्राचीन वक्तव्य का एक अंश पुनः प्रकाशित ! अम्बेडकर, पेरियार, फुले आदि का समर्थक कोई भी व्यक्ति हिन्दू नहीं !
#निग्रहाचार्य #Nigrahacharya #अंबेडकर_जयंती
ईसा मसीह का जैसा चित्रण भविष्य पुराण में प्राप्त होता है, उसमें न तो उन्हें सनातनी समाज हेतु अनुकरणीय बताया गया है और न ही किसी सनातनी देवता का अवतार। मात्र भारत की पश्चिमी सीमा में महाराज शालिवाहन से एक लघु वार्ता का वर्णन उपलब्ध है। जॉन मूअर, हेनरी ऑलकट, मैकाले, मैक्समूलर, रुडोल्फ, बुल्के, पेरियार, ब्लावट्स्की, सेरामपुर ट्रियो आदि ने भारत को ईसाई बनाने का जो स्वप्न देखा था, जिसे साकार करने हेतु राममोहन, दयानन्द, विवेकानन्द, योगानन्द आदि लगे रहे, आधुनिक काल में भी अभयचरण (प्रभुपाद), कृपालु, रविशंकर, जग्गी वासुदेव, श्रीरामशर्मा जैसे लोग कृष्ण और ईसा को समान बताकर हिन्दुओं को भ्रमित करते रहे, उसी कड़ी में जाने अनजाने अब मान्य परम्पराओं के धर्मगुरु भी फंसते जा रहे हैं। कई शताब्दियों से ईसा को भारत का निकटवर्ती सिद्ध करने का षड्यन्त्र मिशनरियों ने चला रखा है। ईसाइयों ने प्रत्येक देश और सभ्यता हेतु ईसा मसीह के काल्पनिक प्रारूप बनाकर फैलाये हैं। जापानी ईसा, चीनी ईसा, अमेरिकी ईसा, रूसी ईसा, अफ्रीकी ईसा आदि। भारत में तो चतुर्भुज शेषशायी एवं त्रिशूलधारी ईसा भी बना दिया है। एडिटेड एवं काल्पनिक चित्र दिखाकर कभी पुरी के शङ्कराचार्य को भ्रमित किया जाता है कि रोम में वैष्णव ईसा की ऊर्ध्वपुण्ड्रधारी प्रतिमा मिली है तो कभी सङ्घ के ईसाई मञ्च के प्रभाव में राजेन्द्रदास जैसे लोग व्यासपीठ से ईसा की कथित क्षमाशीलता का गुणगान करते रहते ���ैं। एक बार भारतीयों के मन में यह बैठ जाये कि ईसा भारत के थे अथवा भारत से अभिन्न सम्बन्ध है तो ईसाइयों की अनियन्त्रित घुसपैठ सनातन में होगी और फिर धर्मान्तरण रोकना दुष्कर होगा। ध्यातव्य है कि 1988 ई० में की गयी कार्बन डेटिंग यह बताती है कि Shroud of Turin लगभग तेरहवीं शताब्दी का है, जिससे स्पष्ट है कि यह वस्त्र ईसा मसीह का समकालीन नहीं है अतः ईसा को भारत, गोवर्द्धन मठ, कश्मीर आदि से सम्बन्धित बताने वाले या तो सुधार करें या चुप रहना सीखें !
