IT'S A VICTORY OF DEMOCRACY
direct democracy... straight from the streets.
It's a victory of peace, patience & persévérance.
Congratulations CJP, Gen Z of the nation and thank you all citizens for shedding fear and the fear of fear and rising up from every corner of the nation.
FROM ACCOUNTABILITY, NOW TO REFORMS
नशे में सो रहा था SHO, DIG ने मौके पर ही कर दिया सस्पेंड
अमृतसर बॉर्डर रेंज के DIG हरमनबीर सिंह गिल ने औचक निरीक्षण के दौरान राजा सांसी थाने के SHO को ड्यूटी से नदारद पाया। आरोप है कि नाके पर तैनात��� के समय वह अपने कमरे में शराब के नशे में सो रहा था।
"विकास के नाम पर विनाश का रास्ता"
भारत की सबसे प्राचीन पर्वतमाला अरावली आज अपने अस्तित्व की सबसे बड़ी लड़ाई लड़ रही है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के एक निर्देश के बाद 100 मीटर से कम ऊँचाई वाली पहाड़ियों को “पहाड़” न मानने की व्याख्या सामने आई है, जिसने अरावली के विशाल भूभाग को कानूनी संरक्षण से बाहर करने का खतरा पैदा कर दिया है। यह केवल शब्दों का खेल नहीं है, बल्कि इसके दूरगामी परिणाम राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और पूरे उत्तर-पश्चिम भारत के पर्यावरणीय भविष्य को सीधे प्रभावित करने वाले हैं।
अरावली पर्वतमाला लगभग 692 किलोमीटर तक गुजरात से लेकर दिल्ली तक फैली है और इसे लगभग तीन अरब वर्ष पुरानी पर्वत श्रृंखला माना जाता है। इसका दो-तिहाई हिस्सा राजस्थान में स्थित है, जहाँ यह जलवायु संतुलन, वर्षा चक्र और भूजल रिचार्ज की रीढ़ के रूप में कार्य करती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि अरावली न होती, तो पश्चिमी, मध्य और दक्षिण भारत का बड़ा भूभाग रेगिस्तान में बदल चुका होता। ऐसे में इस प्राकृतिक ढाल को कमजोर करना दीर्घकालिक पर्यावरणीय आत्मघात से कम नहीं है।
फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया के आँकड़े इस संकट की गंभीरता को और स्पष्ट करते हैं। देश में मैप की गई 12,081 पहाड़ियों में से केवल 1,048 यानी महज 8.7 प्रतिशत ही 100 मीटर की ऊँचाई के मानक पर खरी उतरती हैं। इसका सीधा अर्थ यह ��ै कि अरावली का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा इस नई व्याख्या के बाद कानूनी सुरक्षा खो सकता है। यह स्थिति खनन, रियल एस्टेट और निजी परियोजनाओं के लिए रास्ता खोलती है, जबकि पर्यावरण और स्थानीय समुदायों के लिए यह विनाश का संकेत है।
अरावली केवल पहाड़ियों की श्रृंखला नहीं है। यह 300 से अधिक जीव-जंतुओं और पक्षियों का प्राकृतिक आवास है, लाखों पशुपालकों के लिए चाराग���ह है और बनास, साबरमती तथा लूणी जैसी नदियों का उद्गम स्थल भी है। इसकी चट्टानी संरचना वर्षा जल को रोककर उसे जमीन के भीतर पहुँचाती है, जिससे पूरे क्षेत्र में भूजल रिचार्ज होता है। पहले से ही जल संकट से जूझ रहे पश्चिमी राजस्थान के लिए अरावली का कमजोर होना सूखे को स्थायी बना देने जैसा होगा।
सरकार की पर्यावरण नीति की वास्तविक तस्वीर जोजरी नदी की उपेक्षा और खेजड़ी वृक्षों के साथ हो रहे व्यवहार से भी साफ होती है। खेजड़ी, जिसे राजस्थान का राज्य वृक्ष माना जाता है और जो रेगिस्तानी पारिस्थितिकी तंत्र की जीवनरेखा है, आज योजनाबद्ध कटाई का शिकार बन रहा है। सरकारी आँकड़ों और जमीनी आकलनों के अनुसार, सोलर परियोजनाओं और औद्योगिक लीज़ के नाम पर अब तक लगभग 26 लाख खेजड़ी पेड़ काटे जा चुके हैं, जबकि आने वाले समय में करीब 50 लाख और खेजड़ी पेड़ों की कटाई की तैयारी की जा र��ी है। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि एक पूर्ण विकसित खेजड़ी पेड़ के साथ अन्य पेड़ो को तैयार होने में लगभग 100 वर्ष लगते हैं, जिससे मरुस्थल के इस अनमोल पारिस्थितिकी तंत्र पर दीर्घकालिक और गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
