Poverty in 🇵🇰 is pushing children into child labour while army and government dynasty politics candidates enjoy private jets.
Kids are smoking in public instead of going to school.
जौहर की आग बेचारगी की नहीं थी..
वह उस स्वाभिमान की आख़िरी लौ थी..
जिसने सदियों तक इस मिट्टी पर यह मानकर जीवन जिया कि शरीर नश्वर है..
लेकिन सम्मान..अस्मिता और अपनी धरती के प्रति धर्म उससे कहीं बड़ा है..
जौहर को समझने के लिए उस समय की राजपूत मानसिकता को समझना होगा..
किला घिर चुका है..
शत्रु द्वार पर है..
तलवारें टूटने लगी हैं..
किसी भी सहायता की सारी आशाएँ समाप्त हो चुकी हैं..
अब प्रश्न यह नहीं है कि कौन जीतेगा
प्रश्न यह है कि अंत कैसे होगा..
और तभी राजपूत स्त्रियाँ अग्नि के सामने खड़ी होती हैं..
माथे पर सिंदूर होता है..
हाथों में शायद आख़िरी बार अपने बच्चों का स्पर्श होता है..
लेकिन उस क्षण निर्णय भय नहीं करता..
निर्णय स्वाभिमान करता है..
वह अग्नि किसी विजय का उत्सव नहीं थी..
वह पराजय को स्वीकार कर लेने की भी अग्नि नहीं थी..
वह उस विचार की अग्नि थी कि जीवन की कीमत आत्मसम्मान से बड़ी नहीं है..
और फिर जौहर के बाद आता था...साका
पुरुष केसरिया धारण करते थे..
उन्हें मालूम होता था कि अब लौटकर घर नहीं आना है..
जिस घर में पत्नी, माँ और बच्चे थे, वह घर अब पीछे छूट चुका है..
जिन स्त्रियों को वे आख़िरी बार देख चुके हैं, उनके बाद अब उनके सामने केवल रण है..
किले का द्वार खुलता था..
और वे निकलते थे..
जीतने के लिए नहीं अपनी आख़िरी सांस तक लड़ने के लिए..
यही साका था..
जौहर और साका को अलग अलग समझना मुश्किल है..
एक ओर स्त्रियों का यह संकल्प कि उनकी देह पर किसी विजेता का अधिकार नहीं होगा..
दूसरी ओर पुरुषों का यह संकल्प कि उनकी तलवार आख़िरी वार तक झुकेगी नहीं..
यह केवल मृत्यु की कथा नहीं है..
यह उस सभ्यता की कथा है जिसने अपने जीवन-मूल्यों में आत्मसम्मान को जीवन से ऊपर रखा..
जिस क्षण एक स्त्री अग्नि में प्रवेश कर रही थी..उसी क्षण एक पुरुष केसरिया पहनकर किले का द्वार खोल रहा था..
दोनों के सामने मृत्यु थी..
लेकिन दोनों के भीतर एक ही संकल्प था..
मेरी देह नष्ट हो सकती है
मेरा किला गिर सकता है
मेरा जीवन समाप्त हो सकता है
लेकिन मेरी अस्मिता, मेरा स्वाभिमान और मेरी धरती-धर्म के प्रति निष्ठा किसी विजेता की विजय की वस्तु नहीं बनेगी..
यही जौहर था
यही साका था
और शायद इसी लिए, सदियों बाद भी उन अग्नियों की लपटें इतिहास के पन्नों से बाहर निकलकर आज तक सवाल करती हैं..
क्या मृत्यु से बड़ा भी कुछ होता है?
राजपूत इतिहास का उत्तर था..
