@arvindchotia धन्यवाद सर
तिंवरी हमारे लिए सिर्फ एक शब्द नहीं, हमारी पहचान और इतिहास है।
अलग-अलग सरकारी रिकॉर्ड में नाम की भिन्नता से आम लोगों और किसानों को बार-बार परेशान होना पड़ता है।
यही भावना इस खबर के पीछे है—कि तिंवरी की पहचान काग़ज़ों में भी उतनी ही साफ़ और सम्मानित हो, जितनी ज़मीन पर
दर्द कैसे-कैसे, काम कैसे-कैसे...
जोधपुर जिले का एक बड़ा ही प्यारा सा कस्बा है, तिंवरी। 2009 में जब मैं पहली बार ट्रांसफर पर जोधप���र आया था तब इस कस्बे का नाम पहली बार सुना था। जबकि यह एक महत्वपूर्ण कस्बा है। खासतौर से यहां खेती-बाड़ी के अनूठे प्रयोग हुए हैं और अत्यंत उपजाऊ यहां की जमीन है। ख़ैर। राजस्थान के बाहर से आए हुए मेरे कई साथी इस कस्बे का नाम कई प्रकार से लिख देते थे। कोई तिवारी लिख देता था।
यह समस्या असल में भी है। इसका पता आज तिंवरी के हमारे साथी जेठमल जी जैन की खबर पढ़ कर चला। बोलचाल में आप चाहे कुछ भी कहें लेकि�� सरकारी रिकॉर्ड में एक ही नाम हो सकता है और एक ही होना चाहिए। इस क्षेत्र के विधायक भैराराम जी सियोल को तत्काल इस मामले में दखल देकर राजस्व रिकॉर्ड में आम सहमति से एक नाम दर्ज करवाने के लिए जरूरी कदम उठाने चाहिए।
@BRSiyol @BhajanlalBjp @RajCMO
भास्कर इन्वेस्टिगेशन : सरकारी खरीद के लिए दो जिलों में 53 केंद्र खुलने थे..32 खुले ही नहीं..20 रुपए कम भाव में बेच रहे किसान... किसानों को 4000 करोड़ का नुक़सान..!!
जातिवाद मुक्त भारत चाहिए?
आज पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधीजी की पुण्यतिथि है। उनसे हम कुछ भी सीखना चाहें तो उसमें सर्वश्रेष्ठ सीख है एकता की सीख। इंदिरा जी को हमसे बिछड़े हुए 39 बरस हो गए हैं। उनको उस वक्त भी जातिवाद की इतनी चिंता थी जिस दौर के बारे में हम बात क��ते हैं कि तब इतना जातिवाद नहीं था। आज जातिवाद हमारे देश के लिए सबसे बड़ी चुनौती के तौर पर उभर चुका है। जातिवाद ने हमें इस कदर बांट दिया है कि हर किसी को हर कोई पराया लगने लगा है। विशेषज्ञ कहते हैं कि यह भी जातिवाद का चरम नहीं है। चरम की ओर तो देश अभी बढ़ रहा है। भाई को भाई से लड़ाने की साजिशें रची जा रही हैं। जातिवाद मुक्त भारत का सपना देखने वाली इंदिरा जी के नाम की रोटी खाने वाले ही जातिवाद के नाम पर रोटियां सेंकने की तैयारी कर रहे हैं। आज इंदिरा जी के कहे हुए ये शब्द देश के प्रत्येक जिम्मेदार नागरिक को सुनने और गुनने की जरूरत है। जातिवाद की बात करने और जाति के नाम पर वोट मांगने वालों और वोट देने वालों को सुनाने की जरूरत है। अभी राज्यों के चुनाव सिर पर हैं, आने वाले समय में देश के चुनाव भी होने हैं। इंदिरा जी की इस पुण्यतिथि से लेकर अगली पुण्यतिथि तक जातिवाद का ऐसा नंगा नाच देखने को मिल सकता है जिसकी हमने कल्पना भी नहीं की होगी। इसलिए आज ही सा��धान हो जाइए। देश का जितना नुकसान दुश्मन देश नहीं कर सकते, उससे ज्यादा, बड़ा और गहरा नुकसान देश के भीतर बैठे जातिवादी सोच वाले लोग कर सकते हैं। हां, सावधान रहिए।
इंदिरा जी को विनम्र श्रद्धांजलि
देश हित में रिट्वीट जरूर कीजिए
#IndiraGandhi
यूट्यूब पर आ गया हूं...