― जगद्गुरु निग्रहाचार्य श्रीभागवतानन्द गुरु
The portrayal of Jesus Christ found in the Bhavishya Purana neither portrays him as an example for the Sanatani society nor as the incarnation of any Sanatani deity. Only a brief conversation with Maharaja Shalivahan on Bharat's western border is available. John Muir, Henry Olcott, Macaulay, Max Muller, Rudolf, Bulke, Periyar, Blavatsky, the Serampore Trio, and others dreamed of converting Bharat to Christianity, a dream that Rammohan, Dayananda, Vivekananda, Yogananda, and others worked to realize. Even in modern times, figures like Abhaycharan (Prabhupada), Kripalu, Ravi Shankar, Jaggi Vasudev, and Shriram Sharma continue to mislead Hindus by equating Krishna and Jesus. Now, even religious leaders of accepted traditions are becoming entangled, knowingly or unknowingly, in this same chain. For centuries, missionaries have perpetuated a conspiracy to portray Jesus as a relative of India. Christians have created and spread imaginary versions of Jesus Christ for every country and civilization. Japanese Jesus, Chinese Jesus, American Jesus, Russian Jesus, African Jesus, etc. In Bharat, they have even created a four-armed, Shesha-sleeping like figure and a trident-bearing Jesus. Edited and fictional images are sometimes used to mislead Shankaracharya of Puri, claiming that a statue of a Vaishnavite Jesus with an upright posture was found in Rome. Sometimes, under the influence of the Sangh's Christian forum, people like Rajendra Das extol Jesus's supposed forgiveness from the pulpit. Once Indians are convinced that Jesus was from India or had an inseparable connection with Bharat, unchecked Christian infiltration into Sanatan Dharma will occur, and conversions will be difficult to prevent. It is noteworthy that carbon dating conducted in 1988 indicates that the Shroud of Turin dates back to approximately the thirteenth century, making it clear that this shroud is not contemporary to Jesus Christ. Therefore, those who claim Jesus was associated with India, the Govardhan Monastery, Kashmir, etc. should either reform themselves or learn to remain silent!
―Jagadguru Nigrahacharya Shri Bhagavatananda Guru
#निग्रहाचार्य #Nigrahacharya #Jagadguru #Jesus #Christ
म्लेच्छराज बढ़ा रहा है अपनी शक्तियां ! हिंसा, बलात्कार और पाखण्ड का आश्रय ! धर्म की रक्षा हेतु जगद्गुरु निग्रहाचार्य करेंगे म्लेच्छयज्ञ ! 21,000 वर्ष पूर्व म्लेच्छयज्ञ करने ��ाले महाराज प्रद्योत एवं पिछले म्लेच्छराज "आम्राट" को मारने वाले महाराज गोपालवर्मा की नीतियों के अनुसार प्रशिक्षण लेकर चातुर्वर्ण्य सनातनी कैसे करेंगे सहयोग ?
#निग्रहाचार्य #Nigrahacharya #म्लेच्छराज
सन्दर्भ तो समझ ही गये होंगे ! मुख्य बात, वह सन्तों का मंच नहीं था। संघ-भाजपा की कई अवैध सन्तानें वहां धर्माचार्य का चोला ओढ़कर अपने बाप की चापलूसी में बैठी थीं। चर्चा निकली भाजपा के देशद्रोही दोगलेपन और आतंकवादी संस्था UGC के नीचतापूर्ण अत्याचारों पर। बस, उसमें कुछ ने उत्तराधिकार में अधिक मांग लिया तो बाकी भड़क गए, इससे अधिक कुछ नहीं अतः गुलामों को सन्त न कहा जाए। ऋतम्भरा, उमा भारती वैसे वर्णाश्रमविरोधियों को भगवा पहनकर साध्वी बनाने और व्यासपीठ को विकृत करने के समय मठाधीशों ने यदि विरोध किया होगा तो धर्म की यह दुर्गति नहीं होती। साढ़े तीन वर्ष पूर्व जब मैंने ऋतम्भरा को फट्कारा था तो लोग मुझे सन्तनिन्दक और वामपन्थी बोलने लगे थे ! बोलते रहो, ढोंगियों को सन्त बोलोगे तो वे सन्त नहीं हो जायेंगे।
