एक नाम जो शायद हम सब भूल गए...???
नेहा बोरा जिन्होंने सोनम वांगचुक के साथ अनशन पर बैठी थी
महिलाओं का जिक्र सदैव कम ही हुआ है हजारों करोड़ों पोस्ट देखी जिसमे नेहा का जिक्र तक नहीं
ओर जिसे दो दिन भूखा नहीं रहा गया उसे जीत का श्रेय दिया जा रहा है ग़ज़ब दोगले लोग है यार
इस बहन के 23 दिन के अनशन किसी को याद नहीं रहा
सारा क्रेडिट सोनम वांगचुक और अभिजीत दिपके ले गया
इतिहास के पन्नों में सुनहरे अक्षरों में लिखा जाएगा कि 10 बार के विधायक और 2 बार के सांसद रहे 78 साल के इस बुज़ुर्ग ने सिस्टम के आगे घुटने नहीं टेके।
आज़म खान चाहते तो आज समझौता करके किसी बड़े राजनीतिक पद पर होते।
मगर क्या करें, मुस्लिम अपने ईमान का पक्का होता है, मर जाएगा लेकिन ज़मीर नहीं बेचेगा।
Save Maulana Mohammad Ali Jauhar University
हाईवे मैन के नाम से मशहूर केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी जी का कारनामा देखना है?
आइए मैं आपको दिखाता हूं।
13 जुलाई को लखनऊ कानपुर एक्सप्रेसवे का उद्घाटन हुआ जिसे एलिवेटेड एक्सप्रेसवे बताया गया और इसकी कुल लागत लगभग 4200 से 4700 करोड़ थी।
अभी इसके उद्घाटन को मात्र 13 दिन ही हुए थे कि करोड़ो रुपयों पर प्रश्नचिन्ह खड़ा हो गया है।
आखिर कमी कहां रह जा रही है जो अब एक्सप्रेसवे भी धंसने लग जाते हैं? कहां जाते हैं इतने करोड़ रुपए?
"हमारे कई विधायकों को उठाया गया है और हमारे भाई तेज प्रताप को गिरफ्तार किया गया है!
हम सरकार को चुनौती देना चाहते है कि कल तक सभी लोगों के ऊपर से मुकदमा वापस लिया जाए और उन्हें रिहा किया जाए!
अगर वो रिहा नहीं करते हैं तो हम बड़ा आंदोलन करेंगे"
~ तेजस्वी यादव
कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन खत्म हो चुका है. सोनम वांगचुक मैनेज हो चुका है.
राहुल गांधी रुकने का नाम नही ले रहे हैं. राहुल गांधी ने गृह मंत्री अमित शाह को चिट्ठी लिखकर सवाल पूछा है.
1. क्या आपने प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर पेलेट गन चलाने का आदेश दिया था.
2. प्रदर्शन स्थल पर सादे कपड़ों में लाठी लिए पुलिस थी या वालंटियर्स थे? इनके डिप्लॉयमेंट का स्वीकृति किसने प्रदान की थी.
राहुल गांधी ने कहा, 19 साल का साहिल लोचब पेलेट गन से घायल हो गया. वो अपनी आंखें खो सकता है.
अमित शाह जवाब नही देंगे तो लोकसभा में पूछा जाएगा.
ये अर्चिता सारंगी हैं जो पूर्व IAS और भुवनेश्वर से BJP की सांसद अपराजिता सारंगी की बेटी हैं।
कल जब धर्मेंद्र प्रधान ने अपने शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफा दिया तो अर्चिता सारंगी ने Gen Z को सपोर्ट किया और
अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर सेलिब्रेट करते हुए एक स्टोरी लगा दी।
कुछ देर बाद ये पोस्ट वायरल हो गई तो,
उनपर स्टोरी डिलीट करने का दबाव बनाया जाने लगा था क्योंकि उनकी मां अपराजिता सारंगी धर्मेंद्र प्रधान को खुला समर्थन कर रही थीं।
उसके कुछ देर बाद अर्चिता ने एक स्टोरी और लगाई और धर्मेंद्र प्रधान के PA को टारगेट करते हुए कहा कि मुझे पता था मां को मैसेज करोगे, लेकिन
"मैं स्टोरी डिलीट नहीं करूंगी।"
और लोग यहां सोच रहे हैं कि सिर्फ विपक्ष ही धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांग रहा है। 😂
💥🇮🇷🇮🇱 "जब तथाकथित 'एपस्टीन गठबंधन'
ईरान पर हमला करने के लिए अरबों डॉलर खर्च कर रहा है, तब केवल एक ईरानी मिसाइल ही
हाइफ़ा की ज़ायोनी तेल रिफाइनरी पर हमला करने के लिए काफी थी।" 🚀🔥💪
एक बार फिर से सुन लो फ्रेंड्स.
मैंने तो सोचा था रील से काम चल जाएगा लेकिन आपने तो हमारे प्यारे मंत्री रिजाइन ही ले लिया फ्रेंड्स!
अब तो मुझे रील लेकर आपकी ख़िदमत में बार बार आना पड़ेगा फ्रेंड्स!
