तुम,
रूठना हक़ से,
मैं तुम्हें ये हक़ देता हूँ ।
तुम झगड़ना मुझसे जी भर ,
मैं ये हक़ तुम्हें देता हूँ ।
तुम माँगना लेना मुझसे मेरी जाँ भले,
ये भी हक़ तुम्हें देता हूँ ।
पर
मत छीनना मुझसे ,
तुम्हारी अटखेलियाँ,
तुम्हारी मुस्कान,
वो चाँद सी दूधिया आँखें,
ये हक़ मुझे दे देना ।
तुम उदास जब हो,
तुम्हें मना सकूँ ।
मेरे कंधे पर रख देना सर अपना,
गिरा देना आँखो से मोती,
तुम्हारी सिसकियाँ सुन,
तुम्हें चुप करा सकूँ।
तुम्हें गले लगा के कह सकूँ।
मैं हूँ ना।।
ये हक़ मुझे देना।
मेरा हक़ मुझसे से ना छीनना ।
मेरा हक़ मुझसे ना छीनना ।।
#इश्क़❣️
मरूस्थल की रेत में
अचानक अदृश्य हुई
नदी सी होती है
प्रेम की यात्रा...
जाने कब...
सब लुप्त हो जाता है
राहें
मुक़ाम
स्मृतियाँ
अस्तित्व
प्रेम
और प्रतीक्षा...
पर धरा के भीतर
जारी रहती है
उस नदी की विदा यात्रा
और शुष्क पलकों
के भीतर
प्रेम का अनवरत सफ़र...
कुछ यात्राएँ
प्रतीक्षा की मोहताज नहीं होतीं...!!
#नीलम
ये एहसास नितांत निजी है कि वो हमें पसंद न करे फिर भी हमें वो अच्छा लगता है
लेकिन, हम उसपर अपनी चाहत थोप नहीं सकते या ये सोचकर दुखी नहीं हो सकते
कि वो हमें तवज्जो ही नहीं दे रहा है
जबकि हम तो इतनी दे रहे हैं
यदि आपके मन को कोई भाए तो वो केवल आपके मन का निर्णय है
ये तो अच्छी बात है कि आप किसी के प्रशंसक हैं
अच्छा है कि आपका मन किसी के अस्तित्व को स्वीकार रहा है
यानि आप तब अहंकार शून्य हैं
'मैं' से रहित हैं
दुर्लभ है ऐसा होना
सबके साथ नहीं हो पाता
अपने भीतर जमे अहंकार से मुक्त होना
कहाँ संभव होता है... 🪷
कहती हो तुम
बस, कविता पढ़ी जाए
पर संभव कैसे हो कि मात्र
पंक्तियाँ पढ़कर लौट आया जाए
कविताएँ तो बहुत पढ़़ता हूँ मैं
अनेक याद भी हैं मुझको
पर कविता नहीं तुम्हें पढ़ना
आदत हो गई मुझको
हर शब्द में सिमटी
तुम्हारी सोच पढ़ता हूँ
हर विराम में तुम्हारी
साँसों का ठहराव सुनता हूँ
जो लिखा नहीं, कविता में
मुझे वो भी दिखता है
हर उस भावपर आकर
मन अटका रहता है...
मैं पृष्ठों तक सीमित रहूँ
हर बार तुम कहती हो
पर सच तो यही है न
तुम पन्नों में नहीं रहती हो
मेरी चाय की भाप में
उतर आती हो रोज़
कभी सन्नाटे में याद बनकर
मुझी में सिमट जाती हो
शब्द पढ़कर तुम्हारे
लोग भाव पढ़ते हैं
पर मन हो या चित्त मेरा
केवल, तुम्हें पढते हैं
तुम्हारी हँसी में छिपी थकन
और एकांत, मेरा मन चुनता है
शब्दों के नीचे रखे मौन को
बस,मेरा हृदय सुनता है
इसलिए जब तुम कहती हो
बस, "कविता" पढ़ लो
तो मैं ठिठक जाता हूँ
मन में मुस्कुरा देता हूँ
क्योंकि तुम नहीं जानती
मैं "तुम्हें* सोच रहा होता हूँ
तुम्हारे ख्यालों से होकर
तुम्हारा मन पढ़ रहा होता हूँ
धीरे-धीरे, धैर्य जुटाकर
भीतर छिपाकर उस डर को
कि समझ लिया अगर तुमको
तो खो न दूँ मैं कहीं स्वयं को ...
अब, समझ लो बस इतना
बहाना है कविता पढ़ना
मेरा सच ये जान लो
समीप तुम्हारे है रहना ...
~पुनर्रचित🖊️
अगर किसी को भी लगता है कि अब चुनाव आयोग सही हो जाएगा, तो वो ख्वाबों की दुनिया में जी रहा है.
पिछले 10-12 साल में ऐसा भ्रष्ट सिस्टम तैयार हो चुका है, जो सुधरने वाला नहीं है.
अब लोकतंत्र सिर्फ भ्रम है. वोट दीजिए-भूल जाइए, महामानव सब तय कर लेगा.
18 के हो गए, वोट डालना चाहते हो - लेकिन वोटर लिस्ट में नाम नहीं है?
ये सब ज्ञानू की वजह है.
दरअसल, चुनाव आयोग हर साल Special Summary Revision (SSR) करता है. इससे नए 18 साल के युवाओं को वोटर लिस्ट में जोड़ा जाता है.
साल 2024 से SSR पर रोक लगा दी गई है. दोनो चुनाव आयुक्त - सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी SSR फिर से शुरू करने की मांग कर रहे हैं, लेकिन ज्ञानू मान नहीं रहा.
यूपी और गोवा में अगले साल चुनाव है - लेकिन अड़ियल ज्ञानू SSR को रोके हुए है.
ये रिपोर्ट Economic Times ने की है.
हालांकि, मुझे तो सारी गोदी मीडिया से ही नफ़रत है ।।
फिर भी सबसे ज़्यादा जो हुतिया लगता है वो है सुशांत सिन्हा ! मतलब ये इतना बकवास कर कैसे लेता है
इसको नींद कैसे आती होगी
दिन के हक में शाम नहीं है
यूँ तो इसका नाम नहीं है
हम दोनों बातें करते हैं
यानि रिश्ता आम नहीं है
ज़िक्र पर मेरे मन में हँसना
दिखते रहना तुम गंभीर
भाँप न पाए कोई अपने
रिश्ते की सच्ची तासीर...
-अंकिता