हाँ होता है...स्वाभिमान 🙏🏻
हमारे इतिहास, गौरव बोध, प्रतिष्ठा से खिलवाड़ किसी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। स्वरा भास्कर को स्वयं जिस तरह का जीवन चाहिए वो जी रही है। जीते रहना ही उसके लिए उपलब्धि है
जौहर पर स्वरा भास्कर के बयान को लेकर बहस तेज
नई दिल्ली: स्वरा भास्कर के जौहर पर दिए एक पुराने बयान को लेकर सोशल मीडिया पर फिर बहस छिड़ गई है।
इस पर राजवीर सर ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “स्वरा जैसी महिलाओं की बुद्धि पर तरस आता है, जो कहती हैं कि यदि मैं पद्मिनी की जगह होती तो मरने की बजाय अलाउद्दीन खिलजी के हरम में जाना पसंद करती ;
दो चीज़ होती हैं, एक होता है जीवन और एक होता है गरिमा युक्त जीवन। यदि पद्मिनी अलाउद्दीन खिलजी के साथ चली जातीं, तो उनके पास जीवन तो होता, लेकिन गरिमा नहीं होती। और दूसरी चीज़, पर यदि ऐसा होना असंभव ही हो गया है, तो मेरी पवित्र देह को मेरे पति के अलावा कोई हाथ नहीं लगा सकता। यही होता है गरिमा युक्त जीवन।
बलात्कार के बाद पीड़िता के जीवित रहने के विरुद्ध कौन है? किसने कहा कि उसे आत्मदाह कर लेना चाहिए?
जौहर एक विराट प्रतिकार है।
बलात्कारियों के झुण्ड के हाथ आने के बाद आजीवन भोगदासी बनकर गरिमाहीन नारकीय जीवन बिताने से बेहतर यदि कोई स्त्री अग्नि चुनती है तो यह एक ऐसा निर्णय है जिससे शील और गौरव प्रस्तूत होता है। ऐसी विलक्षण गाथाएँ इस राष्ट्र को वैभव देती है।
भारत के लिबरल्स इस बात पर चिंतित हैं कि उन स्त्रियों ने जौहर क्यों किया? किंतु वे यह प्रश्न उन इस्लामिक आक्रांताओं से पूछने की हिम्मत क्यों नहीं कर पाते कि वे आख़िर इतने हवस के भूखे क्यों थे, जिनसे बचने के लिए हज़ारों स्त्रियों को आत्मदाह करना पड़ता था? वह कौनसी विषबेल थी, जिसके वशीभूत होकर वे विधर्मियों की स्त्रियों पर यौन-वर्चस्व स्थापित करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते थे?
स्वरा भास्कर आख़िर इस बात से आहत क्यों है कि हिंदू स्त्रियाँ प्यारे मुसलमान शासकों की भोगदासी बन जाने के बजाए मर क्यों गईं?
The new age sex slave is judging our proud ancestors who refused to submit to the barbarians who r_ped, practised sex slavery and necrophilia as per their theological moorings.
Looking at the couple, and the state of her being, I’d have committed modern day Jauhar if i were her.
नेक्रोफिलिया (शवों के साथ बला त्कार ) आक्रमणकारी सेनाओं द्वारा मृत शरीरों की मर्यादा को भी भंग किया जाता था,इसी चरम अपमान से बचने के लिए महिलाओं ने जीवित रहते हुए ही अग्नि समाधि (जौहर) को चुना था
कोई दो टके की औरत, फिल्मों में अभिनेत्री का रोल पाने के लिये हजारों के साथ बिस्तर साझा करने वाली,भैया कहते कहते भैया को ही सैयां बनाने वाली वेश्या आज जौहर जैसे बलिदानों पे कटाक्ष कर रहीं हैं तुम्हारी औकात नहीं हैं कि तुम जौहर पर कुछ बोल सको क्योंकि तुम्हारे लिए तुम्हारी ‘पु सी फॉर अ रेंट’ ही तुम्हारे जीवन का सत्य है।
तुम्हारे जैसे विचारधारे से ग्रसित कुछ गिनी चुनी लड़कियाँ ही हैं जो से क्स को ही स्वतंत्रता मानती हैं, जितनों के साथ से क्स उतनी अधिक स्वतंत्रता। शरीर और वस्त्र सम्भले नहीं संभल रहा हैं, तीन सौ किलो का भार खुद में समाहित कर गली गली घुम कर वेश्यागिरी का धंधा करने वाली औरत तुम्हे बलिदान जैसे शब्दों का मोल क्या पता ?
