शशि थरूर से बहुत लोग असहमत रहते हैं, मैं भी उनमें से हूँ, मगर हाल में उन्होंने अपने लेख में एक अच्छी बात कही है, जिस पर सभी को ग़ौर करना चाहिए। ये लेख लोकसभा की सीटें बढ़ाने को लेकर है। ये तो आप जानते ही हैं कि लोकसभा की सीटें फिलहाल 543 हैं जो कि 1972 से जमी हुई है 1971 की जनगणना के आधार पर है।
सरकार का तर्क है कि भारत की आबादी दोगुनी से ज्यादा हो गई है अब जनसंख्या के अनुपात में सीटें बढ़ानी चाहिए। लेकिन थरूर कहते हैं कि यह सिर्फ गणितीय तर्क है, इसके पीछे बड़ा संस्थागत खतरा छिपा है।
थरूर के मुख्य तर्क हैं-
दुनिया में कोई परिपक्व लोकतंत्र इतनी बड़ी विधायिका नहीं रखता-
थरूर लिखते हैं कि हर विकसित लोकतंत्र में संसद का आकार इतना ही रखा जाता है कि असली बहस, जांच और व्यक्तिगत भागीदारी संभव हो। 850 सीटों वाली लोकसभा दुनिया के किसी भी लोकतांत्रिक सदन से बड़ी होगी। इससे सदन “विचार-विमर्श का मंच” नहीं रहकर “अराजक कोलोसियम” बन जाएगा, जहां चुनिंदा लोग ही बोल पाएंगे और बाकी सिर्फ वोटिंग मशीन पर संख्या बनकर रह जाएंगे।
अमेरिका का उदाहरण-
अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स 1929 से 435 सीटों पर स्थिर है। तब अमेरिका की आबादी 12 करोड़ थी, आज 33.5 करोड़ से ज्यादा है। फिर भी सीटें नहीं बढ़ाई गईं, क्योंकि इससे विधायी प्रक्रिया ठप हो जाती। हर सांसद ज्यादा लोगों का प्रतिनिधित्व करता है, लेकिन मजबूत स्टाफ, कम्युनिकेशन और कमिटी सिस्टम से काम चलता है। भारत के सांसद भी ऐसा कर सकते हैं।
अगर संख्या बढ़ी तो व्यक्तिगत सांसद की भूमिका खत्म हो जाएगी-
एक सामान्य सत्र में समय बहुत सीमित होता है।
चार घंटे की बहस में पार्टी की ताकत के हिसाब से अधिकतम 15-20 सांसद ही बोल पाएंगे।
बैक बेंचर और छोटी पार्टियों के सांसद लगभग चुप रह जाएंगे।
ज्यादातर सांसद पूरे पांच साल में एक भी सवाल नहीं पूछ पाएंगे, प्राइवेट मेंबर बिल नहीं ला पाएंगे या गंभीर बहस में हिस्सा नहीं ले पाएंगे। वे सिर्फ पार्टी के हुक्म पर हाथ उठाने वाले “खामोश प्लेस होल्डर” बन जाएंगे।
संसद की भूमिका और कमजोर होगी-
हाल के वर्षों में संसद के बैठने के दिन घट रहे हैं, बिल बिना स्टैंडिंग कमिटी की जांच के वॉयस वोट से पास हो रहे हैं और विपक्ष को किनारे किया जा रहा है। सैकड़ों अतिरिक्त सदस्यों से यह स्थिति और बिगड़ेगी। बड़ा सदन सरकार के लिए सुविधाजनक होता है, क्योंकि उसमें असली जांच-पड़ताल मुश्किल हो जाती है। संसद “रबडर-स्टैंप” या “नोटिस-बोर्ड” बन जाती है।
सत्तावादी मॉडल से समानता-
थरूर चेतावनी देते हैं कि 850 सीटों वाली लोकसभा चीन की पोलिटिकल कंसल्टेटिव कॉन्फ्रेंस या उत्तर कोरिया की सुप्रीम पीपुल्स असेंबली जैसी बन सकती है—बहुत बड़ी, भव्य दिखने वाली, लेकिन असली बहस या चुनौती देने में असमर्थ। ये सिर्फ “सहमति का नाटक” करती हैं।
बेहतर विकल्प-
सांसद का काम राष्ट्रीय कानून, विदेश नीति, अर्थव्यवस्था और केंद्र सरकार की जवाबदेही है। वे स्थानीय काउंसलर या विधायक नहीं हैं।
स्थानीय मुद्दे (सड़क, पानी, कचरा आदि) राज्य विधानसभाओं और पंचायत/नगरपालिकाओं के हैं (73वें और 74वें संविधान संशोधन के तहत)।
जनसंख्या बढ़ने पर विधायकों (MLAs) की संख्या बढ़ाएं, लोकसभा को कॉम्पैक्ट और राष्ट्रीय मुद्दों पर केंद्रित रखें।
300 अतिरिक्त सांसदों पर खर्च (वेतन, आवास, यात्रा, पेंशन) बचाने के बजाय मौजूदा सांसदों के लिए उचित ऑफिस बिल्डिंग बनाएं।
कुल मिलाकर थरूर का कहना है कि असली प्रतिनिधित्व बहस की गुणवत्ता, विधायी कमेटियों की गंभीर जांच और स्थानीय सरकारों को सशक्त बनाने में है—न कि एक विशाल, अव्यवहारिक सदन बनाकर लोकतंत्र को “खाली नाटक” में बदलने में। 850 सीटों वाली लोकसभा सरकार के लिए इको चैंबर बन जाएगी, न कि शासन का मंच।
उठा शमशीर
दिखा अपना हुनर
क्या लेगा!