मेरे जैसे कठोर और परंपरागत प्रिंट वाले के लिए यूट्यूब पर आना बहुत मुश्किल था लेकिन आप सबने मुझे लगातार प्रेरित किया। मुझे खुद को यूट्यूब/कैमरे के लिए तैयार करने में समय लगेगा लेकिन आप हौसला बढ़ाएंगे तो मैं कर लूंगा। ऐसा विश्वास है।
अब जल्दी जल्दी इस चैनल को सब्सक्राइब कर लीजिए ताकि मैं और वीडियो बनाने के लिए आगे बढ़ूं।
https://t.co/J6zuiYJimA
#चोटियाजी_की_चुनाव_यात्रा
#RajasthaElection2023
राजस्थान की राजनीति पर नजर रखने वाले कह रहे हैं कि इस बार विधानसभा चुनावों में नेताओं की सोच और भाषा की सभी सीमाएँ टूट जाएँगी..राजनीति के नए दौर के लिए तैयार रहिए….
जसवंत सिंह, बीजेपी, मारवाड़ और मानवेंद्र…
भाजपा के दिग्गज नेता रहे जसवंत सिंह ने अनेक जगहों से लोकसभा के चुनाव जीते थे। राजस्थान के चित्तौड़गढ़, जोधपुर और सुदूर पश्चिम बंगाल के दार्जीलिंग से। लेकिन उनकी इच्छा थी कि वे एक बार अपने गृह क्षेत्र बाड़मेर-���ैसलमेर से चुनाव लड़ें और वह मौका था 2014 के लोकसभा चुनाव था। इस लोकसभा क्षेत्र से जसवंत सिंह के पुत्र मानवेंद्र सिंह चुनाव जीत भी चुके थे और हार ��ी चुके थे। जसवंत सिंह ने तैयारी शुरू भी कर दी थी लेकिन उनको टिकट नहीं दिया गया। आम आदमी को यह बात समझ में नहीं आई कि आखिर इतने बड़े नेता को भी टिकट के लिए इनकार किया जा सकता है? जसवंत सिंह का कद आप इसी से समझ लीजिए कि देश की सुरक्षा मामलों की कैबिनेट कमेटी में प्रधानमंत्री के अलावा रक्षा मंत्री, वित्त मंत्री, विदेश मंत्री और गृह मंत्री ही होते हैं। जसवंत सिंह इनमें से तीन पदों पर रह चुके थे। एक सम��� में प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी और उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी के बाद तीसरे नंबर के नेता जसवंत सिंह होते थे। बीजेपी के पोस्टरों में पहले अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और मुरलीमनोहर जोशी की तस्वीरें होती थीं, मुरलीमनोहर जोशी की जगह अब जसवंत ले चुके थे। अटलजी परिदृश्य से गायब हो चुके थे और 2014 के चुनाव में आडवाणी और जोशी, दोनों को टिकट तो दिए गए लेकिन चुनाव जोशी को वाराणसी की बजाय कानपुर भेज दिया गया। वे भारी मन से वहां गए और जीत भी गए लेकिन जसवंत सिंह को टिकट नहीं मिला। उनका दिल टूट गया था लेकिन हौसला चट्टान जैसा था। अपने पसंदीदा क्षेत्र से बतौर निर्दलीय उम्मीदवार ताल ठोक दी। प्रचंड मोदी लहर में भी निर्दलीय जसवंत चार लाख से भी ज्यादा वोट हासिल करने के बावजूद चुनाव हार गए। अब वे टूट चुके थे और कुछ ही समय बाद दिल्ली स्थित अपने निवास पर गिरने से घायल हुए तो उसके बाद कभी उठ नहीं पाए। उनके पुत्र मानवेंद्र तब शिव (बाड़मेर) से भाजपा विधायक थे। उन्होंने