Very disappointed with @airtelindia customer support. I’ve been trying to change and upgrade my plan since yesterday, but no one has been able to help.every time I call, I’m told that it can’t be done from their end. This is extremely frustrating . @Airtel_Presence
Ajit Pawar was an early morning person. Right after big defeat in in Pune & Pimpari Chinchwad this month, he held meeting at 630 am next morning!
Not many have this attitude in life.
Politician with probably the highest energy. What an irony, he lost his life in the early morning
Unbelievable! Deeply Saddened. My condolences to his family and loved ones
@airtelindia इंदौर जैसे शहर में 2 दिन से wifi बंद पड़ा है। जब भी @Airtel_Presence पर कॉल करो आवाज आती है कि हमारे इंजीनियर काम कर रहे है और अगली बार कॉल करने पर नया समय दे दिया जाता है। दो दिन हो गए है पूरे इलाके में बंद है। बेहद घटिया सर्विस👎👎
#airtel#airtelXstreamFiber
गिल कभी कभी बहुत डिफेंसिव हो जाते है जिसकी वजह से वो आउट हो जाते है।आपको क्या लगता है कि गिल को आज की तरह थोड़ा आक्रामक ही खेलना चाहिए?
#askstar@JioCinema
तुम्हारे शहर में मय्यत को सब कांधा नही देते,
हमारे गांव में छप्पर भी सब मिलकर उठाते है!
~मुनव्वर राना ~
#MunawwarRana साहब के आखिरी सफ़र में शामिल हुए @Javedakhtarjadu
ऐसे पैरेंट्स पर कार्यवाही होनी चाहिये असल में और बच्चों की काउन्सलिंग। जाति का यह पहला पाठ माँ बाप ही सिखाते हैं।
मेरी बेटी से एक बार उसके किसी स्कूलमेट ने उसकी जाति पूछी। उसने घर आकर हमसे पूछा तो हमने बताया कि कह देना हमारी कोई जाति नहीं। हम जाति वग़ैरह नहीं मानते।
तबसे आजतक वह यही जवाब देती है।
सोशल मीडिया पर अक्सर आपको ऐसे लोग मिल जाएँगे जो बाज़ी उलटती देख फ़ौरन कहेंगे~ “चलिए भाई जो हुआ जाने दें, कोई बात दिल में न रखें !” दिलचस्प सत्य यह है कि इनमें से अधिकांश आपके जानने वाले होंगे ! जो अपने किसी न किसी पूर्वाग्रह या ‘सिलेक्टिव’ रीज़न के रहते आपसे भिड़ गए होंगे ! ऐसे लोग ख़ुद को ग़लत साबित होता देख तुरंत DM या इनबॉक्स में आ जाते हैं ! या कभी कभी तो कमेंट में ही लिख देते हैं~ “चलिए भाई जो हुआ जाने दें, कोई बात दिल में न रखें !”
पिछले दिनों मुझे ऐसे कई महानुभाव दिखे ! जो हर उस तथ्य या सत्य से जबरन भिड़ गए जिससे उनका ‘पोलिटिकल एजेंडा’ सेट नही होता. ऐसे लोग सही कहने वालों को भी, न जाने क्या क्या बोल और सुना जाते हैं. आप, हिंदू धर्म ध्वजा वाहकों के ‘मन की बात’ न कीजिए तो वे आपको मुस्लिमों का एजेंट बता देंगे ! मुस्लिमों की किसी ग़लती की तरफ़ ज़रा सा इशारा भर कर दीजिए तो वे आपका पूरा तहज़ीबी सफ़र दरकिनार कर, फ़ौरन आपको संघी या फ़िरक़ापरस्त बता देंगे. या’नी बस वह कहिए जो यह सुनना चाहते हैं.
वैसे यहाँ मुझे अपने एक प्रिय और बड़े अदीब की कही बात याद आती है जो तसल्ली देती है, वे कहते हैं~ “जब दोनों तरफ़ के लोग आपको गाली देने लगें तो समझ लीजिए कि आप सही रास्ते पर हैं !”
