अपनी प्रजा के महान नायक, जिनके संघर्ष में उनके राज्य के प्रत्येक वर्ग, जाति और संप्रदाय के व्यक्ति ने सहयोग दिया, न्याय और सत्य के प्रति जिनकी निष्ठा ने उन्हें लोक-कथाओं और लोक-साहित्य में भारतीय इतिहास के महानायक के रूप में स्थापित कर दिया, स्वतंत्रता और स्वाभिमान के अमर प्रतीक उन #महाराणा_प्रताप की जयंती पर सादर नमन..
@shri_kys@Shri_PF
#weareskpf
"समाज जागरण के लिए पारस्परिक द्वेष मिटाना आवश्यक है। कार्यकर्ता को चाहिए कि समाज के प्रत्येक घटक को अपना ही रूप माने। उनके विकास में निजी उन्नति की कल्पना करनी चाहिए।"
पूज्य श्री तनसिंह जी ('समाज चरित्र' पुस्तक से साभार)
#ShriKYS
भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी।
हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी॥
भारत के प्राण, सनातन जगत की सकल आस्था के केन्द्र, हमारे आराध्य, मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के पावन अवतरण दिवस "श्री रामनवमी" की आप सभी को अनंत शुभकामनाएं।
धर्म के साक्षात स्वरूप, सत्य, सनातन और सदाचार के श्रेष्ठतम प्रतीक, सकल आस्था के केंद्र प्रभु श्री राम की कृपा चराचर जगत पर बनी रहे, सबके जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार हो, 'कौशल्यानंदन' से यही प्रार्थना है।
जय जय श्री राम!
राजस्थान की समृद्ध परंपराओं, आस्था और अखंड सौभाग्य के प्रतीक पावन पर्व गणगौर की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं।
मां गणगौर का यह पावन उत्सव आपके जीवन में सुख, समृद्धि, प्रेम और अपार खुशहाली का संचार करे। परमपिता परमेश्वर से कामना है कि यह पर्व आपके हर सपने को साकार करे और आपके जीवन को आनंद, उत्साह एवं मंगलमय क्षणों से भर दे।
#गणगौर
विक्रमोत्सव २०८३
आज चैत्र शुक्ल प्रतिपदा है, भगवान श्री राम की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले, ज्ञान, ध्यान, न्याय और भक्ति के पर्याय, विक्रम संवत की शुरुआत करने वाले सम्राट विक्रमादित्य को स्मरण करने का दिन, माँ भगवती हम सभी को उस सात्विक मार्ग पर बढ़ने की शक्ति प्रदान करें, इसी प्रार्थना के साथ आये हम सब इस भारतीय नववर्ष (विक्रमोत्सव) का स्वागत करें।
@shri_kys@Shri_PF
#weareskpf
सोने री धरती अठे, चाँदी रो असमाण
रंग रंगीळो रस भरियो ओ म्हारो प्यारो 'राजस्थान’
आपरी उत्कृष्ट संस्कृति अर परम्परा रै वास्तै प्रसिद्ध वीर भूमि राजस्थान स्थापना दिवस री मौकळी अर् घणी घणी बधाई।
#राजस्थान_दिवस
"हमारी साधना का धर्म व्यवहार का धर्म है, वह मात्र मान्यताओं से प्राप्त नहीं होता, उपार्जित किया जाना चाहिए।"
पूज्य श्री तनसिंह जी ('साधक की समस्याएँ' पुस्तक से साभार)
#ShriKYS
Remembering the epitome of bravery, sacrifice, and self-respect. On his Punyatithi, we bow to the legendary Veershiromani Maharana Pratap. #MaharanaPratap
और भी चिंताजनक तथ्य यह है कि जिस मंत्रालय ने कोर्ट में अरावली की परिभाषा से जुड़े तथ्यों को प्रस्तुत किया है, उसके मंत्री स्वयं अरावली क्षेत्र से निर्वाचित होकर संसद तक पहुँचे हैं। यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या राजस्थान का पारिस्थितिकी तंत्र इतना सस्ता है कि बाहरी कंपनियाँ आएँ, पहाड़ और पेड़ काटें और मुनाफा समेटकर चली जाएँ। क्या सरकार यह मान चुकी है कि जनता को भ्रमित कर किसी भी प्रकार के पर्यावरण विरोधी निर्णय पारित कराए जा सकते हैं।
साथ ही एक तरफ सरकार द्वारा अरावली पर्वतमाला के संरक्षण व इसे हरित बनाये रखने के उद्देश्य से बजट 2025–26 में, 250 करोड़ रुपये राशि की 'हरित अरावली विकास परियोजना शुरू करने की घोषणा करी गई थी। दूसरी तरफ उसी अरावली पर्वतमाला को अब खनन के लिए सौंपा जा रहा है। ये विडंबना नहीं है तो क्या है?