वह कार्यकाल जैस��� तैसे निकाला और 2018 के विधानसभा चुनाव से पहले एक बड़ी स्वाभिमान रैली करके वे कांग्रेस में शामिल हो गए। बीजेपी ने 2014 में बाड़मेर-जैसलमेर से कांग्रेस के सांसद-विधायक रहे कर्नल सोनाराम को बीजेपी में लाकर जसवंत सिंह के सामने उतार दिया और मोदी लहर में वे जीत भी गए। बीजेपी को यह गुमान रहा कि सब उसके साथ हैं लेकिन जैसलमेर-बाड़मेर का राजपूत वोट बैंक उससे काफी हद तक छिटक चुका था। इसकी झलक 2018 के विधानसभा ���ुनाव में दिखी। ‘वसुंधरा तेरी खैर नहीं…’ के नारे पर सवार इस चुनाव में दोनों जिलों में सिर्फ सिवाना सीट बगावत के चलते बीजेपी के खाते में आई और बाकी सभी आठ सीटें कांग्रेस की झोली में चली गई। कर्नल सोनाराम को भी बीजेपी ने बाड़मेर से विधानसभा चुनाव लड़वाया लेकिन वे यह चुनाव 30000 वोटों से भी ज्यादा अंतर से हारे। मानवेंद्र सिंह को हालांकि कांग्रेस ने झालरापाटन सीट पर वसुंधरा राजे के सामने उतारा लेकिन वे वहां कोई कमाल नहीं कर पाए। इसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने बाड़मेर-जैसलमेर सीट से मानवेंद्र को उतारा लेकिन इस बार मोदी लहर 2014 से भी ज्यादा प्रचंड थी और मानवेंद्र यह चुनाव बीजेपी के कैलाश चौधरी से तीन लाख से ज्यादा वोटों से हार गए। अब बीजेपी को लगा होगा कि कि वह वह इस क्षेत्र में मजबूत है। आज आप जैसलमेर-बाड़मेर जिलों में जाएंगे तो कहीं से लगेगा नहीं कि बीजेपी यहां मजबूत है। लोगों के मन में आज भी जस���ंत सिंह के लिए सम्मान और सहानुभूति दोनों हैं और कहीं न कहीं एक टीस है कि उनके एक अंतरराष्ट्रीय ख्याति के नेता को बेवजह ठिकाने लगा दिया गया। इस बीच, इस क्षेत्र में बीजेपी का स��गठन धराशायी हालत में पहुंच गया। आने वाले विधानसभा चुनाव में भी जसवंत फैक्टर की झलक दिखाई दे सकती है। मानवेंद्र सिंह फिर मैदान में उतरने को आतुर हैं। संभलकर कदम बढ़ाने की जरूरत है।
#चोटियाजी_की_चुनाव_यात्रा #JaswantSinghJasol #barmer #jaisalmer #Elecciones2023 #RajasthanElection2023
चोटिया जी की चुनावी रिपोर्ट
बाड़मेर विधानसभा क्षेत्र : रिपोर्ट-1
सीडी और ईडी की चर्चा के बावजूद मेवाराम की सल्तनत का तोड़ नहीं मिला बीजेपी को
2018 में बायतू से हारे केंद्रीय मंत्री कैलाश चौधरी को बाड़मेर से उतारने की चर्चा
��ाड़मेर। बाड़मेर का नाम बी से शुरू होता है लेकिन यहां सी डी और फिर ई डी ये नाम बहुत चर्चा में रहते हैं। एक ��सी सीडी की चर्चा यहां काफी पहले से है जो किसी ने भी नहीं देखी है लेकिन केंद्रीय मंत्री गजेंद्रसिंह शेखावत के पिछले दिनों यहां दिए गए एक भाषण से लगता है कि कोई सीडी भी आ सकती है और ईडी तो वे चाहें तो आ ही सकती है। हालांकि अब चुनाव सिर पर हैं और अभी तक कुछ भी आया नहीं है। फिर भी मंत्रीजी बोलकर गए हैं तो लोगों को लगता है कुछ न कुछ तो जरूर आएगा। सियासत और सीडी का मारवाड़ का पुराना संबंध रहा है इसलिए लो�� चुनाव की चर्चा के बीच सीडी को जरूर ले आते हैं।
