पुलिस की वर्दी बाहर के शोर और समाज के इस कड़वे सच से रोज़ जूझती है इसलिए प्रेमचंदजी की यह पंक्ति आपकी पोस्ट में और गहरी लगती है सच यह भी है कि समाज का संतुलन ऐसे ही ओछे लोगों से नहीं,बल्कि आप जैसे संवेदनशील और न्यायप्रिय लोगों की मौजूदगी से टिका हुआ है।अपना ध्यान रखिए
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बहुत ही सटीक बात,घमंड इंसान के सोचने की क्षमता को छीन लेता और वक़्त जब सबक सिखाता तो कोई दलील काम नहीं आती।ऐसे गहराई से सोचने वाले विचार कम देखने को मिलते
कुदरत का तराजू हमेशा सही तौलता है,बस इंसान को समझने में थोड़ा वक़्त लगता है आपकी सोच की गहराई तारीफ़ के काबिल है
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यह सिर्फ एक विचार नहीं, बल्कि आपकी अपनी यात्रा का वो सच है जिसे आपने हर दिन जिया है । संघर्ष जब तक रास्ता दिखाता है, इंसान निखरता ही रहता है। इतनी गहराई और सादगी से जीवन का दर्शन सामने रखने के लिए धन्यवाद✨🙏
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पुनर्वित्तं पुनर्मित्रं पुनर्भार्या पुनर्मही।
एतत्सर्वं पुनर्लभ्यं न शरीरं पुनः पुनः॥
धन,संपत्ति,मित्र,स्त्री बार-बार मिल सकते हैं; शरीर केवल एक ही बार प्राप्त होता है। एक बार नष्ट हो जाने के बाद पुनः प्राप्त करना असंभव है। इसीलिए इसे अधिकाधिक ��ाष्ट्र व मानव कल्याण में लगाना..
प्रकृति का नियम ही यही है कि चा��े अमृत हो या बारिश, सीमा से बाहर जाते ही वरदान भी अभिशाप बन जाता है। जीवन का सारा संतुलन अति को छोड़कर मध्यम मार्ग चुनने में ही है।
आपकी यह बात केवल एक पंक्ति नहीं बल्कि जिंदगी का बहुत बड़ा दर्शन है। इसे याद दिलाने के लिए शुक्रिया! 🙏
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अगरबत्ती सिर्फ कमरे को महका सकती है, आपके चरित्र या किस्मत को नहीं। ईश्वर को चढ़ाया गया सबसे बड़ा प्रसाद आपका 'अच्छा आचरण' और 'सच्चा मन' है। अगर कर्म साफ़ हैं, तो अगरबत्ती न भी जले, ईश्वर आपकी ��ीयत की खुशबू पहचान लेते हैं।
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