अरावली वह प्राकृतिक दीवार है जो पश्चिम से आने वाली जानलेवा लू और थार रेगिस्तान को पूर्वी राजस्थान, दिल्ली और उत्तर प्रदेश के उपजाऊ मैदानों में प्रवेश करने से रोकती है। इस दीवार को कमजोर करना आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के साथ सीधा खिलवाड़ है।
कुल मिलाकर, अरावली और खेजड़ी दोनों पर हो रहा यह हमला विकास नहीं, बल्कि विनाश की राजनीति है। यह फैसला खनन माफियाओं और कॉरपोरेट हितों को बढ़ावा देने जैसा है, जबकि पर्यावरण, ग्रामीण आजीविका और भविष्य की पीढ़ियों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। इतिहास ऐसे फैसलों को न तो भूलता है और न ही माफ करता है। सरकार को अब स्पष्ट करना होगा कि वह विकास चाहती है या विनाश क्योंकि प्रकृति के साथ किया गया अन्याय अंततः समाज को ही लौटकर मिलता है।
माननीय सर्वोच्च न्यायालय से विनम्र आग्रह है कि इस विषय पर पुनर्विचार किया जाए और आमजन से भी अपील है कि इस लड़ाई को केवल पहाड़ों की नहीं, बल्कि अपने भविष्य की लड़ाई समझकर अपनी आवाज बुलंद करें। इतिहास ऐसे फैसलों को न भूलता है, न माफ करता है और प्रकृति के साथ किया गया अन्याय अंततः समाज को ही लौटकर मिलता है।
#अरावली_बचाओ #ओरण_बचाओ #राजस्थान_बचाओ
#खेजड़ी_बचाओ
"विकास के नाम पर विनाश का रास्ता"
भारत की सबसे प्राचीन पर्वतमाला अरावली आज अपने अस्तित्व की सबसे बड़ी लड़ाई लड़ रही है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के एक निर्देश के बाद 100 मीटर से कम ऊँचाई वाली पहाड़ियों को “पहाड़” न मानने की व्याख्या सामने आई है, जिसने अरावली के विशाल भूभाग को कानूनी संरक्षण से बाहर करने का खतरा पैदा कर दिया है। यह केवल शब्दों का खेल नहीं है, बल्कि इसके दूरगामी परिणाम राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और पूरे उत्तर-पश्चिम भारत के पर्यावरणीय भविष्य को सीधे प्रभावित करने वाले हैं।
अरावली पर्वतमाला लगभग 692 किलोमीटर तक गुजरात से लेकर दिल्ली तक फैली है और इसे लगभग तीन अरब वर्ष पुरानी पर्वत श्रृंखला माना जाता है। इसका दो-तिहाई हिस्सा राजस्थान में स्थित है, जहाँ यह जलवायु संतुलन, वर्षा चक्र और भूजल रिचार्ज की रीढ़ के रूप में कार्य करती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि अरावली न होती, तो पश्चिमी, मध्य और दक्षिण भारत का बड़ा भूभाग रेगिस्तान में बदल चुका होता। ऐसे में इस प्राकृतिक ढाल को कमजोर करना दीर्घकालिक पर्यावरणीय आत्मघात से कम नहीं है।
फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया के आँकड़े इस संकट की गंभीरता को और स्पष्ट करते हैं। देश में मैप की गई 12,081 पहाड़ियों में से केवल 1,048 यानी महज 8.7 प्रतिशत ही 100 मीटर की ऊँचाई के मानक पर खरी उतरती हैं। इसका सीधा अर्थ यह है कि अरावली का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा इस नई व्याख्या के बाद कानूनी सुरक्षा खो सकता है। यह स्थिति खनन, रियल एस्टेट और निजी परियोजनाओं के लिए रास्ता खोलती है, जबकि पर्यावरण और स्थानीय समुदायों के लिए यह विनाश का संकेत है।
