#शिवजी_की_सत_साधना_करो
सूक्ष्मवेद में परमात्मा ने बताया है:-
जा तीर्थ पर कर है दानं । ता पर जीव मरत है अरबानं ।।
गोते-गोते पड़ि है भारं । गंगा जमना गए केदारं ।।
Gudda Guddi ka Khel Band Karo
ढंग की पूजा करो ।
#शिवजी_की_सत_साधना_करो
सूक्ष्मवेद में परमात्मा ने बताया है:-
जा तीर्थ पर कर है दानं । ता पर जीव मरत है अरबानं ।।
गोते-गोते पड़ि है भारं । गंगा जमना गए केदारं ।।
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ढंग की पूजा करो ।
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संक्षिप्त श्रीमद्देवीभागवत के स्कन्ध 3 के अध्याय 4-5, पृष्ठ 138 पर विष्णु जी स्वयं कहते हैं कि मैं (विष्णु), ब्रह्मा और शंकर जन्म-मृत्यु में हैं अर्थात हम नाशवान हैं। तो अविनाशी परमात्मा कौन है तथा उसकी पूजा की विधि क्या है?
Gudda Guddi ka Khel Band Karo
#शिवजी_की_सत_साधना_करो
शिव जी हैं जन्म-मृत्यु में; जिसका प्रमाण श्रीमद्देवीभागवत, स्कंध 3, अध्याय 4-5 में है। जबकि गीता अध्याय 15 श्लोक 17 के अनुसार उत्तम पुरुष, अर्थात अविनाशी पूर्ण परमात्मा तो अन्य है जो सर्व का धारण पोषण करने वाला है।
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#शिवजी_की_सत_साधना_करो
शिव जी को हम समाधि लगाए हुए देखते हैं यानी शिव जी से अधिक शक्ति युक्त भगवान कोई और है जिनकी शिव जी को भी तलाश है। वह वास्तव में पूर्णब्रह्म है। जिनकी वास्तविक जानकारी जानने के लिए देखिए Sant Rampal Ji Maharaj YouTube Channel▶️
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💁शिव जी को हम समाधि लगाए हुए देखते हैं यानी शिव जी से अधिक शक्ति युक्त भगवान कोई और है 👉जिनकी शिव जी को भी तलाश है। वह वास्तव में पूर्णब्रह्म है।👈 जिनकी वास्तविक जानकारी जानने के लिए देखिए
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श्रीमद्भागवत-महापुराण (प्रथम खंड), स्कन्ध 3, अध्याय 29 श्लोक 21-22; श्रीमद्भागवत महापुराण, स्कन्ध 10, अध्याय 84, श्लोक 11, 13 में स्पष्ट लिखा है कि जो मिट्टी, पत्थर, काष्ठ (लकड़ी) आदि पार्थिव विकारों को ही इष्टदेव मानता है और (1/2)
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शिव जी हैं जन्म-मृत्यु में; जिसका प्रमाण श्रीमद्देवीभागवत, स्कंध 3, अध्याय 4-5 में है। जबकि गीता अध्याय 15 श्लोक 17 के अनुसार उत्तम पुरुष, अर्थात अविनाशी पूर्ण परमात्मा तो अन्य है जो सर्व का धारण पोषण करने वाला है।
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#शिवजी_की_सत_साधना_करो शिव जी हैं जन्म-मृत्यु में; जिसका प्रमाण श्रीमद्देवीभागवत, स्कंध 3, अध्याय 4-5 में है। जबकि गीता अध्याय 15 श्लोक 17 के अनुसार उत्तम पुरुष, अर्थात अविनाशी पूर्ण परमात्मा तो अन्य है जो सर्व का धारण पोषण करने वाला है।
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कांवड़ यात्रा में श्रद्धालु शिवलिंग पर जल चढ़ाने के लिए दूर-दूर तक पैदल जाते हैं। लेकिन शास्त्रों में वर्णित भक्ति मार्ग का पालन करना आवश्यक है। गीता अध्याय 16 श्लोक 23 के अनुसार शास्त्रविरुद्ध साधना से कोई लाभ नहीं मिलता।
