सारे शुभ को ढोंग खा जाता है और सच्चाई सारे अशुभ को खा जाती है जैसे सूर्य अंधकार को खा जाता है। शुभ कर्म और भगवद चिंतन चिंताओं को और पापों को नष्ट कर देता है। ऐसे अशुभ कर्म, अशुभ चिंतन योग्यताओं को हर लेता है।
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ऐसा कोई मनुष्य नहीं जो पूरा का पूरा हाल किसी दूसरे को बता दे । पत्नी पति से और पति पत्नी से कुछ न कुछ छुपाकर रखेगा। भाई-भाई से मित्र-मित्र से कुछ न कुछ छुपाता है। एक संत है जो अपना धन निखालस्ता से, खुलेआम अपना दिल खोलकर धर देता है, ये संत का स्वभाव होता है।
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योग वासिष्ठ महारामायण….
जिसको इसी जन्म में परमात्मा का साक्षात्कार करना है, वो बार-बार योग वासिष्ठ पढ़े और उसी विचारों में तन्मय हो जाए। साक्षात्कार होके रहेगा, रामतीर्थ का दावा है। कई संतों ने इसका अनुभव किया। मेरे को भी उससे बड़ी कृपा मिली, योग वासिष्ठ से। मेरे गुरुदेव भी बड़ा आदर से पढ़ते थे। अपने आश्रम का मुख्य ग्रंथ भी अभी योग वासिष्ठ महारामायण है। वो सिद्धांत ग्रंथ है। उसमें तो कर्कटी राक्षसी जैसे को भी साक्षात्कार की विधि बताई, उसको साक्षात्कार हो गया। जनक राजा को भी साक्षात्कार हुआ, वो विधि बताई। जब राजा को भी हो सकता है और असुर को भी हो सकता है, ऐसा पद्धति है योग वासिष्ठ में। उसका नाम है योग वासिष्ठ महारामायण।
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''चित्त की विश्रांति''
चित्त की विश्रांति दोषों की हर्ता है, गुणों की भर्ता है, आवश्यक सामर्थ्य देने वाली है।
चित्त की विश्रांति, प्रसाद की जननी है, सामर्थ्य और सुख की जननी है।
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रघुनायक बेगि करो संभारा। मेरी संभाल लो प्रभु,सद्बुद्धि दो दाता।
मोहि भय होइ अति अपारा। क्यों भय होइ? कि अपजस होइ तुम्हारा,
कि भगवान का भक्त और चिंतित,कामी?
मन लगे,आनंद आए तो अच्छा,नहीं तो रो।
तेरा भक्त तेरी भक्ति में दीवाना हो जाए,ऐसी दया करना।
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हे रामजी, जो एक सांस भी आत्म विचार से रहित होती है, वह वृथा जाती है। मनुष्य की ऐसी एक सांस के समान संपूर्ण पृथ्वी का धन भी नहीं है। यदि एक सांस निष्फल जाए, तो फिर मांगे नहीं मिलती।
एक श्वास इतनी कीमती है कि पृथ्वी का धन दे दो, फिर भी एक श्वास आयुष्य बढ़ नहीं सकती। ऐसी कीमती श्वासे इधर-उधर गवाना गपशप में। सोहम्। श्वास अंदर जाए। 'सो' बाहर आए, तो 'हम्'। मैं शरीर नहीं हूं, मैं चेतन आनंद स्वरूप हूं, सुख स्वरूप हूं, भगवान का अविभाज्य अंग हूं। ये मानस जप। वो पुरुष खुद तीर्थ रूप हो जाता है। वो पुरुष खुद पवित्र करने वाला होता है। मनुष्य का एक श्वास भी आत्म विचार के सिवाय जाता है, तो व्यर्थ हो जाता है। सारी पृथ्वी का धन देने से भी एक श्वास जितनी आयुष्य वापस नहीं आती।
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दुःख भी आ जाए तो उसका मजा लो, मैं दु:खी हूँ ऐसा सोच सोचकर दुःख में डूबें क्यों !!