अरावली केवल पहाड़ियों की श्रृंखला नहीं है। यह 300 से अधिक जीव-जंतुओं और पक्षियों का प्राकृतिक आवास है, लाखों पशुपालकों के लिए चारागाह है और बनास, साबरमती तथा लूणी जैसी नदियों का उद्गम स्थल भी है। इसकी चट्टानी संरचना वर्षा जल को रोककर उसे जमीन के भीतर पहुँचाती है, जिससे पूरे क्षेत्र में भूजल रिचार्ज होता है। पहले से ही जल संकट से जूझ रहे पश्चिमी राजस्थान के लिए अरावली का कमजोर होना सूखे को स्थायी बना देने जैसा होगा।
सरकार की पर्यावरण नीति की वास्तविक तस्वीर जोजरी नदी की उपेक्षा और खेजड़ी वृक्षों के साथ हो रहे व्यवहार से भी साफ होती है। खेजड़ी, जिसे राजस्थान का राज्य वृक्ष माना जाता है और जो रेगिस्तानी पारिस्थितिकी तंत्र की जीवनरेखा है, आज योजनाबद्ध कटाई का शिकार बन रहा है। सरकारी आँकड़ों और जमीनी आकलनों के अनुसार, सोलर परियोजनाओं और औद्योगिक लीज़ के नाम पर अब तक लगभग 26 लाख खेजड़ी पेड़ काटे जा चुके हैं, जबकि आने वाले समय में करीब 50 लाख और खेजड़ी पेड़ों की कटाई की तैयारी की जा रही है। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि एक पूर्ण विकसित खेजड़ी पेड़ के साथ अन्य पेड़ो को तैयार होने में लगभग 100 वर्ष लगते हैं, जिससे मरुस्थल के इस अनमोल पारिस्थितिकी तंत्र पर दीर्घकालिक और गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
एक पेड़ औसतन 1,200 किलोलीटर ऑक्सीजन प्रतिवर्ष देता है। इस आधार पर, जो 26 लाख पेड़ काटे गए, वे हर साल लगभग 25 करोड़ किलोलीटर ऑक्सीजन प्रदान करते थे जो अब पूरी तरह बंद हो चुकी है। पेड़ों के कटने और बड़े पैमाने पर ऊर्जा परियोजनाओं की स्थापना के कारण तापमान में 3 से 4 डिग्री तक वृद्धि दर्ज की गई है। पर्यावरणविदों के अनुसार, पश्चिमी राजस्थान में बारिश कम होने का यह एक प्रमुख कारण बन गया है। तापमान बढ़ने और आवास नष्ट होने के चलते रेगिस्तान के कई छोटे जीव भी विलुप्ति के कगार पर पहुँच गए हैं। जबकि यही पारिस्थितिकी तंत्र है जो न्यूनतम पानी में पनपता है, मिट्टी को बाँधकर मरुस्थलीकरण को रोकता है, पशुओं के लिए चारा देता है और स्थानीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार है।
विडंबना यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने अतीत में अरावली की रक्षा के लिए ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। 1990 के दशक से लेकर एम.सी. मेहता बनाम यूनियन ऑफ इंडिया जैसे मामलों में कोर्ट ने राजस्थान और हरियाणा में अनियंत्रित खनन पर रोक लगाई और यह स्वीकार किया कि इससे होने वाला पर्यावरणीय नुकसान अपूरणीय है। ऐसे में आज उसी अरावली को कमजोर करने वाली व्याख्या सामने आना न केवल चिंताजनक है, बल्कि न्यायिक परंपरा के भी विपरीत प्रतीत होता है।