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कांवड़ यात्रा से पाप होते है,पुण्य नही।
क्योकि सावन मे सबसे ज्यादा जीव उत्पन होते है जिससे कांवड़ लाने मे सबसे ज्यादा जीव मरते है।
संत गरीबदास जी ने बताया है
जा तीर्थ पर कर है दानं। ता पर जीव मरत है अरबानं।।
गोते-गोते पड़ी है भारं। गंगा जमना गए केदारं ।।
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संक्षिप्त श्रीमद्देवीभागवत के स्कन्ध 3 के अध्याय 4-5, पृष्ठ 138 पर विष्णु जी स्वयं कहते हैं कि मैं (विष्णु), ब्रह्मा और शंकर जन्म-मृत्यु में हैं अर्थात हम नाशवान हैं। तो अविनाशी परमात्मा कौन है तथा उसकी पूजा की विधि क्या है? जानने के लिए देखिए
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शिव जी हैं जन्म-मृत्यु में; जिसका प्रमाण श्रीमद्देवीभागवत, स्कंध 3, अध्याय 4-5 में है। जबकि गीता अध्याय 15 श्लोक 17 के अनुसार उत्तम पुरुष, अर्थात अविनाशी पूर्ण परमात्मा तो अन्य है जो सर्व का धारण पोषण करने वाला है।
@BhavnaDasi_
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गंगा तो शिव के लोक में बने जटा कुंडली डैम में है। उसे यहाँ से ले जाने की जरूरत नहीं है। रही बात कांवड़ यात्रा की तो सावन में सबसे ज्यादा जीव उत्पन्न होते हैं जिस वजह से कांवड़ के लाने में सबसे ज्यादा जीव मरते हैं।
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कांवड़ यात्रा सावन में श्रद्धालु जल लेकर शिव मंदिरों की ओर जाते हैं। यह संदेश जीवों की रक्षा और भक्ति पर विचार करने को प्रेरित करता है। गरीबदास जी की वाणी में तीर्थ के आडंबर पर प्रश्न उठाया गया है।
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कांवड़ यात्रा से जुड़े आयोजनों में श्रद्धालु एकत्र होते हैं। भीड़, आवागमन और जलस्रोतों पर बढ़ता दबाव जीव-जंतुओं के लिए समस्या बन सकता है। इसलिए भक्ति के साथ जीवों की रक्षा, स्वच्छता और शास्त्रसम्मत साधना पर ध्यान देना चाहिए।
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शिव जी को हम समाधि लगाए हुए देखते हैं यानी शिव जी से अधिक शक्ति युक्त भगवान कोई और है जिनकी शिव जी को भी तलाश है। वह वास्तव में पूर्णब्रह्म है। जिनकी वास्तविक जानकारी जानने के लिए देखिए Sant Rampal Ji Maharaj YouTube Channel
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कांवड यात्रा से पाप ही होते हैं, पुण्य नहीं,
क्योंकि सावन में सबसे ज्यादा जीव उत्पन्न होते हैं जिससे कांवड़ के लाने में सबसे ज़्यादा जीव मरते हैं।
कबीर, तीर्थ कर कर जग मुवा, ऊड़ै पानी न्हाय। रामहि राम ना जपा, काल घसीटें जाय ।
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संक्षिप्त श्रीमद्देवीभागवत के स्कन्ध 3 के अध्याय 4-5, पृष्ठ 138 पर विष्णु जी स्वयं कहते हैं कि मैं (विष्णु), ब्रह्मा और शंकर जन्म-मृत्यु में हैं अर्थात हम नाशवान हैं। तो अविनाशी परमात्मा कौन है तथा उसकी पूजा की विधि क्या है?