वेदांत ऐसा नज़रिया दे देता है कि आप संसार का पिट्ठू होकर दब के मत मरो। दुःख का भी मजा लो और सुख का भी मजा लो ।
दुःख आया तो हम देख रहे हैं, आया है तो जाएगा भी। आप इस संसार को, शरीर को, विकारों को, अपने ऊपर हावी मत होने दो। ये हावी हो गए तो आपको नोच डालेंगे और अगर आप युक्ति से निकल गए तो ये आपके दास हो जाएंगे।
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सदैव प्रसन्न रहना ईश्वर की सर्वोपरि भक्ति है और संसार के विकारों से बचना जीव का परम उद्योग है, उद्यम है। जो उद्यमी होता है, उसके द्वारा ईश्वर की अद्भुत शक्तियां छलकने लगती हैं।
हरि सम जग कछु वस्तु नहीं, प्रेम पंथ सम पंथ.....।
भगवान को अपना और अपने को भगवान का मानकर प्रीतिपूर्वक भज़ें तो उसे बुद्धि योग मिलता है अर्थात् कर्म में धर्म का नियंत्रण होने लगता है, उपासना में, भगवान में, प्रीति होने लगती है और ज्ञान में, भगवत तत्व का ज्ञान होने लगता है।
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इस मंत्र का जप करने से निद्रा आने लगेगी। जिसको अनिद्रा की तकलीफ है, ठीक से नींद नहीं पाते हैं, तो वह मंत्र है। लिखना चाहो तो लिख लो। शुद्धे शुद्धे महायोगिनी महानिद्रे स्वाहा। शुद्धे शुद्धे महायोगिनी महानिद्रे स्वाहा।
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जगत में जो भी दुख है, उसका मूल अज्ञान है और उसके बेटा बेटी शंका है। अहंता ममता उसका परिवार है।अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः । अज्ञान से जिनका ज्ञान ढक गया है, वे लोग थोड़ी थोड़ी बात पे विमोहित हो जाते हैं। तो वर्तमान में विमोहित हो जाते हैं और भूतकाल में घृणा और दुख से भर जाते हैं और भविष्य की चिंता करके भय से भर जाते हैं। तो वर्तमान, भूत और भविष्य एक ही अंतःकरण में, उस अंतःकरण का अधिष्ठान जो आत्मा है, जो मैं, मैं, मैं हम बोल रहे हैं, उस मैं को जिसने खोजा, उसके बंधन खुल जाते हैं।
जिन खोजा तिन पाया, गहरे पानी पैठ।
मैं भोरी डूबन डरी, रही किनारे बैठ।
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असाधन का सुख लेंगे तो क्षणभर तो सुख मिलेगा जैसे दाद खुझलाते हैं, बाद में तपन और पीड़ा...। सारे भोगियों की गहराई में देखो, ईर्ष्या में, तपन में तप रहे हैं। वस्तु की प्राप्ति, व्यक्ति की प्राप्ति, कोई बढ़िया अवस्था की प्राप्ति का जो सुख लेने की आदत है वो ही साधक को असाधन में आबद्ध कर देती है।
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औधव ने पूछा कि सबसे बढ़िया में बढ़िया काम क्या है? सबसे बढ़िया में बढ़िया पुरुषार्थ क्या है? सब में बढ़िया में बढ़िया विजय क्या है?