लेकिन, अपने पूर्वाग्रह के साथ आपसे उलझने और आपको तमग़ा देने वाले इन स्वयंभू मठाधीशों को जब ‘कभी कभार’ आपकी कोई बात समझ में आ जाती है तो बजाए अपनी ग़लती मानने के, फ़ौरन अपने जुमले पर आ जाते हैं~ “चलिए भाई जो हुआ जाने दें, कोई बात दिल में न रखें !”
अरे भाई, जब आप किसी को जानते-समझते हुए, उसकी पूरी शख़्सियत तार-तार कर रहे थे, यह बात तो तब सोचना चाहिए था ! कि ‘उसके दिल पर क्या बीतेगी ?’ बिना जाने-समझे आप उस पर टूट पड़े और बाज़ी पलटती दिखी तो अपना कथित बड़प्पन सामने लाकर सामने रख दिया~ “चलिए भाई जो हुआ जाने दीजिए, कोई बात दिल में न रखिएगा !” जैसे सच और सही बोलने वालों का दिल, दिल न हुआ आपकी सियासत का जनवासा हो गया ? जहाँ आप अपनी छोटी-सोच की बड़ी-सी बारात लेकर आए, ठहरे, खाया-पीना और फैलाया फिर यह कहते हुए निकल गए कि “देख लेना भाई, बहुत गंद फैला कर जा रहे हैं, साफ़-सफ़ाई कर लेना और हाँ~ कोई बात दिल में न रखना !”
दरअस्ल, यह सारा मुआमला हमारे बीच पनपे असीम अविश्वास का है. हम लोग भरोसे की दरकती हुई दीवार के नीचे खड़े हैं. हम एक अधैर्य स्वभाव के शिकार हो चुके हैं, जिसमें व्यक्ति या उसकी बात को पूरी तरह समझे और जाने बिना, हमने तुरंत प्रतिक्रिया देने की अपनी एक आदत बना ली है, जो बहुत हद तक ख़तरनाक है.
वे लोग बहुत सही और सुखी होते हैं जो किसी बात पर कुछ न कहने का तंज़ सह लेते हैं, परंतु अपनी प्रतिक्रिया देने में बिलकुल हड़बड़ी नहीं करते. वे पहले पूरे प्रकरण की तह तक जाते हैं. किसने क्या कहा है, किन हालात में कहा है, कहने वाले का रिकॉर्ड क्या है, वह किस मानसिकता का है, उसका बैकग्राउंड क्या है, इतना सब जानने के बाद भी, वे फिर सोचते हैं कि क्या उनका इस विषय पर कुछ भी कहना सही होगा या नहीं ?
आज के दौर में बोलना जितना ज़रूरी होता जा रहा है, उससे कहीं अधिक ज़रूरी यह हो गया है कि कहाँ बोलना है और कितना बोलना है. दरअस्ल, इस दौर में बोलना और न बोलना ‘विक्रम बेताल’ की कहानी सा हो गया है. यह कहानी कहाँ ख़त्म होगी, पता नहीं ! कितनों के सिर फोड़ेगी और कितने रिश्ते तोड़ेगी, कुछ नहीं कहा जा सकता !
कुछ लोगों को शायद यह बात भी अब; कोरी जज़्बाती या बचकानी लगे कि ‘भैया एक दूसरे पर विश्वास करना सीखो. यहाँ हर शख़्स का कोई पॉलिटिकल एजेंडा हो यह ज़रूरी नहीं है ! कुछ लोग अब भी मुहब्बतों के एजेंडे पर काम कर रहे हैं और वे भारतीयता व मानवता के पक्षधर हैं. उन्हें दलों, ख़ेमों या धर्मों में बाँट कर मत देखो. जब हर तरफ़ मुहब्बतों के चराग़, नफ़रतें बुझा रही हों, ऐसे समय में उन जुगनुओं की हिफ़ाज़त कर लो जो थोड़ी ही सही, रौशनी की अलामत हैं. जय हिंद 🇮🇳
~आलोक श्रीवास्तव l #AalokNama