पिछले 48 घंटों से चंद्रशेखर आज़ाद बच्चों के हक़ के लिए सड़क पर डटे हुए हैं।
श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल के बाद अब लग रहा है कि भारत भी किसी बड़े बदलाव की दहलीज़ पर खड़ा है
बारिश की हर बूँद स्वीकार है, मगर मासूमों पर अन्याय स्वीकार नहीं, जिन्होंने अन्याय किया वो कितने ही ताकतवर क्यों ना हो, उनके पीछे कितनी बड़ी शक्ति क्यों ना हो, लेकिन जवाब देना ही होगा।
महापुरुषों के विचार ही मेरे संघर्ष की ताक़त हैं। जय भीम, जय भारत।
संसद परिसर में छात्रों की मांगों को लेकर धरने पर बैठे @AzadSamajParty के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं सांसद @BhimArmyChief जी को मेरा पूर्ण समर्थन है। सोचिए, यह कैसी तानाशाही है कि एक सांसद को संसद परिसर में शौचालय तक इस्तेमाल नहीं करने दिया जा रहा। सड़क से लेकर संसद तक, प्रधानमंत्री का अहंकार देश की जनता और सांसद मिलकर तोड़ेंगे।
Primeminister of India, Narendra Modi, would not take my question, I was not expecting him to.
Norway has the number one spot on the World Press Freedom Index, India is at 157th, competing with Palestine, Emirates & Cuba.
It is our job to question the powers we cooperate with.
क्या अडानी सेठ का मुनाफ़ा इतना ज़रूरी है कि उसके लिए एक करोड़ पेड़ काट दिए जाएँ?
क्या ये देश प्रधानमंत्री जी के दोस्तों की बपौती है?
“एक पेड़ माँ के नाम” क्या सिर्फ़ एक स्कैम था?
छतरपुर, मध्य प्रदेश की एक आदिवासी महिला प्रदर्शनकारी का कहना है, "... हमारे जंगल, ज़मीन और घर छीने जा रहे हैं, इसलिए हम प्रोटेस्ट करने के लिए मजबूर हैं। 10 दिन हो गए हैं, आज 11वां दिन है, और कोई अधिकारी नहीं आया है। जब तक हमारी मांगें पूरी नहीं होतीं, हम नहीं जाएंगे। अगर वे हमें नज़रअंदाज़ करते हैं, तो हम नक्सल भी बन सकते हैं बंदूक़ भी उठा सकते हैं। दुर्गा या काली की तरह, हम भी उग्र हो सकते हैं... हमारे बच्चे डर में जी रहे हैं, लेकिन सरकार को कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि हमारे घरों के अंदर क्या होता है।"