राम मंदिर में यदि चोरी हुई है तो दोषियों को सजा मिलनी ही चाहिए। लेकिन दान का धन ट्रस्ट का होता है, इसलिए न्याय हो, राजनीति नहीं।
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योग दिवस पर हमारा संकल्प—योग को उसके पूर्ण स्वरूप में स्थापित करना।
योग केवल शरीर को स्वस्थ बनाने का साधन नहीं, बल्कि मन, शरीर और आत्मा की शुद्धि की समग्र प्रक्रिया है।
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समाज व्यक्तियों से बनता है और संविधान नागरिकों का निर्माण करता है।
प्रत्येक नागरिक व्यक्ति होता है, लेकिन प्रत्येक व्यक्ति नागरिक नहीं होता।
इस अंतर को समझे बिना न समाज सही चलेगा, न राज्य।
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नई व्यवस्था के लिए हमारा प्रस्ताव है: मूल अधिकार की स्पष्ट परिभाषा। जीने का अधिकार, अभिव्यक्ति का अधिकार, संपत्ति का अधिकार और व्यक्तिगत निर्णय की स्वतंत्रता—ये व्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रमुख आयाम हैं।
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भारत में गरीबी लगातार घट रही है, जीवन स्तर बढ़ रहा है, संपत्तियों के मूल्य बढ़ रहे हैं। फिर भी कुछ लोग गरीबी बढ़ने का शोर मचाते हैं। असली चर्चा आर्थिक असमानता और श्रम शोषण पर होनी चाहिए, न कि पुराने नारों पर।
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स्वराज का परिणाम सुराज होता है, लेकिन सुराज का परिणाम अक्सर नई गुलामी बन जाता है। आज दुनिया सुराज को ही स्वराज मान बैठी है, जबकि दोनों की अवधारणाएं एक-दूसरे से भिन्न हैं। आवश्यकता वास्तविक स्वराज की है, केवल अच्छे शासन की नहीं।
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संविधान की नई परिभाषा: “तंत्र के अधिकतम और लोक के न्यूनतम अधिकारों की सीमाएं तय करने वाले दस्तावेज को संविधान कहते हैं।” संविधान केवल शासन का दस्तावेज नहीं, बल्कि लोक और तंत्र के संबंधों की सीमा-रेखा है।
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नई समाज व्यवस्था में परिवार समाज की पहली इकाई होगा। प्रत्येक परिवार अपना संविधान बनाएगा और उसे ग्राम सभा में पंजीकृत करेगा। परिवार का संचालन उसी संविधान के अनुसार होगा, जिसे सभी सदस्य सर्वसम्मति से तैयार करेंगे।
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यदि परीक्षाओं में बार-बार नकल और भ्रष्टाचार हो रहा है, तो केवल नकलचियों को दोष देने से काम नहीं चलेगा। उस व्यवस्था पर भी प्रश्न उठाना होगा जो भ्रष्टाचार के इतने अवसर पैदा करती है। #परीक्षा_सुधार#व्यवस्था_परिवर्तन#शिक्षा
ममता बनर्जी के राजनीतिक प्रभाव में कमी के बाद विपक्ष का केंद्र अब सोनिया गांधी बनती दिखाई दे रही हैं। अधिकांश विपक्षी दल प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कांग्रेस नेतृत्व के इर्द-गिर्द ही राजनीति कर रहे हैं।
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महंगाई और मुद्रास्फीति एक ही चीज़ नहीं हैं। मुद्रास्फीति मुद्रा की स्थिति बताती है, जबकि महंगाई का आकलन वस्तुओं की वास्तविक उपलब्धता और क्रय शक्ति के आधार पर होना चाहिए। नई परिभाषाओं पर चर्चा का समय आ गया है।
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दहेज को केवल कानून के चश्मे से नहीं देखा जा सकता। यह सदियों से चली आ रही एक सामाजिक एवं पारिवारिक व्यवस्था है। कठोर कानूनों और विरोध के बावजूद यह आज भी समाज में मौजूद है। व्यवहारिक वास्तविकताओं को समझे बिना समाधान संभव नहीं है।
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नई समाज व्यवस्था में प्रत्येक परिवार का अपना संविधान और अपनी सरकार होगी। परिवार से ग्राम सभा, राष्ट्र सभा और विश्व सभा तक हर इकाई संविधान के अनुसार चलेगी। यही वास्तविक लोकतंत्र और उत्तरदायित्व का आधार बनेगा।
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नई न्याय व्यवस्था में गांव-गांव में “समझौता न्यायालय” बनाए जाएंगे, जहां 5 प्रतिनिधि मिलकर छोटे-बड़े विवादों का त्वरित समाधान करेंगे। लक्ष्य होगा — सस्ता, सुलभ और 3 महीने के भीतर सुनिश्चित न्याय। #न्यायसुधार
नई राजनीतिक व्यवस्था में व्यक्ति ही सबसे बड़ी इकाई होगा, कोई वर्ग नहीं। महिला आयोग, युवा आयोग, मानव अधिकार आयोग जैसे विभाजनकारी और निष्क्रिय आयोग समाप्त किए जाएंगे। समान नागरिक संहिता सब पर समान रूप से लागू होगी। #नईराजनीतिकव्यवस्था
समाज में बढ़ती हिंसा का एक कारण राज्य की कमजोर दंड व्यवस्था भी है। समाज में अहिंसा होनी चाहिए, लेकिन राज्य को अपराधियों के प्रति कठोर होना होगा। शीघ्र न्याय और कठोर दंड ही नागरिकों में सुरक्षा का भाव पैदा कर सकते हैं।
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नई समाज व्यवस्था में राष्ट्र अंतिम इकाई नहीं बल्कि विश्व समाज अंतिम इकाई होगा। व्यवस्था की पहली इकाई परिवार होगी। भारत राज्यों का संघ नहीं बल्कि परिवारों का संघ बनेगा। विश्व मानवता ही भविष्य की दिशा है।
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@RahulGandhi शिक्षा के क्षेत्र में 90% भ्रष्टाचार व्याप्त है। राहुल गांधी को शासन के लिए अक्षम और अनाड़ी माना गया है, जबकि मोदी को समस्याओं के समाधान हेतु सर्वाधिक उपयुक्त बताया गया है।
@INCIndia विदेशी निवेशकों का मोदी पर भरोसा बरकरार है। यहाँ महंगाई और बेरोजगारी को केवल एक राजनीतिक भ्रम माना गया है न कि कोई वास्तविक समस्या। वास्तविक सुधार के लिए रिपोर्ट में श्रमिकों के वेतन श्रम-मूल्य में वृद्धि करने और आर्थिक शक्तियों के विकेंद्रीकरण की नीति अपनाने का सुझाव दिया गया है