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��नु स्मृति, अध्याय 5, श्लोक 35:
सर्वं प्राणभृतां प्राणो मनसैवासृजत् प्रभुः।
स तत्र नियमं चक्रे स्थावरस्योर्ध्वरेतसः।।
अनुवाद:
सर्वभूतों के प्राण (जीवन) को परमात्मा ने मन के माध्यम से सृष्टि किया। उसने स्थावर (अचल जीव, जैसे वृक्ष आदि) और जंगम (चलने-फिरने वाले जीव) दोनों के लिए जीवन का नियमन (नियम या व्यवस्था) भी स्थापित किया।
यह श्लोक प्राणियों की सृष्टि और जीवन के संचालन में परमात्मा के सृज��ात्मक और नियामक स्वरूप को दर्शाता है।