तुम्हारे लिये अरब के बाजारों में से क्स स्लेव बनना अडवेंचरस और फुलफुलिंग दिखता होगा,
तुम नंगी हो कर एम्सटर्डम के बाजारों के शीशे में नाचों, तुम्हारी कद्दू जैसे देह भी किसी ना किसी को पसंद आ ही जाएगी।
हाँ, किसी यो नि-केन्द्रित लौंडिया का नारीवाद यह तय नहीं करेगा कि दूसरी स्त्रियाँ भी वेश्या बन कर ही घूमें
जिस पवित्र अग्नि को साक्षी मानकर भारतीय रानियाँ साथ जीने मरने का वचन देती थीं जरुरत पड़ने पर उसी पवित्र अग्नि में खुद के देह को भी सौंप देती थीं ताकि कोई नीच पापी उसके पवित्र शव को भी अपवित्र ना कर दें। ऐसे बलिदानी स्त्री, रानी पद्मावती की बलिदान को तुम्हारे जैसी वेश्या कभी समझ नहीं पायेगी।
ऐसे दूषित लोगों को मंच देने वाले मादरणीय लोग का भी बहिष्कार होना चाहिए।
Note - अपने समाज की बहन बेटियों से युवाओ से और बड़ों से माफी चाहूंगा इस भाषा का इस्तेमाल करने के लिए किसी भाई का भेजा हुआ था उचित लगा तो डाला कब तक सब्र का घूंट पीकर चुप रहे 😶
@ReallySwara
BIG NEWS 🚨 Rajveer Sir replies to Swara Bhaskar for comments on Jauhar 😳
SWARA : "If I were a rape survivor, what is this film telling me? I would feel like a coward for not harming myself to save my honour"
RAJVEER SIR : "Jauhar was a refusal to bow before invaders and a defence of self-respect. History’s courage and sacrifice cannot be judged through the lens of convenience."
मुल्ले शवों के साथ भी रेप करते थे। पाकिस्तान में आज भी वही हो रहा है। इसलिए हिन्दू स्त्रियाँ जौहर करती थीं। किसी दो कौड़ी की मुल्ला प्रेमी, करियर में फुँक चुकी लौंडी के लिए यह समझना कठिन हो सकता है क्योंकि उसके लिए उसकी ‘पुसी फॉर अ रेंट’ ही जीवन का सत्य है।
ऐसी लौंडियाँ सेक्स को स्वतंत्रता मानती हैं, जितनों के साथ सेक्स, उतनी अधिक स्वतंत्र। हर स्त्री ऐसा नहीं मानती। उनके लिए अरब के बाजारों में सेक्स स्लेव बनना उतना अडवेंचरस और फुलफुलिंग नहीं दिखा होगा, जितना आइडेंटिटी क्राइसिस से जूझती, भैया कह कर सैंया बनाने वाली के लिए दिखता हो।
तुम नंगी हो कर एम्सटर्डम के बाजारों के शीशे में नाचों, तुम्हारी मुटल्ली देह भी किसी को पसंद आ जाएगी। हाँ, किसी योनि-केन्द्रित लौंडिया का नारीवाद यह तय नहीं करेगा कि दूसरी स्त्रियाँ रंडी बन कर ही घूमें क्योंकि तुम्हें रंडीपना बहुत पसंद है।
यह पोस्ट मैंने बहुत माइल्ड लिखा है। हिन्दू नारियों पर ऐसे आक्षेप का उत्तर मैं और भी अच्छी शब्दावली के साथ दे सकता हूँ।
Leaked, unedited footage of #YadgarEFatah celebrations—imagined by a common #Pakistani. 😏
No salutes. No speeches. Just one question:
If the nation is being ruined, what exactly are we celebrating?
Always in the face. Extremely well analysed. Easy give Easy Go.
America is discovering the challenge.
We cannot afford the free booty concept. Short run great politics. Long term hurts the overall health. But when polity wants, politics gives, Nation suffers. Insightful and sharp. Best to speak truth than to appease. @ARanganathan72