मेरे मन की बात सुन लो फ्रेंड्स
Pl
मुझे आजादी दो या कब्र के लिए दो गज जमीन…
अशोक उपाध्याय
जामिया मिल्लिया इस्लामिया के पास से गुजरते हुए एक सड़क का नाम आपको ठहरने पर मजबूर कर देगा- मौलाना मोहम्मद अली जौहर मार्ग। यह सिर्फ एक नाम नहीं, उस शख्स की याद है जिसने दिल्ली को अपनी कलम, आवाज और अपने जज्बे से आजादी की लड़ाई का महत्वपूर्ण मोर्चा बनाया। रामपुर में जन्मे मौलाना जौहर का दिल्ली से गहरा रिश्ता रहा। आजकल उनके नाम पर स्थापित विश्वविद्यालय खबरों में है।
पत्रकारिता का केंद्र: जब 1911 में ब्रिटिश हुकूमत ने भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली शिफ्ट करने का ऐलान किया, तो मोहम्मद अली जौहर भी इस बदलाव के साथ दिल्ली आ गए। वह तब तक कलकत्ता से अंग्रेजी साप्ताहिक अखबार 'द कॉमरेड' निकाल रहे थे। महंगे कागज पर छपने वाला यह अखबार अपनी बेबाक टिप्पणियों और राष्ट्रीय चेतना के प्रसार के लिए जल्द ही प्रसिद्ध हो गया। मौलाना जौहर दिसंबर 1912 में दिल्ली शिफ्ट हुए। 12 अक्टूबर 1912 को 'द कॉमरेड' का पहला दिल्ली संस्करण निकला।
हमदर्द की शुरुआत: आम जनता तक अपनी बात पहुंचाने के लिए उन्होंने 1913 में दिल्ली से उर्दू दैनिक अखबार 'हमदर्द' भी शुरू किया। वह खुद इसके संपादक थे। उनकी लेखनी इतनी प्रभावशाली थी कि ब्रिटिश अधिकारी भी इसे ध्यान से पढ़ते। लॉर्ड मिंटो ने एक बार कहा था कि भारत में मोहम्मद अली जौहर की कलम से ज्यादा खतरनाक कोई कलम नहीं। उनकी तीखी लेखनी से आजिज आ अंग्रेजी सरकार ने दोनों अखबारों पर रोक लगा दी। 1924 में उन्होंने फिर से प्रकाशन शुरू किया, पर बाद में बंद हो गया।
पहले वीसी: 1920 में खिलाफत और असहयोग आंदोलन के दौरान जौहर ने अलीगढ़ में जामिया मिल्लिया इस्लामिया की नींव रखने में अहम भूमिका निभाई। वह इसके पहले वाइस-चांसलर बने। बाद में यह संस्थान दिल्ली के करोल बाग में आ गया। जौहर शिक्षा को आजादी का सबसे बड़ा हथियार मानते थे। उन्होंने कहा था कि गुलाम देश की शिक्षा व्यवस्था गुलाम ही पैदा करेगी, इसलिए राष्ट्रीय शिक्षा संस्थान जरूरी हैं।
बापू से मतभेद: वह मुस्लिम लीग के अध्यक्ष रहे। 1923 में कांग्रेस के भी अध्यक्ष बने। हालांकि कुछ महीनों बाद ही संगठन में बढ़ते असंतोष के चलते वह पार्टी से अलग हो गए थे। शुरू में वह महात्मा गांधी के करीब थे, पर बाद में दोनों में राजनीतिक मतभेद उभरे। 1922 के चौरी-चौरा कांड के बाद जब गांधीजी ने असहयोग आंदोलन को स्थगित कर दिया, तो जौहर निराश हो उठे थे।
अंतिम इच्छा: उन्होंने 1930 में लंदन के गोलमेज सम्मेलन में बीमार होने के बावजूद भाग लिया। वहां उन्होंने कहा, 'मुझे आजादी दो या कब्र के लिए दो गज जमीन। मैं गुलाम देश में लौटना नहीं चाहता।' 4 जनवरी 1931 को लंदन में उनका निधन हो गया। अंतिम इच्छा के अनुसार उन्हें यरुशलम में दफनाया गया।
(लेखक नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में सीनियर डिजिटल कंटेंट प्रोड्यूसर हैं।)
अरे ये क्या देख रहा हूँ?
महाराष्ट्र की सियासत की हवा थोड़ी बदली बदली सी नज़र आ रही है।
राज ठाकरे, उद्धव ठाकरे, आदित्य ठाकरे के साथ शिवाजी पार्क में #DharmendraPradhan के इस्तीफे के बाद जश्न मनाने पहुंचे हैं।
भीड़ देखिए लोगों का जनसैलाब देखिए!
#MannKiBaat#KargilVijayDiwas
ट्रंप ने ईरान पर अमेरिकी हमले फिलहाल रोकने का दिया आदेश: रिपोर्ट
अमेरिकी मीडिया के मुताबिक राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर हमले फिलहाल रोकने का आदेश दिया है।
यह फैसला लगातार 13 दिनों की सैन्य कार्रवाई के बाद लिया गया। The New York Times के अनुसार, युद्ध बढ़ने से मिडिल ईस्ट में अमेरिका के एयर डिफेंस हथियारों का भंडार कम होने की चिंता भी इसकी एक वजह रही।
Axios ने सूत्रों के हवाले से कहा कि अभी यह साफ नहीं है कि यह रोक अस्थायी है या लंबे समय तक रहेगी।
रिपोर्ट के मुताबिक ट्रंप फिलहाल कूटनीति को मौका देना चाहते हैं, लेकिन अमेरिकी सेना जरूरत पड़ने पर बड़े सैन्य अभियान के लिए तैयार है।
#DonaldTrump #IranUSWar #MiddleEast