एक पेड़ औसतन 1,200 किलोलीटर ऑक्सीजन प्रतिवर्ष देता है। इस आधार पर, जो 26 लाख पेड़ काटे गए, वे हर साल लगभग 25 करोड़ किलोलीटर ऑक्सीजन प्रदान करते थे जो अब पूरी तरह बंद हो चुकी है। पेड़ों के कटने और बड़े पैमाने पर ऊर्जा परियोजनाओं की स्थापना के कारण तापमान में 3 से 4 डिग्री तक वृद्धि दर्ज की गई है। पर्यावरणविदों के अनुसार, पश्चिमी राजस्थान में बारिश कम होने का यह एक प्रमुख कारण बन गया है। तापमान बढ़ने और आवास नष्ट होने के चलते रेगिस्तान के कई छोटे जीव भी विलुप्ति के कगार पर पहुँच गए हैं। जबकि यही पारिस्थितिकी तंत्र है जो न्यूनतम पानी में पनपता है, मिट्टी को बाँधकर मरुस्थलीकरण को रोकता ���ै, पशुओं के लिए चारा देता है और स्थानीय ग्रामीण अर्थव्यव��्था का आधार है।
विडंबना यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने अतीत में अरावली की रक्षा के लिए ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। 1990 के दशक से लेकर एम.सी. मेहता बनाम यूनियन ऑफ इंडिया जैसे मामलों में कोर्ट ने राजस्थान और हरियाणा में अनियंत्रित खनन पर रोक लगाई और यह स्वीकार किया कि इससे होने वाला पर्यावरणीय नुकसान अपूरणीय है। ऐसे में आज उसी अरावली को कमजोर करने वाली व्याख्या सामने आना न केवल चिंताजनक है, बल्कि न्य���यिक परंपरा के भी विपरीत प्रतीत होता है।
सरकार द्वारा अरा���ली श्रृंखला की 100 मीटर से नीचे की पहाड़ियों को काटने के आदेश जारी कर दिये.. हमें पुरजोर से इसका विरोध कर पर्यावरण सरंक्षण करना है
अरावली की हरियाली हमारी सांसें हैं! खनन और कटाई रोकें, धरोहर बचाएं। आवाज उठाओ, साथ जुड़ो! 🌳✊
अरावली नहीं तो पानी नहीं..!
अरावली नहीं तो जीवन नहीं.!
अरावली सिर्फ पहाड़ नहीं,पानी की सांस है!
हवा की ढाल है,इसे खो देंगे तो आने वाला कल भी बंजर होगा.!
#अरावली_बचाओ
#savearavali @RajCMO @PMOIndia
@narendramodi
राजस्थान म���ं अरावली पर्वत माला को बचाने के लिए लोग सड़कों पर हैं, लेकिन कॉरपोरेट दबाव में बिक चुकी मीडिया को यह संघर्ष दिखाई नहीं देता है। मीडिया की चुप्पी भी इस अपराध में भागीदारी है। #SaveAravalli
@news24tvchannel देश बेरोज़गारी की समस्या से जूझ रहा है , बहुत से संस्थान काफ़ी कम कर्मचारियों पर चल रहे है, और श्रीमान की भाषणबाजी ख़त्म नहीं हो रही हैं ।
जब सत्ता दोषियों के साथ खड़ी हो जाए और एक दलित IAS विधवा महिला को दबा दिया जाए, तो समझ लीजिए न्याय नहीं, राजनीति हावी हो चुकी है।
Late IPS Y पूरण कुमार की पत्नी IAS अमनीत प्रेस कां��्रेंस करना चाहती थी परंतु पुलिस ने मकान को घेर रखा है। दमन की राजनीति।
हम चुप रहे, तो कल हमारी बारी होग���। आवाज़ उठाइए — ये लड़ाई सिर्फ अमनीत की नहीं, हर उस आम नागरिक की है जो सिस्टम से न्याय चाहता है।
#JusticeForAmneet
@kalisenachief श्रीमान आपके जैसे लोग उस समय पर भी तो थे । जो एक दलित इंसान को कैसे आगे आने देते । जो पग पग पर आपको चु��ौती देते हो , जिसने आपके द्वारा किए गए अपमान को स्वीकारा नहीं, आप जैसे लोगो का डटकर सामना किया , उस इंसान को आप वोट कैसे देंगे!
Demanding senior management, impatient customers, long working hours & ambitious targets for 3rd party sales besides garnering deposits, giving loans & recovery of bad loans. Not every branch manager can survive & thrive. What they need? Latest #BankersTrust in @bsindia