तब श्री कृष्ण ने कहा — “स्वभाव विजय इति शौर्य।” अपना जीव का स्वभाव, कामी, क्रोधी का स्वभाव पर विजय पाकर आत्मा-परमात्मा का स्वभाव में जगना, ये बड़े में बड़ा विजय है।
दुनिया के सारे पहलवानों को हरा लिया, लेकिन मन तुमको कामी, क्रोधी, लोभी, मोही बनाता है, तो आप तुच्छ पहलवान हैं। लेकिन किसी को, एक कीड़ी को भी आप नहीं हरा सकते। फिर भी आपने अपने स्वभाव में भगवत्स्वभाव का रस भर दिया। आप धनभागी हो गए।
शबरी, भीलन धनभागी हो गए। रावण ऐसे के ऐसे रह गए। रैदास धनभागी हो गए। हिटलर, सिकंदर ऐसे के ऐसे रह गए? तो ये सार बात है सिद्धांत।
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तुलसी का रस और नींबू मिलाकर किसी को भी पिलाओ। रोग प्रतिकारक शक्ति बढ़ेगी और छुपे हुए रोग उखड़कर भागेंगे। ऐसा है तुलसी का रस। 25 तुलसी के पत्तों का रस और एक आध नींबू। हफ्ते में दो-तीन दिन पीया, कैसा भी बीमार व्यक्ति हो, दौड़ने लगेगा।
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"ब्रह्मज्ञान के सत्संग की दिव्य महिमा"
ब्रह्मज्ञान का सत्संग सुनने को जो चार कदम चलकर आते हैं, एक-एक कदम यज्ञ करने का फल देता है। श्रृद्धा से बैठते हैं तो भक्तियोग होता है, सुनते हैं तो ज्ञानयोग का फल होता है और जब नाम सुमिरण करके आनंदित होते हैं, तो महाराज जपयज्ञ का फल फलित होता है।
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#PurushottamMaas की महिमा संत श्री आशारामजी बापू बताते हैं कि यह मास शारीरिक-मानसिक आरोग्य व बौद्धिक विश्रान्ति देने में सहायता करेगा।
भजन-ध्यान अधिक करके पुरुषोत्तमस्वरूप परमात्मा को पाने में यह मास मददरूप है। इस मास में विवाह आदि सकाम कर्म वर्जित हैं।
Have Spiritual Growth !
देवता को आपके भले बुरे से कोई लेना देना नहीं। आपने तप किया, पूजा किया, स्मरण किया और जो मांगा, देवता ने दे दिया। लेकिन अगर गुरु देवता है, तो आपने जो मांगा वो नहीं देगा, जिससे आपका परम मंगल है, गुरु वही देगा। हनुमान जी को कहा कि कृपा करहूं गुरुदेव की नाईं। बच्चा जो मांगे, वो माँ देती जाए, तो बच्चे की तबाही हो जाएगी। उचित दे और अनुचित से बचाती जाए माँ। माँ बच्चे को नहलाती है, नाक दबोचती है, साबुन लगाती है, कड़वी दवा पिलाती है, वो बच्चे को अच्छा नहीं लगता। फिर भी माँ वो करती है और जो बच्चे को अच्छा लगता है, वो भी करती है। जब बच्चे को अच्छा लगता है खाना, पीना, लाल दुलार, प्यार, वो माँ की दया है और बच्चे को अच्छा नहीं लगता, फिर भी उसका हित है, वो माँ करती है, तो माँ की कृपा है। ऐसे गुरु दया भी करते, कृपा भी करते, भगवान भी दया भी करते, कृपा भी करते। हम जो चाहे वो सब नहीं होता। हमारा जिसमें मंगल होता है, वही भगवान करते हैं और जो दया से करते या तो कृपा से करते हैं। दया से करते, तो अच्छा लगता है और जब कृपा से करते हैं ना, तो लगता है हाय रे हाय, ऐसा हो गया, वैसा हो गया। अच्छा नहीं लगा, तो फरियाद करते हैं। लेकिन इसमें हमारा विकास छुपा है, ये अंदर से पक्का समझना चाहिए।
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आपकी बुद्धि में ये बिठा दो कि परमात्मा का सुख पाना ही सार है। हमारा आत्मा अनंत है और परमात्मा अनंत हैं। हमारा अंत नही होगा, शरीर का अंत होगा, हमारी मौत नही होती और परमात्मा एक रस है। आत्मा सदा है, परमात्मा सदा है।
शरीर भी बदलता है, संसार भी बदलता है, तो बदलनेवाले के लिए मांग मांग कर मजूरी करके युग बीत गए, अब तो अबदल की ही मांग पैदा हो। ज्यों भगवान की गरिमा, भगवान की मधुरता, भगवान का सामर्थ्य सत्संग के द्वारा सुनोगे, त्यों बुद्धि में भगवद प्राप्ति की मांग की जगह बढ़ेगी। ज्यों संसार की पोलपट्टी विचार करोगे, त्यों-त्यों संसार की मांग की जगह घटेगी।
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गीता के छठे अध्याय में भगवान कहते हैं कि तपस्वी से भी योगी अधिक है, ज्ञानी से भी योगी अधिक है, कर्मी से भी योगी अधिक है इसलिए अर्जुन, तू योगी होना । योग का मतलब है मेल । अपने आत्मा-परमात्मा से मेल रखते रहना ।
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