गाँव चौपाळ गजब हुई, न्यारा दिखै ठाठ।
वोटर दीखे दो - चार, सरपंची में आठ॥
'पोस्टरिया' नेता घणा, करै न कोई काम।
वोटर अब थोड़ा रह्या, नेता बण्या तमाम॥
~ आदित्य।। मरूभाषा साहित्य मंच।।
कहावत — "के मोठां को पीसणो, के सासु को रूसणों"।
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राजस्थानी लोकजीवन और रिश्तों की सहज नोकझोंक को बयां करती पारंपरिक कहावत — "के मोठां को पीसणो, के सासु को रूसणों"।
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"कागलां कै सराप सूं ऊंट कोनी मरै।" 🐪✨
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