हमारा हिन्दू चिंतन कहता है कि हम इस संसार के अकेले उपभोगकर्ता नहीं हैं, बल्कि ईश्वर ने जो भी जीव रचे हैं, वृक्ष रचे हैं, नदियाँ, सागर, झील और पहाड़ बनाएं हैं, सबका ईश्वर की इस धरती पर समान अधिकार है।
हमको अधिकार नहीं कि हम जल को प्रदूषित कर दें, पहाड़ों को तोड़ दें, नदियों की राह मोड़ दें और वृक्षों को काट डाले।
रामकथा में महर्षि मतंग बाली से नाराज ही इस कारण हुये थे कि उसने दुंदुभी नामक असुर का मृत शव उठाकर इतनी जोर से फेंका था कि आश्रम क्षेत्र के कई वृक्ष उखड़ गए थे।
भगवान राम के द्वारा जटायु को पिता तुल्य सम्मान देते हुए उसका अग्नि संस्कार करना या फिर एक और प्रसंग जिसमें आता है कि श्रृंगवेरपुर के राजा निषाद गुह जब राम जी से मिलने आते हैं तो उनके लिये कई तरह के उपहार, भोजन सामग्री, शैय्या, वस्त्र वगैरह लाते हैं पर राम उनसे कहते हैं कि मैं चूँकि तापस भेष में ह��ँ तो मैं आपकी इन सामग्रियों का उपयोग नहीं कर सकता।
आपके लाये उपहारों में मुझे केवल ये घास-फूस आवश्यक प्रतीत होते हैं, इन्हें आप मेरे घोड़ों को खिला दो तो आपके द्वारा मेरा सत्कार भी पूर्ण माना जायेगा। इसके बाद राम कहते हैं कि अगर आप इन घोड़ों को तृप्त कर दोगे तो मैं समझूँगा आपने मेरा पूजन कर दिया है।
हम हिंदू पशुओं और पक्षियों के प्रति, नदियों और तालाबों के प्रति इन्हीं भावनाओं को लेकर बड़े होते हैं।