ये रही जान
ये गर्दन
ये सर
क्या लेगा?
सिर्फ़ एक शेर
उड़ा देगा
तेरे परखचे तेरे
तू समझता है कि
ये शायर है
कर क्या लेगा
दादा जी भगत सिंह को मानने वाला है🔥
इसलिए चेतावनी नहीं धमकी दे रहा है !
इन कही बार SP और DSP को भगाया है ; जिन्हें देखकर लोगों का कच्छा गीला हो जाता है😂🤣
उनको पता है; हरियाणा में 22 जेल है ; जिनमें केवल 22000 लोगों को रखा जा सकता है ।
लेकिन 26000 कैदी पहली ही है ; जो 17% ज्यादा है ।
इसलिए 17 तारीख को जीन्द जाने के लिए लोगों में जोश भर रहा है कि जेल छोटी पड़ जाएंगी ।
क्योंकि दादा जी को पता है ; 10000+ चैनत गांव के लिए जीन्द जा रहें है ।
बाकि पुलिस आग में घी डालने का काम कर रही है , रात को चैनत गांव में नोटिस देकर
दी लास्ट स्टैंड।
आज का Cape Verde vs Argentina का मैच फुटबॉल इतिहास में दर्ज होगा।
डिफेंडिंग चैंपियंस के ख़िलाफ़ एक हंबल बैकग्राउंड वाली टीम ने क्या ग़ज़ब लड़ाई लड़ी है। लोपेज का 103वें मिनट पर मारा गया सनसनीखेज एक्वलाइजर। दुनिया के सबसे ज़िद्दी गोलकीपर के सामने इतना क्लीन फिनिश। दूसरी तरफ़ Cape Verde के चालीस साल के गोल कीपर वोज़हिना अर्जेंटीना के हर हमले के ख़िलाफ़ ‘लास्ट मैन स्टेंडिंग’ की तरह डटे रहे।
अगर आपको स्पोर्टिंग स्प्रिट पसंद है तो आप ये मैच देख डालिए। Cape Verde ने कल फुटबॉल के मैदान में महाकाव्य रचा है।
पंडित जवाहरलाल नेहरू के बारे में पुष्पेश पंत के साथ हुआ यह प्रश्नोत्तर अत्यंत रोचक है। यह केवल नेहरू की उपलब्धियों का गुणगान नहीं करता, उनके व्यक्तित्व, विचार और राजनीतिक प्राथमिकताओं के कई ऐसे पक्ष खोलता है, जिन पर सामान्यतः चर्चा नहीं होती।
यह भी नहीं है कि पुष्पेश पंत नेहरू के समर्थक होने के कारण महात्मा गांधी, सुभाषचंद्र बोस, सरदार पटेल या दूसरे नेताओं को खारिज कर रहे हैं। उनके पास इतिहास को देखने की अपनी स्वतंत्र दृष्टि है, जिससे आप सहमत भी हो सकते हैं और असहमत भी। लेकिन उनकी बातों को सुनना इसलिए जरूरी है, क्योंकि वे हमारी बनी-बनाई धारणाओं को थोड़ा विचलित करती हैं और इतिहास को किसी एक नायक या एक विचारधारा की कैद से बाहर देखने के लिए प्रेरित करती हैं।
यह बहुत छोटी-सी क्लिप है, लेकिन इसे ध्यान से सुनिए। संभव है कि इसके बाद आपके भीतर कुछ नई जिज्ञासाएँ जन्म लें, कुछ पुराने विश्वास प्रश्नों के घेरे में आएँ और नेहरू के साथ-साथ गांधी, बोस तथा पटेल को देखने के लिए भी एक नया वैचारिक द्वार खुले। अच्छी बातचीत वही होती है जो अंतिम उत्तर नहीं देती, हमारे भीतर बेहतर प्रश्न पैदा करती है और बेहतर प्रश्न ही अंततः बेहतर समझ तथा अधिक परिपक्व सोच को जन्म देते हैं।
The Embassy of the Islamic Republic of Iran in India categorically rejects the reports and claims circulated by certain media outlets regarding the economic situation in Iran and alleged difficulties in the supply of essential goods and public necessities.
It is emphasized that, despite the imposition of three wars and extensive pressures against the Iranian nation, no shortage of essential commodities or basic necessities has occurred to date. Owing to the effective measures and responsible management of the Government of the Islamic Republic of Iran under the leadership of President Dr. Masoud Pezeshkian, the procurement, supply, and distribution of the goods required by the country continue in a normal, stable, and uninterrupted manner.
The Embassy of the Islamic Republic of Iran also urges respected Indian media organizations to obtain and disseminate news and reports concerning Iran from credible, official, and verifiable sources. In this regard, it should be recalled that Iran International is a media outlet affiliated with opponents and adversaries of the Iranian people and has a long record of disseminating biased narratives aligned with anti-Iranian political agendas. Consequently, it cannot be regarded as a credible source for accurately reflecting the realities of Iran.
@aajtak