बधाई हो सर !आपको
आपने सबका काम किया है एक काम को छोड़कर 28 जुलाई 2022 का ऑर्डर वापस करवा दो एडिशनल सब्जेक्ट को ज्वाइनिं�� ओर थर्ड ग्रेड डीपीसी करवा दो।
आपके खूब आभारी रहेंगे ♥️🙏💐🌹 @VipinPrakashSh7
नकारात्मक य���ी है कि सरकार एडिशनल के खिलाफ बहस की तैयारी कर रही है और जो खबर पिछले दिनों आ रही थी कि सरकार विवादास्पद आदेश को वापस लेगी वो खबर मात्र एक अफवाह थी।
सरकार के पास जो अधिकारी है वो कांग्रेस के समय के है जो कांग्रेस के नेताओं के कहे अनुसार डीपीसी नहीं करने दे रहे।
सर्वोच्च न्यायालय...तृतीय श्रेणी डीपीसी.. पिछले दिनों से एक अलग केस की लगातार सुनवाई के..कारणवश अन्य केस नहीं सुने जा रहें...वहीं सरकार की मंशा फिर से नकारात्मक.. नये ऐफिडेविट लगायें...अगले सप्ताह सुनवाई की सम्भावना...विपिन प्रकाश शर्मा,राजस्थान ��्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षक संघ
सर्वोच्च न्यायालय...तृतीय श्रेणी डीपीसी.. पिछले दिनों से एक अलग केस की लगातार सुनवाई के..कारणवश अन्य केस नहीं सुने जा रहें...वहीं सरकार की मंशा फिर से नकारात्मक.. नये ऐफिडेविट लगायें...अगले सप्ताह ��ुनवाई की सम्भावना...विपिन प्रकाश शर्मा,राजस्थान प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षक संघ
"मेरी बहन ने नौकरी नहीं करने का पक्का इरादा कर लिया है"
◆ डॉ नुसरत परवीन के भाई ने कहा
◆ एक कार्यक्रम में बिहार के CM नीतीश कुमार ने नुसरत परवीन का बुर्का खींच दिया था
#NusratParveen | #NitishKumar | Nitish Kumar | Dr Nusrat Parveen
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के कुछ दिन पहले यें बातें होती है लेकिन इन बातों का कोई आधार नहीं है,
ना सरकार चाहती है कि यह मामला सुलझे और ना अधिकारी वर्ग चाहता है ये ऐसे ही चलता रहेगा,
अब तो सिर्फ ईश्वर ही है वही जाने ऊंट कब बैठेगा और किस करवट बै��ेगा🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻
तृतीय श्रेणी डीपीसी.... सर्वोच्च न्यायालय .... संगठन का मत...पदोन्नति में महत्वपूर्ण रुकावट..28/07/2022 विवादास्पद आदेश! अब..आखिरकार..विभाग भी माननें को तैयार ..आगामी छः सप्ताह बाद सुनवाई-- राजस्थान प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षक संघ
चार सप्ताह की जगह6सप्ताह में भी जवाब पेश नहीं होना ये बात बताता है की सरकार के पास जवाब नहीं है जबकि शिक्षा मंत्री@madandilawar और कृष्ण कुणाल ऑन कैमरा 10 बार बोल चुके है की नितिगत निर्णय लिया जा चूका है तो क्या उस निर्णय वाला बैग गायब हो गया है .क्यों छलावा करते हो बच्चो के साथ
त्योहारों का महीना है - दिवाली, भाईदूज, छठ।
बिहार में इन त्योहारों का मतलब सिर्फ़ आस्था नहीं, घर लौटने की लालसा है - मिट्���ी की खुशबू, परिवार का स्नेह, गांव का अपनापन।
लेकिन यह लालसा अब एक संघर्ष बन चुकी है। बिहार जाने वाली ट्रेनें ठसाठस भरी हैं, टिकट मिलना असंभव है, और सफ़र अमानवीय हो गया है। कई ट्रेनों में क्षमता से 200% तक यात्री सवार हैं - लोग दरवाज़ों और छतों तक लटके हैं।
फेल डबल इंजन सरकार के दावे खोखले हैं।
कहां हैं 12,000 स्पेशल ट्रेनें?
क्यों हालात हर साल ��र बदतर ही होते जाते हैं।
क्यों बिहार के लोग हर साल ऐसे अपमानजनक हालात में घर लौटने को मजबूर हैं?
अगर राज्य में रोज़गार और सम्मानजनक जीवन मिलता, तो उन्हें हज़ारों किलोमीटर दूर भटकना नहीं पड़ता।
ये सिर्फ़ मजबूर यात्री नहीं, NDA की धोखेबाज़ नीतियों और नियत का जीता-जागता सबूत हैं।
यात्रा सुरक्षित और सम्मानजनक हो यह अधिकार है, कोई एहसान नहीं।