Old Video Reuploaded
Original Dated - 9th November, 2022
ऋतम्भरा के वक्तव्य पर हमने जो आपत्ति की थी, उसके कारण मन्दसौर के संघ पदाधिकारी मुझसे क्रोधित हो गए। मेरे विष्णुपुराणप्रवचन में आयोजकों के बुलाने पर भी अधिकतर लोग नहीं आए। उन्हें हिन्दू मान���र बुलाया गया था, वे किस संस्था से हैं, इसके आधार पर नहीं। किन्तु प्रतीत हुआ कि उन लोगों के लिए उनकी पहली पहचान आरएसएस और दूसरी पहचान हिन्दू होना है। ऐसे लोग वस्तुतः भगवान् की दिव्य कथा के पात्र सम्भवतः नहीं होंगे, अन्यथा कथा का निमन्त्रण मिलने पर व्यक्ति धर्म देखता है, संस्था नहीं। मुझसे एक व्यक्ति ने आकर कहा कि संघ के लोग बहुत नाराज़ हैं आपसे, बात दिल्ली तक पहुंच गयी है। मैंने कहा, तुम बात को जापान तक पहुंचा दो, उससे हमें क्या ? अयोध्या के कारसेवकों ने अपने भगवान् श्रीराम के लिए प्राण त्यागे थे या इमाम-ए-हिन्द के लिए ? सौ वर्ष प्राचीन एनजीओ हमें धर्म सिखा रही है ? संस्था को धर्म के अनुसार होना है, धर्म संस्था के अनुसार नहीं होता।
#निग्रहाचार्य #Nigrahacharya #शंकराचार्य #UGC_काला_कानून_वापस_लो #UGC_Exposed
धर्म ही वृषभ के रूप में हैं एवं वसुन्धरा ही गौ के रूप में अभिव्यक्त होती है। गौ एवं धर्म एक दूसरे के अनन्य हैं। शिवशक्तिस्वरूप ही धर्म एवं गौ के रूप में प्रत्यक्ष है। हम गाय को नहीं प��लते, गाय हमें पालती है। सम्पूर्ण विश्व के मनुष्य, देवता, पितृ, असुर, ऋषि, पशु और तिर्यक् प्रजा को अभीष्ट पोषण प्रदान करने हेतु पृथ्वीदेवी ने गौ का ही रूप धारण किया है। गौ की सेवा समस्त कल्याण का मूल है। गौ का तिरस्कार समस्त शुभ का विनाशक है। गौ की सेवा मानवमात्र का परमधर्म है। समस्त ज्ञाताज्ञात अरिष्टों का निवारण नैष्ठिक गोव्रती की सेवा साधना से होना शास्त्रसिद्ध तथ्य है। यज्ञ, दान, तीर्थ एवं व्रत में असमर्थ व्यक्ति भी गौसेवा से समस्त पुण्यों को प्राप्त कर लेता है। गौ का स्पर्श करके, उनकी परिक्रमा करने वाले सप्तद्वीपार्णववती पृथ्वी की परिक्रमा क�� फल प्राप्त करता है।
गामालभ्य नमस्कृत्य कृत्वा चैव प्रदक्षिणम्।
प्रदक्षिणी कृता तेन सप्तद्वीपा वसुन्धरा॥
गौमाता की सेवा, पूजा, रक्षा करने वाले पूर्वजों के महनीय संस्कार के अनुसार समस्त सनातनी सज्जनों के लिए भारत के विभिन्न संस्थानों में बैठे नरपिशाचों को गौहत्या का समर्थन या प्रत्यक्ष/परोक्ष धनार्जन के दोष के कारण देशद्रोही समझना चाहिए एवं उनके साथ वैसा ही व्यवहार करना चाहिये। घ�� के बछड़े, बूढ़ी और अस्वस्थ गौ को कसाई के हाथों बेचने वाले अधम हिन्दुओं के साथ भी दण्ड का व्यवहार होना चाहिए। गोरक्षा के नाम पर कपट करके तस्करों के साथ मिलने वालों को तथा गौमाता की शुद्ध प्रजाति को कृत्रिम गर्भाधान से दूषित करने वालों को भी मृत्युदण्ड मिलना चाहिए। गौरक्षा में बाधा बनने वाले प्रत्येक सरकारी / गैरसरकारी संस्थान, विभाग, मन्त्रालय, न्यायपालिका, संसद अथवा व्यक्ति के जीवनाधिकार का उन्��ूलन होना चाहिए। गौमाता की सेवा एवं रक्षा में तत्पर निष्कपट सज्जनों को हमारा सहयोग/अभिनन्दन/आशीर्वाद सदैव है।
― निग्रहाचार्य श्रीभागवतानंद गुरु
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