बहरहाल, बाड़मेर से विधायक हैं मेवाराम जैन और पिछले 15 बरसों से यहां उनका एकछत्र राज है। सरकार चाहे बीजेपी की आए या कांग्रेस की, सरकार विरोधी लहर हो या मोदी लहर, मेवाराम कांग्रेस के उन मुठ्ठी भर नेताओं में से एक हैं जो अपनी सीट लगातार निकाल रहे हैं। पड़ोसी जिले जैसलमेर के उलट यहां जिला परिषद से लेकर नगर परिषद तक सब जगह मेवाराम की ही सरकारें हैं। दे��ी मनोविज्ञान को बहुत अच्छे से ��मझते हैं। ऐसा नहीं है कि लोगों को उनसे शिकायतें नहीं हैं। लेकिन किसकी शिकायत को कब और कैसे दूर करना है, यह मेवाराम को अच्छे से आता है। बाड़मेर के लोग कहते हैं- मेवाराम को चुनाव लड़ना आता है। पैसा खर्च करना भी आता है। कहां खर्च करना है, यह भी उन्हें पता है। इन सबके इतर जातीय समीकरण कुछ इस तरह मेवाराम के पक्ष में हैं कि अपनी जाति के महज दो फीसदी वोटों के बावजूद वे बहुत सारी जातियों के वोटों के बूते ���र बार जीत दर्ज करते हैं। उनको जिताने वाले दूसरे ही हैं। मेवाराम का उदय उस दौर में हुआ जब बाड़मेर में तेल का उत्पादन शुरू होने वाला था और यही समय था जब बाड़मेर समृद्धि की अंगड़ाई ले रहा था। 2008 के चुनाव में कांग्रेस के मेवाराम ने बीजेपी की मृदुरेखा चौधरी को करीब 14 हजार वोटों से हराया। इसी वर्ष प्रदेश में कांग्रेस की सरकार आई थी। 2013 का चुनाव कांग्रेस के लिहाज से बहुत कठिन था, महज 21 सीटें आई थीं। इस बार बीजेपी ने उनके सामने डॉ.प्रियंका चौधरी को उतारा तो 2008 में हारीं डॉ.मृदुरेखा चौधरी ने निर्दलीय ताल ठोक दी और बीजेपी के 19518 वोट काट दिए। मेवाराम का काम इसी से बन गया और वे करीब छह हजार वोटों से दुबारा चुन लिए गए। 2018 का चुनाव मेवाराम के लिए अत्यंत आसान हो गया था। इस चुनाव में मेवाराम ने बीजेपी के दिग्गज कर्नल सोनाराम को 30 हजार से भी ज्यादा वोटों से हराया। इसकी कहानी यह थी कि 2014 के लोकसभा चुनाव में कर्नल सोनाराम को कांग्रेस से बीजेपी में लाकर पूर्व केंद्रीय मंत्री जसवंत सिंह के सामने उतारा गया था। मोदी ल���र में उन्होंने जसवंत सिंह को चुनाव हरा दिया था। राजपूत वोटर्स ने 2018 के चुनाव में कर्नल सोनाराम की करारी हार सुनिश्चित करने के लिए उमड़कर वोटिंग की। अब फिर चुनाव हैं और तीन चुनाव लगातार जीतने के बाद जहां मेवाराम जैन को जीत को लेकर चिंतित होना चाहिए, वहां चिंता की लकीरें बीजेपी के माथे पर दिखती हैं। बीजेपी इस बार यहां केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री