उत्कलप्रान्त में सन्निहित श्रीजगन्नाथपुरी श्रीजगन्नाथ-धाम है।
इस ऐतिह्य तथ्य की अन्यत्र उद्भावना सर्वथा अनुचित है।
- निश्चलानन्द सरस्वती (श्रीमज्जगद्गुरु-शङ्कराचार्य पुरीपीठ)
@ANI@CMO_Odisha@MamataOfficial
विवाह पञ्चमी की शुभकामनाएं🚩
तुलसीदास जी ने सुन्दर बानक खींचा जब भगवान् राम वन में आये तब चित्स्वरूपा भगवती जानकी को उन्होंने अग्नि में निवास करने को कहा। अग्नि से सीताजी का एक प्रतिबिम्ब (सीताभुता) प्रकट हुईं और वो वनवास में साथ रहीं
@HrishikeshBrah6 🙏
https://t.co/VjYluiSeBA
श्रीराधा तो राधा हैं ही; श्रीकृष्ण के नाम, रूप, लीला और धाम के रूप में भी श्रीराधा ही हैं।
पूर्णानुरागरसमूर्त्तितडिल्लताभं
ज्योतिः परं भगवतो रतिमद्रहस्यम्।
यत्प्रादुरस्ति कृपया वृषभानुगेहे
स्यात्किंकरीभवतुमेव ममाभिलाषः।।
किशोरी जू की अनन्तकृपा है; और सदा बने!
@govardhanmath
असत्स्वपि निविष्टेषु ब्रुवतो मुक्तसंशयम्।
गुणास्ते न विराजन्ते तेनासि हरिणः कृशः॥
(महाभारत, अनुशासनपर्व, दानधर्मपर्व, १२४, १९)
दुराग्रही असत्याग्रही दुष्टस्वभाव वालों के बीच संशयरहित सत्य का प्रकाश करने पर भी वहाँ गुणप्रकाश नहीं होता; यही लोकव्यथा है।
@govardhanmath
#धर्मसम्राट्#स्वामी#श्रीकरपात्रीजी महाराज के ११७वें प्राकट्य महोत्सव के अवसर पर श्रीगोवर्द्धनमठ पुरी में जगद्गुरु शङ्कराचार्य महाभाग के मङ्गलमय सान्निध्य में भगवान् अर्द्धनारीश्वर का महारुद्राभिषेक, धर्मसभा, मुक्तिमण्डपसभा, निशुल्क-चिकित्साशिविर आदि विविध कार्यक्रम सम्पन्न हुए।
हम जैसे जन-सामान्य स्वभाव-प्रभाव आदि के आधार पर सामान्य माहात्म्य ही समझ पाते हैं वा नहीं
भी।
सर्वशास्त्रतात्पर्य को जानने वाले तत्त्वज्ञ
सर्वशास्त्रतात्पर्यभूत होते हैं; अस्तु जिसे
सर्वशास्त्रतात्पर्य ज्ञान हो वही ऐसे महापुरुषों का वास्तविक माहात्म्य जान सकता है।
@govardhanmath
जिनका स्थिर रहना, झुकना; सब कुछ मर्यादा का प्रतीक है।
सिन्धु के समान सदा मर्यादा में स्थिर रहने वाले महान धीर इन महापुरुष के प्रति "समर्पण" के अतिरिक्त और कोई शब्द नहीं है।
@govardhanmath
पुरी में श्रीचन्दनयात्रा में फटाकों के चपेट में आकर जो भक्त घायल हुए हैं; भगवान् श्रीजगन्नाथ की अनुकम्पा के अमोघ प्रभाव से वे यथाशीघ्र स्वस्थ हों; ऐसी भवना है।
साथ ही मनोरञ्जन विघातक न सिद्ध हो तदर्थ जागरूकता की अपेक्षा है।
-जगद्गुरु शङ्कराचार्य स्वामी निश्चलानन्द सरस्वती
@ANI
धन्य!धन्य!
सकल-विरुद्ध-धर्माश्रयावतार
भक्तराज को गोद में लेने के लोभ से शरीर मनुष्य का और चाटने के लोभ से ही मस्तक सिंह का बनाया।
इसी दृश्य से भक्तवत्सल कहलाए।
सर्वत्र ब्रह्ममयी दृष्टिसम्पन्न भक्त ही सर्वरूप परमात्मा को लीलारूप से प्रकट करने में समर्थ होते हैं।
@govardhanmath
भारतमें कुछ राजनैतिक दल हैं; जिनका राजनैतिक/मुद्दा राष्ट्रद्रोह है; वैसे ही राष्ट्रभक्ति भी किसीका राजनैतिक/चुनावीमुद्दा मात्र है।
इसी प्रकार हिन्दुत्वसे द्रोह जहाँ बहुतोंका राजनैतिक/चुनावीमुद्दा रहा; वहीं हिन्दुत्व-रक्षा भी किसीका राजनैतिक/चुनावीमुद्दा मात्र है।
@govardhanmath