कैलाश चौधरी को मेवाराम के सामने उतारने की सोच रह�� है। मेवाराम के खेमे को इसमें भी संभावना दिखती है। अगर कैलाश चौधरी को टिकट दिया जाता है तो टिकट से वंचित प्रियंका चौधरी, मृदुरेखा चौधरी और कर्नल सोनाराम तीन पूर्व प्रत्याशी हो जाएंगे और किसी न किसी एक की बगावत से मेवाराम का काम वैसे ही बन जाएगा। हालांकि बीजेपी को उम्मीद है कि कैलाश चौधरी के कद को देखते हुए कोई ��ागी नहीं होगा लेकिन बगावत की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। बहरहाल, मेवाराम एक सेफ जोन में हैं। उनकी चिंताएं दूसरी ही हैं जो कहीं दिखती नहीं हैं।
#चोटियाजी_की_चुनाव_यात्रा
@MewaramJain @KailashBaytu
चोटिया जी की चुनावी रिपोर्ट
जैसलमेर विधानसभा क्षेत्र : रिपोर्ट-1
टिकट से पहले… कांग्रेस से कांग्रेस की तीन तरफा जंग
मानवेंद्र की दावेदारी ने ��ूपाराम को उलझाया तो फकीर खेमे की नई उम्मीद मानवेंद्र
अरविन्द चोटिया। भौगोलिक दृष्टि से राजस्थान के सबसे बड़े और जनसंख्या के लिहाज से काफी छोटे जिले जैसलमेर में म��ज दो विधानसभा सीटें हैं। दोनों सीटों में कुछ समानताएं हैं। जैसलमेर और पोकरण। दोनों ही सीटों के नाम विश्वविख्यात हैं। दोनों की आबादी से दस गुना पर्यटक या श्रद्धालु हर वर्ष यहां आते हैं। दोनों ही सीटों पर राजपूत और मुस्लिम सबसे बड़ा मतदाता वर्ग है। दोनों ही सीटें सामान्य वर्ग की हैं। बीजेपी दोनों ही सीटों से हमेशा राजपूत उम्मीदवार उतारती रही है लेकिन कांग्रेस जैसलमेर में उम्मीदवार बदलती ���ही है। 2008 में यहां से राजपूत समाज की सुनीता भाटी को टिकट दिया तो 2013 में नया प्रयोग करते हुए जनरल सीट पर अनुसूचित वर्ग की सबसे ताकतवर जाति मेघवाल समाज के रूपाराम धणदे को टिकट देकर एक ऐसी सोशल इंजीनियरिंग खड़ी करने की दिशा में कदम बढ़ाया जो यहां अजेय होने वाली थी। जैसलमेर की मुस्लिम राजनीति की धुरी रहे गाजी फकीर परिवार के सबसे बड़े बेटे सालेह मोहम्मद पहले से पोकरण सीट पर काबिज थे। जैसलमेर सीट स��� अजा वर्ग के रूपाराम को टिकट देकर यह व्यूह रचना की गई। हालांकि 2013 वह साल था, जब देश में अन्ना-केजरीवाल आंदोल�� के चलते देश में भीषण कांग्रेस विरोधी लहर थी और देश के राजनीतिक आकाश में नरेंद्र मोदी का उदय हो चुका था। भगवा लहर में कांग्रेस दोनों सीटें हार गई थी। पोकरण सीट बड़े अंतर से हारी लेकिन उस प्रचंड लहर में भी जैसलमेर सीट पर जीत का अंतर महज 2867 वोटों का ही था। पांच साल निकलते देर नहीं लगी। 2018 के चुनाव में कांग्रेस ने दोनों सीटें जीत ली। जैसलमेर सीट पर जीत का अंतर 29778 वोटों का रहा।
फकीर परिवार आश्वस्त थ�� कि अब वे पूरे जिले पर एकछत्र राज करेंगे लेकिन रूपाराम भी राजनीति के बड़े खिलाड़ी हो सकते हैं, यह जानकारी शायद किसी को नहीं रही होगी। जैसलमेर नगर परिषद के चुनाव में कांग्रेस के पास बहुमत होने के बावजूद पोकरण विधायक सालेह मोहम्मद ने अपने चहेते और पूर्व विधायक गोवर्द्धनदास कल्ला के भतीजे हरिवल्लभ कल्ला, जो निर्दलीय पार्षद जीतकर आए थे, को चेयरमैन बनवा दिया और यहीं से दोनों में ठन गई। आमतौर पर ��ाजनीति में हिसाब बराबर किया जाता है लेकिन रूपाराम ने सूद सहित चुकाया। फकीर परिवार जैसलमेर में सिर्फ मुस्लिम राजनीति की ही नहीं, राजनीति की भी धुरी रहा है। पंचायती राज में उनकी तूती बोलती थी। खु�� सालेह मोहम्मद, उनके छोटे भाई अब्दुल्ला फकीर और उनके चाचा फतेह मोहम्मद यहां लगातार जिला प्रमुख बनते रहे हैं। हालांकि पिछले कार्यकाल में महिला रिजर्व सीट होने की स्थिति में रूपाराम की बेटी अंजना मेघवाल को जिला प्रमुख बनाया गया था। इस बार सामान्य सीट होने पर फिर से फकीर परिवार के पास यह अवसर आया हुआ ही था। स्पष्ट बहुमत कांग्रेस के पास था। फकीर परिवार अपना जिला प्रमुख बनाना चाहता था तो रूपार��म फिर से यहां अपनी बेटी अंजना को जिला प्रमुख बनाना चाहते थे। लेकिन बड़ा खेल यहां हो गया। क्रॉस वोटिंग से बीजेपी के प्रतापसिंह यहां जिला प्रमुख निर्वाचित हुए। एक दौर में फकीर परिवार ही पंचायती राज की टिकटें बांटा करता था लेकिन रूपाराम ने पंचायत समिति के चुनाव में सालेह के भाई उमरदीन फकीर का टिकट न केवल काट दिया बल्कि अपने चहेते जानब खान को टिकट देकर इस सीट से निर्दलीय खड़े हुए उमरदीन को चुनाव भी हरवा दिया। जानब खान कभी फकीर परिवार के चहेते हुआ करते थे। जिले की सातों पंचायत समितियों में फकीर परिवार का दबदबा खत्म कर दिया। यह जैसलमेर जिले में बड़ी घटना थी।
अब रूपाराम ने प्रशासन पर मजबूत पकड़ बनाना शुरू किया। सभी विभागों में ��पने विश्वासपात्रों को बिठा दिया। राज्य सरकार में कैबिनेट मंत्री और पोकरण विधायक सालेह मोहम्मद का जैसलमेर जिला मुख्यालय पर दखल काफी हद तक रोकने में कामयाब रहे तो अंदरखाने बात और बिगड़ गई। अब चुनाव मंडते ही पूर्व केंद्रीय मंत्री जसवंत सिंह के पुत्र मानवेंद्र सिंह की यहां से दावेदारी फकीर परिवार के लिए नई उम्मीद लेकर आई है। हालांकि रूपाराम अपने टिकट को लेकर आश्वस्त हैं तो फकीर परिवार यहां राजपूत-मुस्लिम के साझा बड़े वोट बैंक के बूते मानवेंद्र सिंह को चुनाव लड़वाने और जिताने के लिए सिर्फ तैयार ही नहीं बल्कि आतुर है। अब जैसलमेर सीट पर चुनाव से पहले टिकट के लिए बड़ी जंग के आसार हैं और इसी पर निर्भर करेगा चुनाव का परिणाम भी।
अगली रिपोर्ट में बीजेपी के टिकट का घमासान
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@ShaleMohammad_ @RooparamDhandev @ManvendraJasol